तृणमूल कांग्रेस के ‘असली गुट’ विवाद पर संवैधानिक विशेषज्ञों ने कहा है कि अंतिम फैसला चुनाव आयोग के पास है। बागी सांसद लोकसभा अध्यक्ष से मान्यता चाहते हैं, लेकिन फिलहाल उन्हें अलग समूह का दर्जा नहीं मिल सकता।
नई दिल्ली/कोलकाता: भारत की राजनीति में एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर चल रहे विवाद ने संवैधानिक बहस को जन्म दे दिया है। पार्टी के भीतर बने एक बागी गुट ने खुद को “असली तृणमूल” बताते हुए लोकसभा में अलग मान्यता की मांग करने की तैयारी शुरू कर दी है। इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि किसी राजनीतिक दल के असली गुट का निर्णय आखिर कौन करता है—लोकसभा अध्यक्ष या भारत का निर्वाचन आयोग?
बागी सांसदों का दावा और संसद में बढ़ता विवाद
तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों ने दावा किया है कि उनके पास पर्याप्त समर्थन है और वही वास्तविक संसदीय दल का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह समूह अब लोकसभा अध्यक्ष Om Birla से मुलाकात कर “असली तृणमूल” के रूप में मान्यता मांगने की तैयारी कर रहा है।
इस कदम से संसद में राजनीतिक तनाव बढ़ गया है और पार्टी की आंतरिक एकता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
संवैधानिक विशेषज्ञों की राय: अंतिम अधिकार चुनाव आयोग के पास
संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ पी. डी. टी. आचारी के अनुसार, “असली पार्टी” तय करने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष के पास सीमित है। उनका कहना है कि ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय भारत का निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) लेता है।
उनके अनुसार, जब किसी पार्टी के भीतर दो या अधिक गुट यह दावा करते हैं कि वही असली संगठन हैं, तब यह विवाद केवल संसदीय प्रक्रिया नहीं रह जाता बल्कि संवैधानिक और चुनावी अधिकार क्षेत्र में चला जाता है।
दलबदल विरोधी कानून और 10वीं अनुसूची की भूमिका
यह पूरा विवाद दलबदल विरोधी कानून और संविधान की 10वीं अनुसूची से जुड़ा हुआ है। इस कानून का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना और दल-बदल को रोकना है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक किसी गुट को आधिकारिक रूप से अलग पार्टी या मान्यता प्राप्त संसदीय दल का दर्जा नहीं मिलता, तब तक उसे संसद में अलग इकाई के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती।

लोकसभा अध्यक्ष की सीमित भूमिका
इस मामले में लोकसभा अध्यक्ष Om Birla की भूमिका मुख्य रूप से यह तय करने तक सीमित रहती है कि कोई सांसद दलबदल कानून का उल्लंघन कर रहा है या नहीं।
लेकिन “असली पार्टी कौन है” जैसे बड़े संगठनात्मक विवाद का अंतिम निर्णय उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
संसद में सीटिंग और मान्यता का नियम
वर्तमान स्थिति में तृणमूल कांग्रेस को पहले से ही लोकसभा में आधिकारिक मान्यता प्राप्त है और उसकी सीटिंग व्यवस्था तय है।
इसलिए किसी भी बागी गुट को अलग संसदीय दल या अलग सीटें तब तक नहीं मिल सकतीं जब तक उसे चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त न हो जाए।
अभी संसद में केवल एक ही तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल वैध माना जा रहा है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि: पार्टी में बढ़ता असंतोष
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद से तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष बढ़ता गया है। लोकसभा में पार्टी के 28 सांसद और राज्यसभा में 13 सांसद हैं, जिनमें से कुछ ने इस्तीफा दे दिया है।
हाल के दिनों में वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय के बागी खेमे में शामिल होने की खबरों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है, जिससे पार्टी नेतृत्व पर दबाव बढ़ गया है।
आगे की कानूनी प्रक्रिया क्या होगी
यदि बागी गुट अपने दावे को आगे बढ़ाना चाहता है, तो उसे चुनाव आयोग के सामने औपचारिक रूप से अपना पक्ष रखना होगा।
उन्हें यह साबित करना होगा कि उनके पास अधिक सांसदों और विधायकों का समर्थन है और वे ही पार्टी संगठन पर नियंत्रण रखते हैं। इसके बाद आयोग दोनों पक्षों की सुनवाई करेगा और एक अंतिम निर्णय देगा, जो न्यायिक समीक्षा के दायरे में भी आ सकता है।












