पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन, 10 रुपये के पहले इनाम से विश्व मंच तक का रहा प्रेरक सफर

पद्म विभूषण तीजन बाई का 70 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 10 रुपये के पहले पुरस्कार से शुरू हुआ उनका सफर विश्व मंच तक पहुंचा।

पंडवानी की प्रसिद्ध लोकगायिका पद्म विभूषण तीजन बाई का 70 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 10 रुपये के पहले पुरस्कार से शुरू हुआ उनका सफर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों और अंतरराष्ट्रीय पहचान तक पहुंचा।

रायपुर: छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध पंडवानी लोकगायिका और पद्म विभूषण सम्मानित तीजन बाई का रविवार को रायपुर एम्स में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्होंने अपनी अनूठी गायन शैली से भारतीय लोककला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया और कई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनीं।

13 साल की उम्र में शुरू हुआ था सफर

छत्तीसगढ़ की लोककला पंडवानी को देश और दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली तीजन बाई अब इस दुनिया में नहीं रहीं। रविवार को 70 वर्ष की आयु में रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में उनका निधन हो गया। उनके निधन से लोककला जगत और सांस्कृतिक क्षेत्र में शोक की लहर है।

साल 1956 में दुर्ग जिले में जन्मीं तीजन बाई का नाम उनके जन्म के दिन तीज पर्व के कारण रखा गया था। उन्होंने महज 13 वर्ष की उम्र में चंदखुरी गांव में पहली बार सार्वजनिक मंच पर पंडवानी की प्रस्तुति दी। उसी कार्यक्रम में उन्हें 10 रुपये का पुरस्कार मिला, जो उनके जीवन का पहला सम्मान था। यही छोटी-सी शुरुआत आगे चलकर एक ऐतिहासिक सफर में बदल गई।

संघर्षों के बीच बनाई अलग पहचान

तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। आर्थिक तंगी और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी कला को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने पंडवानी की कापालिक शैली, यानी खड़े होकर महाभारत की कथा प्रस्तुत करने की परंपरा को लोकप्रिय बनाया। उनकी प्रभावशाली प्रस्तुति, अभिनय और आवाज ने उन्हें देशभर में अलग पहचान दिलाई।

धीरे-धीरे उनकी लोकप्रियता भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुंची। उन्होंने फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, अमेरिका और कई अन्य देशों में भारतीय लोककला का प्रतिनिधित्व किया। पेरिस में आयोजित भारत महोत्सव में उनकी प्रस्तुति को विशेष सराहना मिली। उनके प्रति लोगों का सम्मान इतना था कि एक प्रशंसक ने केवल "Teejan Bai, India" लिखकर पत्र भेजा और वह चिट्ठी भी उनके पास पहुंच गई। यह घटना उनकी वैश्विक पहचान का अनोखा उदाहरण मानी जाती है।

पद्म श्री से पद्म विभूषण तक का सफर

तीजन बाई को भारतीय लोककला में उनके असाधारण योगदान के लिए देश के कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें 1987 में पद्म श्री, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इन सम्मानों ने न केवल उनकी कला को सम्मान दिया, बल्कि पंडवानी जैसी पारंपरिक लोकगायन शैली को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई।

उन्होंने अपने जीवन में अनेक युवा कलाकारों को भी लोककला से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उनकी प्रस्तुतियां केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोक परंपरा और महाभारत की कथाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने का सशक्त माध्यम भी थीं।

लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति

तीजन बाई के निधन को भारतीय लोक संस्कृति के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है। कला जगत, साहित्यकारों, सांस्कृतिक संस्थाओं और उनके प्रशंसकों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी है। उनके जीवन की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा, मेहनत और समर्पण के बल पर सीमित संसाधनों से भी विश्व स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है।

10 रुपये के पहले पुरस्कार से शुरू हुआ उनका सफर देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण तक पहुंचा। अपनी कला, संघर्ष और समर्पण के कारण तीजन बाई हमेशा भारतीय लोककला के इतिहास में एक प्रेरणादायक नाम के रूप में याद की जाएंगी।

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