उईगर मुसलमानों पर चीन का सख्त रुख, दुनिया में बढ़ी चिंता

उईगर मुसलमानों पर चीन का सख्त रुख, दुनिया में बढ़ी चिंता

चीन में उईगर मुसलमानों पर सख्ती को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ गई है। मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि शिनजियांग में धार्मिक पाबंदियां जारी हैं और विदेशों में रह रहे उईगरों को भी चीन लौटने का दबाव झेलना पड़ रहा है।

China: चीन में उईगर मुसलमानों को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंता सामने आई है। हालिया रिपोर्ट्स और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के दावों के अनुसार, चीन ने उईगर मुसलमानों पर अपनी सख्ती और तेज कर दी है। यह मुद्दा केवल चीन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अब इसका असर कई देशों तक फैलता दिख रहा है। कहा जा रहा है कि चीन अब उन उईगर मुसलमानों को भी निशाने पर ले रहा है, जो देश छोड़कर विदेशों में शरण ले चुके हैं।

शिनजियांग से शुरू हुआ विवाद

उईगर मुसलमान मुख्य रूप से चीन के शिनजियांग क्षेत्र में रहते हैं। यह इलाका लंबे समय से चीन सरकार की नीतियों और सुरक्षा कार्रवाइयों को लेकर चर्चा में रहा है। चीन का कहना है कि वह कट्टरपंथ और अलगाववाद से निपटने के लिए सख्त कदम उठा रहा है। वहीं मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इन कार्रवाइयों की आड़ में उईगर मुसलमानों के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक अधिकारों का हनन हो रहा है।

धार्मिक स्वतंत्रता पर पाबंदियों के आरोप

रिपोर्ट्स के मुताबिक शिनजियांग में उईगर मुसलमानों को धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन में कई तरह की पाबंदियों का सामना करना पड़ता है। दाढ़ी रखने, पारंपरिक कपड़े पहनने और धार्मिक शिक्षा देने तक पर निगरानी रखी जाती है। मस्जिदों के निर्माण और उनके डिजाइन तक में चीनी संस्कृति को प्राथमिकता देने का दबाव बताया जाता है। इन नीतियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

डिटेंशन कैंप का मुद्दा

साल 2017 से 2019 के बीच चीन पर यह आरोप लगे कि उसने शिनजियांग में बड़े पैमाने पर डिटेंशन कैंप बनाए। विभिन्न रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि करीब 10 लाख उईगर मुसलमानों को इन कैंपों में रखा गया। चीन सरकार ने इन्हें vocational training center बताया, जबकि आलोचकों का कहना है कि यहां जबरन नजरबंदी, मानसिक दबाव और श्रम कराया गया। यही वजह है कि यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र और कई पश्चिमी देशों में गंभीर बहस का विषय बना।

विदेश भागने वाले उईगरों की मुश्किलें

कई उईगर मुसलमान चीन की सख्त नीतियों से बचने के लिए देश छोड़कर तुर्की, थाईलैंड, यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में पहुंचे। शुरुआती दौर में उन्हें कुछ देशों में शरण भी मिली। लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। नई रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन इन देशों पर दबाव बना रहा है कि वे उईगर शरणार्थियों को वापस भेजें। इससे उन लोगों की चिंता बढ़ गई है, जो वर्षों से विदेशों में नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रहे थे।

जबरन प्रत्यर्पण के आरोप

मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया है कि कुछ देशों में उईगर मुसलमानों से चीन वापसी के लिए फॉर्म भरवाए जा रहे हैं। थाईलैंड से फरवरी में करीब 40 उईगरों को चीन भेजे जाने का दावा भी सामने आया। तुर्की को लेकर भी ऐसे आरोप लगे हैं, जहां बड़ी संख्या में उईगर रहते हैं। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या शरणार्थियों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

मुस्लिम देशों की चुप्पी पर सवाल

इस पूरे मुद्दे में एक बड़ा सवाल मुस्लिम देशों की भूमिका को लेकर भी उठ रहा है। कई लोग पूछ रहे हैं कि जब उईगर मुसलमानों के अधिकारों की बात आती है, तो अधिकांश मुस्लिम देश खुलकर सामने क्यों नहीं आ रहे। तुर्की, जिसे उईगरों के लिए एक सुरक्षित ठिकाना माना जाता था, उस पर भी चुप्पी और सहयोग के आरोप लगाए जा रहे हैं। इस स्थिति ने वैश्विक राजनीति में मानवाधिकार और कूटनीति के टकराव को और उजागर कर दिया है।

चीन का पक्ष क्या है

चीन सरकार बार-बार यह कहती रही है कि शिनजियांग में उठाए गए कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिए जरूरी हैं। उसका दावा है कि इन नीतियों से आतंकवाद पर काबू पाया गया है और क्षेत्र में विकास हुआ है। चीन अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं को राजनीतिक एजेंडा करार देता है। लेकिन इसके बावजूद रिपोर्ट्स और गवाहियों के चलते संदेह बना हुआ है।

अमेरिका और यूरोप की बदली नीतियां

अमेरिका और यूरोप में भी प्रवासी नीतियों में बदलाव हुआ है। सख्त इमिग्रेशन नियमों के कारण उईगर शरणार्थियों को वहां रहना अब पहले जितना आसान नहीं रहा। इससे चीन के दबाव का असर और गहरा हो गया है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति उईगरों के लिए नई मानवीय चुनौती बनती जा रही है।

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