श्रुति हासन बोलीं- संकीर्ण सोच से विविधता नकारात्मक लगती है, आलोचनाओं से सीखा और आगे बढ़ी

Shruti Haasan ने कहा कि संकीर्ण सोच रखने पर विविधता नकारात्मक लग सकती है। एक्ट्रेस ने बताया कि उन्होंने आलोचनाओं से सीख लेकर खुद को बेहतर बनाया और आगे बढ़ीं।

जानी-मानी अभिनेत्री श्रुति हासन ने साउथ और बॉलीवुड, दोनों फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हुए अपना अलग मुकाम बनाया है। महज आठ साल की उम्र में बतौर बाल कलाकार करियर शुरू करने वाली श्रुति का मानना है कि सिनेमा ने उन्हें समय के साथ काफी मजबूत बनाया है।

एंटरटेनमेंट न्यूज़: अभिनेत्री श्रुति हासन ने दक्षिण भारतीय सिनेमा से लेकर बॉलीवुड तक अपनी अलग पहचान बनाई है। कई भाषाओं में काम कर चुकीं श्रुति हासन न सिर्फ अपने अभिनय, बल्कि सामाजिक और रचनात्मक मुद्दों पर बेबाक राय रखने के लिए भी जानी जाती हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू में अभिनेत्री ने अपने करियर, भारतीय सिनेमा में बढ़ती भाषाई विविधता, ओटीटी के प्रभाव और आलोचनाओं से मिली सीख के बारे में खुलकर बात की।

श्रुति हासन ने महज आठ साल की उम्र में बतौर बाल कलाकार फिल्मी दुनिया में कदम रखा था। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग भाषाओं और फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हुए अपना लंबा करियर बनाया। वह सुपरस्टार रजनीकांत, प्रभास, पवन कल्याण और विजय जैसे कलाकारों के साथ भी स्क्रीन साझा कर चुकी हैं। अभिनेत्री का कहना है कि सिनेमा के लंबे सफर ने उन्हें न सिर्फ एक बेहतर कलाकार बनाया, बल्कि व्यक्तिगत तौर पर भी मजबूत किया।

अपने अनुभव के आधार पर बात करना पसंद करती हैं श्रुति

श्रुति हासन ने कहा कि वह ऐसे मुद्दों पर अपनी राय रखना पसंद करती हैं, जिन्हें उन्होंने खुद अनुभव किया हो या करीब से देखा हो। उनका मानना है कि बिना पूरी जानकारी के किसी राजनीतिक या सामाजिक विषय पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए। अभिनेत्री के मुताबिक, उन्होंने हमेशा अपने अनुभवों को अपनी राय का आधार बनाया है। उनके लिए किसी मुद्दे पर बोलने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उस विषय की वास्तविक समझ हो। यही वजह है कि वह हर मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने के बजाय उन्हीं विषयों पर बात करती हैं, जिनसे उनका सीधा जुड़ाव रहा है।

'संकीर्ण विचारधारा होगी तो विविधता नकारात्मक लगेगी'

श्रुति हासन बोलीं- संकीर्ण सोच से विविधता नकारात्मक लगती है, आलोचनाओं से सीखा और आगे बढ़ी

भारतीय सिनेमा में बॉलीवुड और दक्षिण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के बीच कथित अंतर को लेकर सवाल पूछे जाने पर श्रुति ने भारत की सांस्कृतिक विविधता का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग भाषाएं, संस्कृतियां और क्षेत्रीय पहचान मौजूद हैं और यही विविधता भारतीय समाज की ताकत है। अभिनेत्री के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति की सोच व्यापक और विकासवादी है तो वह विविधता को सकारात्मक नजरिए से देखेगा। लेकिन सोच सीमित होने पर यही विविधता चुनौती या नकारात्मक चीज नजर आ सकती है।

श्रुति ने कहा कि वह भारत की विविधता को सकारात्मक रूप में देखती हैं। उनके मुताबिक, अलग-अलग राज्यों और संस्कृतियों की अपनी विशिष्टता है, जिससे सिनेमा को नई कहानियां, नए किरदार और अलग नजरिए मिलते हैं।

ओटीटी ने बदली भाषाई सीमाओं की तस्वीर

श्रुति हासन ने डिजिटल प्लेटफॉर्म और ओटीटी के बढ़ते प्रभाव को भी भारतीय सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनका मानना है कि आज दर्शक किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। वे अलग-अलग भाषाओं में बनी फिल्मों और वेब सीरीज को सबटाइटल के साथ आसानी से देख सकते हैं। पहले क्षेत्रीय फिल्मों को दूसरे राज्यों के दर्शकों तक पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर डबिंग पर निर्भर रहना पड़ता था। अब दर्शक मूल भाषा में कंटेंट देखने और सबटाइटल पढ़ने के लिए ज्यादा तैयार हैं। इससे क्षेत्रीय सिनेमा की पहुंच देश के दूसरे हिस्सों तक बढ़ी है।

श्रुति का मानना है कि इस बदलाव से फिल्मकारों की जिम्मेदारी भी बढ़ी है। अब अलग-अलग क्षेत्रों की कहानियों को अधिक ईमानदारी और वास्तविकता के साथ पेश करने का अवसर है। इससे भारतीय सिनेमा में कहानी कहने के नए तरीके सामने आ सकते हैं।

'जो मेरे हित में था, उसे अपनाया और बाकी छोड़ दिया'

अपने करियर के मुश्किल दौर को याद करते हुए श्रुति हासन ने कहा कि उनकी शुरुआती फिल्मों में से एक 'लक' को दर्शकों से अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिली थी। फिल्म को लेकर उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, जिसे उन्होंने अपने करियर की बड़ी सीख के तौर पर लिया। अभिनेत्री ने आलोचनाओं को पूरी तरह नकारने के बजाय उनमें से उपयोगी बातों को अपनाया। 

उन्होंने कहा कि वह आलोचनाओं को एक तरह की 'छननी' की तरह देखती हैं। जो बात उनके काम और व्यक्तित्व को बेहतर बनाने में मदद करती है, उसे वह स्वीकार करती हैं, जबकि बेवजह की नकारात्मकता को पीछे छोड़ देती हैं।

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