सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उम्र की पुष्टि यानी Age Verification को लेकर नियम सख्त किए जा रहे हैं। इसका मकसद बच्चों को हानिकारक कंटेंट से बचाना है। Instagram और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म अलग-अलग तकनीकों से यूजर की उम्र की जांच कर रहे हैं, लेकिन इससे प्राइवेसी को लेकर चिंता भी बढ़ रही है।
Social Media Age Verification: सोशल मीडिया पर बच्चों की बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए Instagram, YouTube जैसे प्लेटफॉर्म्स और सरकारें उम्र की पुष्टि को अनिवार्य करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। यह प्रक्रिया अलग-अलग देशों में ऑनलाइन सुरक्षा के तहत लागू या प्रस्तावित की जा रही है, ताकि नाबालिग यूजर्स को हानिकारक कंटेंट से बचाया जा सके। इसके लिए आईडी वेरिफिकेशन, AI फेस स्कैन और थर्ड पार्टी सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि, इस बदलाव से डेटा प्राइवेसी और डिजिटल निगरानी को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है।
सोशल मीडिया पर उम्र की पुष्टि क्यों हो रही जरूरी
बच्चों की इंटरनेट पहुंच तेजी से बढ़ने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उम्र की पुष्टि यानी Age Verification को लेकर नियम सख्त किए जा रहे हैं। सरकारें और टेक कंपनियां इसे बच्चों को गलत और नुकसानदायक कंटेंट से बचाने के लिए जरूरी कदम मान रही हैं।
Instagram और YouTube जैसे बड़े प्लेटफॉर्म अब ऐसे सिस्टम पर काम कर रहे हैं, जिनसे यूजर की उम्र की सही पहचान हो सके। इसका मकसद नाबालिगों को अश्लील सामग्री, हिंसक वीडियो और ऑनलाइन धोखाधड़ी से सुरक्षित रखना है।
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कंपनियां कैसे कर रही हैं उम्र की पहचान
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स उम्र की पुष्टि के लिए अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। कई मामलों में यूजर से सरकारी पहचान पत्र मांगा जाता है, जबकि कुछ जगहों पर AI आधारित फेस एनालिसिस से उम्र का अनुमान लगाया जाता है।
इसके अलावा क्रेडिट कार्ड वेरिफिकेशन और थर्ड पार्टी सेवाओं का भी उपयोग किया जाता है। कंपनियों का कहना है कि इन तरीकों का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि यूजर की वास्तविक उम्र क्या है और उसी के अनुसार कंटेंट दिखाया जाए।
प्राइवेसी को लेकर क्यों बढ़ रही चिंता
जहां एक तरफ यह सिस्टम बच्चों की सुरक्षा के लिए अहम माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ डेटा प्राइवेसी को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। यूजर्स को अपनी पहचान और कभी-कभी बायोमेट्रिक जानकारी भी साझा करनी पड़ती है, जो सर्वर पर स्टोर हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह डेटा लीक हो जाए तो इसका गलत इस्तेमाल संभव है। साथ ही फेस स्कैन जैसी बायोमेट्रिक जानकारी बदली नहीं जा सकती, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है। कुछ जानकार इसे ऑनलाइन गुमनामी पर भी असर डालने वाला कदम मान रहे हैं।








