US और Israel के हमलों के बाद Iran ने सात देशों में अमेरिकी एयरबेस निशाना बनाए। राष्ट्रपति Donald Trump ने चार हफ्तों तक सैन्य अभियान जारी रहने का संकेत दिया, जिससे वैश्विक चिंता बढ़ गई है।
US-Israel Attack: अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए जा रहे लगातार हमलों ने मध्य पूर्व को एक नए और खतरनाक दौर में पहुंचा दिया है। हालिया सैन्य कार्रवाई में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर सामने आई है। इस घटना के बाद ईरान के भीतर माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया है। जहां एक ओर बड़ी संख्या में लोग शोक मना रहे हैं, वहीं कुछ वर्ग ऐसे भी हैं जो इस बदलाव को अलग नजरिए से देख रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी चिंता बढ़ा दी है। दुनिया की बड़ी ताकतें स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और हर नया हमला हालात को और जटिल बना रहा है।
ईरान का पलटवार
अमेरिका और इजरायल की संयुक्त कार्रवाई के जवाब में ईरान ने भी तेज प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने दुनिया के सात देशों में स्थित अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाया है। इसके अलावा इजरायल पर मिसाइल और ड्रोन हमले भी किए गए हैं। इन हमलों में आम नागरिकों के हताहत होने की खबरें सामने आई हैं।
ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के उन देशों पर भी हमला किया है जो पश्चिमी सेनाओं की मेजबानी कर रहे हैं। इससे साफ है कि यह संघर्ष अब सीमित दायरे से निकलकर व्यापक क्षेत्रीय टकराव में बदलता जा रहा है।
डोनल्ड ट्रंप ने बताई युद्ध की रणनीति
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने इस पूरे ऑपरेशन को लेकर अपनी रणनीति और टाइमलाइन पर संकेत दिए हैं। एनबीसी को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि यह सैन्य अभियान लगभग चार हफ्तों तक चल सकता है। उन्होंने इसे अब तक के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण हमलों में से एक बताया।
ट्रंप के इस बयान से साफ है कि अमेरिका फिलहाल पीछे हटने के मूड में नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि जब तक तय सैन्य लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते, तब तक अभियान जारी रहेगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान ने जवाबी हमलों की रफ्तार तेज कर दी है।

युद्ध की नई टाइमलाइन से बढ़ी वैश्विक चिंता
डोनल्ड ट्रंप की चार हफ्तों की संभावित टाइमलाइन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। अगर संघर्ष इतना लंबा चलता है तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है।
मध्य पूर्व पहले ही अस्थिर क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई से हालात और बिगड़ सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि कूटनीतिक समाधान नहीं निकला तो यह संघर्ष बड़े युद्ध में बदल सकता है।
यूरोपीय देशों का रुख
ईरान की मिसाइल क्षमताओं को कमजोर करने के लिए ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने जरूरी और डिफेंसिव एक्शन का समर्थन किया है। हालांकि ब्रिटेन ने सीधे हमले में शामिल होने से दूरी बनाए रखी है।
लंदन ने अमेरिका को सीमित डिफेंसिव मकसदों के लिए अपने बेस के इस्तेमाल की अनुमति दी है। यह कदम इस बात का संकेत है कि यूरोप भी स्थिति को लेकर सतर्क है और सीधे युद्ध में कूदने के बजाय संतुलित भूमिका निभाना चाहता है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ती टेंशन
मिडिल ईस्ट में तनाव लगातार बढ़ रहा है। इजरायल पर हो रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों से वहां की आम जनता प्रभावित हो रही है। दूसरी ओर ईरान के भीतर भी हालात अस्थिर हैं।
इस पूरे संघर्ष का असर खाड़ी देशों पर भी दिख रहा है। पश्चिमी देशों के सैन्य ठिकानों पर हमले से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। कई देशों ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी है।











