ब्राजील को वर्ल्ड कप से बाहर करने वाले कोच स्टॉल सोलबाकेन की प्रेरणादायक कहानी, 25 साल पहले थम गई थी धड़कन

नॉर्वे के कोच स्टॉल सोलबाकेन ने ब्राजील को हराकर इतिहास रचा। 25 साल पहले 7 मिनट थम चुकी थी धड़कन, अब टीम को पहली बार वर्ल्ड कप क्वार्टर फाइनल पहुंचाया।

नॉर्वे के कोच स्टॉल सोलबाकेन ने फुटबॉल वर्ल्ड कप में ब्राजील को हराकर इतिहास रच दिया। 25 साल पहले सात मिनट तक दिल की धड़कन रुकने के बाद भी उन्होंने वापसी की और अब नॉर्वे को पहली बार क्वार्टर फाइनल में पहुंचाया।

स्पोर्ट्स न्यूज़: फुटबॉल वर्ल्ड कप में नॉर्वे की ऐतिहासिक जीत के पीछे सिर्फ खिलाड़ियों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मुख्य कोच स्टॉल सोलबाकेन की संघर्ष और वापसी की कहानी भी छिपी है। पांच बार की विश्व चैंपियन ब्राजील को हराकर नॉर्वे को पहली बार वर्ल्ड कप क्वार्टर फाइनल में पहुंचाने वाले सोलबाकेन ने अपने करियर में मौत को भी मात दी है।

करीब 25 साल पहले सोलबाकेन का दिल सात मिनट तक धड़कना बंद हो गया था। डॉक्टरों ने उनके फुटबॉल करियर को खत्म मान लिया था और परिवार को भी उनके बचने की उम्मीद नहीं थी। लेकिन उन्होंने जिंदगी की उस सबसे कठिन लड़ाई को जीतकर अब फुटबॉल की दुनिया में एक नया इतिहास रच दिया है।

सात मिनट तक बंद रही दिल की धड़कन, फिर हुई शानदार वापसी

सोलबाकेन के जीवन का सबसे मुश्किल दौर साल 2001 में आया, जब वह खिलाड़ी के रूप में सक्रिय थे। एक प्रशिक्षण सत्र के दौरान उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा और उनका दिल काम करना बंद कर गया। करीब सात मिनट तक उनकी धड़कन नहीं चली। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां वह लगभग 26 घंटे तक कोमा में रहे। 

डॉक्टरों को लगा कि शायद वह दोबारा सामान्य जीवन नहीं जी पाएंगे। सोलबाकेन ने उस दौर को याद करते हुए एक बार कहा था कि उनकी मां उनके अंतिम संस्कार की तैयारी करने तक की स्थिति में पहुंच गई थीं। हालांकि, उन्होंने असाधारण वापसी की और कुछ वर्षों बाद कोच के रूप में फुटबॉल की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई।

खिलाड़ी रहते भी ब्राजील के खिलाफ रचा था इतिहास

स्टॉल सोलबाकेन का ब्राजील के खिलाफ यह पहला ऐतिहासिक पल नहीं है। 1998 के फुटबॉल वर्ल्ड कप में वह नॉर्वे की टीम का हिस्सा थे, जिसने तत्कालीन विश्व चैंपियन ब्राजील को हराया था। उस मुकाबले में नॉर्वे ने ग्रुप चरण के आखिरी मैच में ब्राजील को 2-1 से शिकस्त दी थी। इस जीत के बाद नॉर्वे पहली बार वर्ल्ड कप के नॉकआउट चरण में पहुंचा था। करीब तीन दशक बाद सोलबाकेन ने बतौर कोच एक बार फिर ब्राजील को हराकर नॉर्वे फुटबॉल इतिहास में अपना नाम दर्ज करा दिया।

खिलाड़ी से कोच बनने तक का सफर

फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में करियर खत्म होने के बाद सोलबाकेन ने कोचिंग की शुरुआत की। उन्होंने कई यूरोपीय क्लबों के साथ काम किया और अपनी रणनीतिक समझ के दम पर सफलता हासिल की।

उन्हें सबसे ज्यादा पहचान एफसी कोपेनहेगन के साथ मिली। उनके नेतृत्व में क्लब ने कई घरेलू खिताब जीते और यूरोपीय प्रतियोगिताओं में भी मजबूत प्रदर्शन किया। दिसंबर 2020 में सोलबाकेन को नॉर्वे की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया गया। शुरुआत में उनके सामने कई चुनौतियां थीं। टीम 2022 फीफा वर्ल्ड कप और 2024 यूरोपीय चैंपियनशिप के लिए क्वालिफाई नहीं कर सकी। इसके बावजूद नॉर्वे फुटबॉल संघ ने उन पर भरोसा बनाए रखा और इसका परिणाम 2026 वर्ल्ड कप में देखने को मिला।

नॉर्वे ने क्वालिफायर में दिखाया दम

2026 वर्ल्ड कप क्वालिफायर में नॉर्वे ने शानदार प्रदर्शन किया। टीम ने अपने सभी आठ मुकाबले जीतकर सीधे टूर्नामेंट के लिए क्वालिफाई किया। वर्ल्ड कप में भी टीम का प्रदर्शन लगातार बेहतर रहा। ग्रुप चरण पार करने के बाद नॉर्वे ने पहले आइवरी कोस्ट को हराया और फिर ब्राजील जैसी मजबूत टीम को टूर्नामेंट से बाहर कर दिया। यह जीत नॉर्वे के फुटबॉल इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानी जा रही है।

हालैंड और ओडेगार्ड की पीढ़ी ने बदली नॉर्वे की तस्वीर

नॉर्वे की इस सफलता में नई पीढ़ी के खिलाड़ियों का बड़ा योगदान रहा है। टीम में इर्लिंग हालैंड, मार्टिन ओडेगार्ड और अलेक्जेंडर सोरलोथ जैसे विश्वस्तरीय खिलाड़ी मौजूद हैं। ब्राजील के खिलाफ मुकाबले में इर्लिंग हालैंड ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दो गोल किए। इस टूर्नामेंट में उनके गोलों की संख्या सात तक पहुंच गई है। हालैंड की आक्रामक क्षमता और ओडेगार्ड की रचनात्मक खेल शैली ने नॉर्वे को एक मजबूत टीम के रूप में स्थापित किया है।

सोलबाकेन ने बताया इसे नॉर्वे फुटबॉल का सबसे बड़ा दिन

ब्राजील पर जीत के बाद स्टॉल सोलबाकेन ने कहा कि यह नॉर्वे फुटबॉल इतिहास का सबसे बड़ा दिन है। उन्होंने खिलाड़ियों की तारीफ करते हुए कहा कि इस टीम ने केवल एक मैच नहीं जीता, बल्कि पूरे देश का इतिहास बदल दिया है। सोलबाकेन के लिए यह जीत सिर्फ एक फुटबॉल मुकाबले की सफलता नहीं थी, बल्कि उस इंसान की जीत थी जिसने कभी जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष किया था। एक समय जिस खिलाड़ी के करियर को खत्म माना जा रहा था, वही आज दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल मंच पर अपनी टीम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहा है।

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