सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में 50% महिला आरक्षण की मांग पर सुनवाई से किया इनकार, बताया नीतिगत मामला

Supreme Court of India ने न्यायपालिका में 50% महिला आरक्षण की मांग पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने इसे नीतिगत मामला बताते हुए हस्तक्षेप से दूरी बनाई

Supreme Court of India ने गुरुवार को न्यायपालिका और सरकारी वकीलों के पदों पर महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका और सरकारी वकीलों के पदों पर महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह विषय नीतिगत निर्णय से जुड़ा है, जिस पर न्यायपालिका सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी मांग संबंधित सक्षम प्राधिकरण के समक्ष रखने की सलाह दी।

यह मामला देश की न्यायिक व्यवस्था में लैंगिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने से जुड़ा था, जिसमें हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और जिला न्यायालयों में महिला जजों और सरकारी वकीलों के लिए बराबरी के अवसर और आरक्षण की मांग की गई थी।

याचिका में क्या मांग की गई थी?

याचिका में कहा गया था कि न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी काफी कम है और इसे बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्तियों में कम से कम 50% महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए. जिला अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक सरकारी पक्ष से केस लड़ने वाले वकीलों के पदों पर भी 50% आरक्षण लागू किया जाए

याचिका में यह तर्क दिया गया कि न्यायपालिका जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में लैंगिक संतुलन लोकतांत्रिक व्यवस्था को और मजबूत करेगा। याचिका में संसद में प्रस्तुत आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि देशभर में कुल 813 कार्यरत जजों में केवल 116 महिलाएं हैं, जो लगभग 14.27 प्रतिशत हिस्सेदारी है। सुप्रीम कोर्ट में स्थिति और भी कमज़ोर बताई गई, जहां वर्तमान में केवल एक महिला जज कार्यरत हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में 50% महिला आरक्षण की मांग पर सुनवाई से किया इनकार, बताया नीतिगत मामला

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के निर्णय नीति-निर्माण के दायरे में आते हैं। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका या नियुक्ति व्यवस्था में इस प्रकार का संरचनात्मक बदलाव विधायी और प्रशासनिक स्तर पर ही संभव है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे अपनी मांग संबंधित प्राधिकरण या नीति-निर्माण संस्थाओं के सामने रखें।

इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य याचिका पर भी सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग की गई थी। याचिका में सुझाव दिया गया था कि जो नागरिक जानबूझकर वोट न दें, उन पर जुर्माना लगाया जाए या उनकी सरकारी सुविधाएं सीमित की जाएं। इस पर चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि यदि कोई व्यक्ति रोजगार या मजबूरी के कारण मतदान नहीं कर पाता, तो क्या उसे दंडित किया जाना चाहिए।

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