भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अहम सवाल पूछा है कि क्या केवल बंगाली भाषा बोलने के आधार पर किसी व्यक्ति को निर्वासित (Deport) किया जा सकता है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या केवल बंगाली भाषा बोलने के आधार पर किसी व्यक्ति को निर्वासन का सामना करना पड़ रहा है। अदालत ने इस मुद्दे पर गंभीरता जताते हुए कहा कि भाषा को पहचान का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। हालांकि, शीर्ष अदालत ने केंद्र के इस तर्क से सहमति भी जताई कि सीमा सुरक्षा बलों (BSF) को अवैध प्रवासियों के प्रवेश को रोकने का अधिकार है, क्योंकि ऐसे लोग देश की जनसांख्यिकी और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं तथा राष्ट्रीय संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने शुक्रवार को सुनवाई के दौरान कहा कि भारत में नागरिकता का निर्धारण न्यायसंगत प्रक्रिया से ही किया जा सकता है। पश्चिम बंगाल प्रवासी श्रमिक कल्याण बोर्ड की ओर से एडवोकेट प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि कई लोगों को केवल बंगाली भाषा बोलने के कारण निर्वासित किया जा रहा है।
उन्होंने दलील दी कि बिना किसी सक्षम अधिकारी या न्यायाधिकरण द्वारा नागरिकता सत्यापन के, लोगों को देश से बाहर निकालना अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है। भूषण ने यह भी कहा कि ऐसे लोग भारत और बांग्लादेश दोनों देशों की सीमा सुरक्षा बलों से गोलीबारी का शिकार हो रहे हैं, जो कि पूरी तरह अवैध है।
पीठ ने साफ कहा कि केवल भाषा को विदेशी या नागरिक की पहचान का साधन नहीं माना जा सकता। सीमा सुरक्षा बलों को अवैध प्रवासियों को रोकने का अधिकार है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति भारतीय सीमा के भीतर है, तो उसके निर्वासन के लिए उचित प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। क्या बंगाली बोलने वालों को स्वतः विदेशी मान लिया जाता है? यह गंभीर सवाल है।
केंद्र सरकार का पक्ष
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के सवाल पर जवाब देते हुए कहा: बंगाली बोलना निर्वासन का आधार नहीं है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत “अवैध प्रवासियों की राजधानी” नहीं बन सकता। उनका आरोप था कि कुछ राज्य संगठित रैकेट के जरिए अवैध प्रवासियों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।उन्होंने यूरोपीय देशों की समस्याओं का उदाहरण देते हुए कहा कि बड़ी संख्या में प्रवासी उनकी सामाजिक और सुरक्षा व्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं।
मेहता ने व्यंग्यात्मक लहजे में यह भी कहा कि अगर प्रशांत भूषण प्रवासियों के इतने समर्थक हैं, तो उन्हें अमेरिका जाकर उनकी मदद करनी चाहिए। अदालत ने भी स्वीकार किया कि अवैध प्रवासी एक गंभीर समस्या हैं। वे न केवल भारत की सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरा हैं, बल्कि देश की जनसांख्यिकी और संसाधनों पर भी दबाव डालते हैं।
अदालत ने कहा कि असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाएं कई जगहों पर खुली हैं, जिससे बांग्लादेश से बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी आते हैं। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि भाषा या संस्कृति को निर्वासन का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
सीमा पर दीवार या बाड़?
सुनवाई के दौरान जजों ने अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर दीवार बनाने का उदाहरण देते हुए पूछा, क्या भारत भी ऐसी दीवार बनाने की योजना पर काम कर रहा है? इस पर मेहता ने बताया कि भारत पहले से ही बांग्लादेश सीमा पर बाड़ (Fence) लगा रहा है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट खुद भी इस मुद्दे की निगरानी कर रहा है।
पीठ ने कहा कि अवैध प्रवासियों को वापस भेजना कोई समस्या नहीं है, लेकिन किसी भी व्यक्ति की पहचान और नागरिकता की जांच किए बिना ऐसा कदम उठाना न्यायसंगत नहीं होगा।