Sixth Schedule of Indian Constitution: क्या है संविधान की छठी अनुसूची? लद्दाख क्यों मांग रहा है विशेष दर्जा

भारतीय संविधान की छठी अनुसूची क्या है और इससे आदिवासी क्षेत्रों को कौन-से अधिकार मिलते हैं? जानें लद्दाख इसकी मांग क्यों कर रहा है, जमीन, रोजगार, संस्कृति और

केंद्र सरकार और लद्दाख के स्थानीय नेताओं के बीच गुरुवार को केंद्रशासित प्रदेश से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर बैठक हुई। हालांकि, पर्यावरणविद और शिक्षाविद सोनम वांगचुक ने इस बातचीत को संतोषजनक नहीं बताया।

Sixth Schedule of Indian Constitution: लद्दाख में भूमि, संस्कृति, पर्यावरण और स्थानीय लोगों के रोजगार की सुरक्षा को लेकर संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग लंबे समय से उठ रही है। स्थानीय संगठनों का मानना है कि इस संवैधानिक व्यवस्था से क्षेत्र के लोगों को अपने संसाधनों और परंपराओं की रक्षा के लिए अधिक अधिकार मिल सकते हैं। ऐसे में सवाल है कि संविधान की छठी अनुसूची क्या है, इसके तहत किस तरह के अधिकार मिलते हैं और लद्दाख इसे अपने लिए क्यों जरूरी मानता है?

लद्दाख को लेकर केंद्र और स्थानीय नेताओं के बीच बातचीत

केंद्र सरकार और लद्दाख के स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच क्षेत्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर बातचीत जारी है। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) जैसे संगठन लंबे समय से संवैधानिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। इनकी प्रमुख मांगों में लद्दाख को छठी अनुसूची के दायरे में लाना भी शामिल है।

पर्यावरणविद और शिक्षाविद सोनम वांगचुक ने हालिया बैठक को संतोषजनक नहीं बताया। इस मुद्दे पर अगली बैठक 22 अक्टूबर को प्रस्तावित है। स्थानीय संगठनों का कहना है कि लद्दाख की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों, सांस्कृतिक पहचान और सीमित प्राकृतिक संसाधनों को देखते हुए यहां के लोगों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक भागीदारी मिलनी चाहिए।

क्या है संविधान की छठी अनुसूची?

भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में पूर्वोत्तर के कुछ जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 244(2) और अनुच्छेद 275(1) से जुड़ा है। इसका उद्देश्य जनजातीय समुदायों की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय हितों की रक्षा करते हुए उन्हें प्रशासन में स्वायत्तता देना है।

इस व्यवस्था के तहत स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils-ADCs) और कुछ क्षेत्रों में क्षेत्रीय परिषदों का गठन किया जाता है। इन परिषदों को संविधान और संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत निर्धारित विषयों पर अधिकार प्राप्त होते हैं। इनके अधिकारों में भूमि के उपयोग, गैर-आरक्षित वनों, कृषि, गांवों के प्रशासन, परंपरागत रीति-रिवाजों और सामाजिक संस्थाओं से जुड़े कुछ मामलों में नियम बनाने की शक्तियां शामिल हो सकती हैं। 

परिषदों को कुछ कर लगाने और स्थानीय प्रशासन से संबंधित कार्य करने के अधिकार भी दिए गए हैं। हालांकि, इन परिषदों को पूर्ण स्वतंत्र सरकार नहीं माना जा सकता। उनकी शक्तियां संवैधानिक प्रावधानों, राज्य के कानूनों और अन्य लागू नियमों से निर्धारित होती हैं।

किन राज्यों में लागू है छठी अनुसूची?

Sixth Schedule of Indian Constitution: क्या है संविधान की छठी अनुसूची? लद्दाख क्यों मांग रहा है विशेष दर्जा

वर्तमान में संविधान की छठी अनुसूची चार पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ जनजातीय क्षेत्रों में लागू है।

  • असम: कुछ जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों के माध्यम से प्रशासनिक व्यवस्था।
  • मेघालय: खासी, जयंतिया और गारो समुदायों से जुड़े क्षेत्रों में स्वायत्त परिषदें।
  • त्रिपुरा: जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन और स्थानीय हितों की रक्षा के लिए स्वायत्त जिला परिषद।
  • मिजोरम: कुछ जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों की व्यवस्था।

यह विशेष व्यवस्था इन चारों राज्यों के पूरे क्षेत्र में समान रूप से लागू नहीं है, बल्कि संविधान में निर्धारित संबंधित जनजातीय क्षेत्रों तक सीमित है।

लद्दाख छठी अनुसूची में शामिल क्यों होना चाहता है?

लद्दाख वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग होकर केंद्रशासित प्रदेश बना था। इसके बाद से क्षेत्र में भूमि, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा को लेकर मांगें उठती रही हैं। लद्दाख के स्थानीय संगठनों का तर्क है कि यहां की आबादी, भौगोलिक परिस्थितियां और नाजुक पारिस्थितिकी इसे अन्य क्षेत्रों से अलग बनाती हैं। पर्यटन, बुनियादी ढांचे और आर्थिक गतिविधियों के विस्तार के बीच स्थानीय समुदायों को आशंका है कि पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में उनकी जमीन, पारंपरिक जीवनशैली और रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त परिषदों जैसी व्यवस्था मिलने से स्थानीय लोगों की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ सकती है। हालांकि, लद्दाख को इस अनुसूची में शामिल करने के लिए संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता होगी।

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