213 करोड़ का सिकंदरपुर लेक फ्रंट बना धोबी घाट'उद्घाटन के कुछ ही समय बाद पाथ-वे और साइकिल ट्रैक पर सूखने लगे कपड़े

213 करोड़ रुपये की लागत से बने सिकंदरपुर लेक फ्रंट पर पाथ-वे और साइकिल ट्रैक पर कपड़े सुखाने की तस्वीरें सामने आई हैं। उद्घाटन के बाद रखरखाव और निगरानी पर सवाल उठ रहे हैं।
213 करोड़ का सिकंदरपुर लेक फ्रंट बना  धोबी घाट'उद्घाटन के कुछ ही समय बाद पाथ-वे और साइकिल ट्रैक पर सूखने लगे कपड़े
Photo Credit / Attribution: Google

मुजफ्फरपुर: Muzaffarpur में करीब 213 करोड़ रुपये की लागत से विकसित सिकंदरपुर लेक फ्रंट एक बार फिर चर्चा में है। आधुनिक पर्यटन और सार्वजनिक उपयोग की दृष्टि से तैयार किए गए इस प्रोजेक्ट की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। इन तस्वीरों में पाथ-वे, साइकिल ट्रैक और लेक फ्रंट के अन्य हिस्सों पर कपड़े सूखते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसी वजह से लोग इस परियोजना को व्यंग्य में 'धोबी घाट' कहकर संबोधित कर रहे हैं।

बताया जा रहा है कि इस लेक फ्रंट का उद्घाटन हाल ही में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने किया था। उद्घाटन के समय इसे शहर की सबसे बड़ी और आधुनिक विकास परियोजनाओं में से एक बताया गया था। इसका उद्देश्य नागरिकों को मॉर्निंग वॉक, साइकिलिंग, मनोरंजन और पर्यटन के लिए बेहतर सार्वजनिक स्थान उपलब्ध कराना था।

हालांकि उद्घाटन के कुछ ही समय बाद सामने आई तस्वीरों ने रखरखाव और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वायरल तस्वीरों में सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाए गए रास्तों और साइकिल ट्रैक पर कपड़े फैले दिखाई दे रहे हैं। इससे स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के बीच परियोजना के रखरखाव को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इतनी बड़ी लागत से विकसित परियोजना की नियमित निगरानी और रखरखाव होना चाहिए। उनका मानना है कि यदि सार्वजनिक स्थानों का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अलावा अन्य कार्यों के लिए होने लगेगा, तो परियोजना की सुंदरता और उपयोगिता दोनों प्रभावित होंगी।

शहरी विकास से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आधुनिक सार्वजनिक परियोजना की सफलता केवल उसके निर्माण पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके नियमित रखरखाव, सुरक्षा व्यवस्था और नागरिकों की सहभागिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि निगरानी व्यवस्था मजबूत न हो तो करोड़ों रुपये की लागत से विकसित परिसंपत्तियां भी अपनी उपयोगिता खो सकती हैं।

स्थानीय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों से लोगों ने मांग की है कि लेक फ्रंट पर नियमित गश्त, साफ-सफाई और निगरानी की व्यवस्था को और मजबूत किया जाए। साथ ही लोगों को सार्वजनिक संपत्ति के सही उपयोग के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान चलाने की भी आवश्यकता बताई जा रही है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ और व्यवस्थित बनाए रखना केवल प्रशासन की ही नहीं, बल्कि नागरिकों की भी साझा जिम्मेदारी है। यदि लोग स्वयं सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान करेंगे तो ऐसी परियोजनाओं का लाभ लंबे समय तक मिल सकेगा।

फिलहाल लेक फ्रंट की वायरल तस्वीरों को लेकर चर्चा जारी है। इन तस्वीरों के सामने आने के बाद परियोजना के रखरखाव और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। संबंधित अधिकारियों की ओर से इस संबंध में जो भी आधिकारिक कार्रवाई या स्पष्टीकरण होगा, उससे आगे की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी

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