वाराणसी: उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक का नारा काफी चर्चा में है। Akhilesh Yadav लगातार इस फॉर्मूले को आगे बढ़ा रहे हैं और इसे सामाजिक न्याय की राजनीति का नया आधार बता रहे हैं। लेकिन पार्टी संगठन की संरचना पर नजर डालें तो एक अलग तस्वीर सामने आती है।
सूत्रों के मुताबिक, Samajwadi Party के जिलाध्यक्षों में करीब 70 प्रतिशत पद मुस्लिम और यादव समुदाय के नेताओं के पास हैं। इससे यह सवाल उठने लगा है कि जब पार्टी PDA की बात कर रही है तो संगठन में अन्य पिछड़ी जातियों और दलितों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे सपा की पारंपरिक सामाजिक संरचना और भरोसे की राजनीति काम कर रही है। लंबे समय से पार्टी की मुख्य राजनीतिक ताकत यादव और मुस्लिम वोट बैंक को माना जाता रहा है। यही वजह है कि संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर इन समुदायों के नेताओं की संख्या ज्यादा दिखाई देती है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में सपा की राजनीति की नींव भी इसी सामाजिक समीकरण पर टिकी रही है। पार्टी के संस्थापक Mulayam Singh Yadav के समय से ही यादव-मुस्लिम गठजोड़ को सपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता रहा है। चुनावी राजनीति में भी यह समीकरण कई बार पार्टी को मजबूत स्थिति में लाता रहा है।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सपा ने अपने सामाजिक आधार को बढ़ाने की कोशिश की है। खासतौर पर गैर-यादव पिछड़ी जातियों और दलित समुदाय को जोड़ने के लिए PDA का नारा दिया गया है। अखिलेश यादव कई मंचों से यह कहते रहे हैं कि समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों को एक साथ लाकर राजनीतिक संतुलन बनाया जाएगा।
इसके बावजूद संगठनात्मक ढांचे में अभी भी वही पुराने समीकरण ज्यादा प्रभावी नजर आते हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि जिलाध्यक्ष जैसे अहम पदों पर ऐसे नेताओं को प्राथमिकता दी जाती है, जिन पर नेतृत्व को मजबूत भरोसा हो और जो लंबे समय से पार्टी से जुड़े रहे हों।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, जिलाध्यक्ष का पद चुनावी रणनीति में बेहद अहम होता है। यही नेता जिले में पार्टी की गतिविधियों को संचालित करते हैं, कार्यकर्ताओं को जोड़ते हैं और चुनाव के दौरान बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय रखते हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व अक्सर भरोसेमंद और पुराने नेताओं को ही इन पदों पर नियुक्त करता है।
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अखिलेश यादव एक तरफ नए सामाजिक गठबंधन की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ संगठन की कमान अभी भी अपने पारंपरिक आधार के भरोसे चला रहे हैं। इसका मकसद यह भी हो सकता है कि पार्टी के कोर वोट बैंक को मजबूत बनाए रखा जाए और साथ-साथ नए वर्गों को जोड़ने की कोशिश भी जारी रहे।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में सपा का PDA फॉर्मूला आने वाले चुनावों में कितना प्रभावी साबित होगा, यह काफी हद तक इस बात पर भी निर्भर करेगा कि पार्टी संगठन में विभिन्न समुदायों को कितनी भागीदारी देती है।
फिलहाल सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि PDA के नारे और संगठन की वास्तविक संरचना के बीच का यह अंतर आने वाले समय में सपा की रणनीति को किस दिशा में ले जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी अपने नए सामाजिक समीकरण को संगठन में भी मजबूत करती है तो इसका असर आने वाले चुनावों में देखने को मिल सकता है।












