मिडिल ईस्ट में ईरान-इजरायल के बढ़ते तनाव के बावजूद ओमान ने तटस्थ रुख अपनाया। मस्कट ने अपने एयरस्पेस और शहरों को सुरक्षित रखा। न्यूट्रल नीति, मजबूत ऐतिहासिक और आर्थिक रिश्तों ने इसे टकराव से दूर रखा।
Iran-US Conflict: मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद एक खाड़ी देश इस जंग से अछूता रहा है। ओमान, जिसे अक्सर मिडिल ईस्ट का स्विट्जरलैंड कहा जाता है, इसने ईरान की मिसाइलों और हमलों के बीच भी अपने एयरस्पेस और शहरों को सुरक्षित रखा। इसके पीछे ओमान की लंबे समय से अपनाई गई तटस्थ और संतुलित विदेश नीति है।
ओमान का ऐतिहासिक रिश्ता
ओमान और ईरान के रिश्तों की जड़ें 1970 के दशक तक जाती हैं। उस समय ओमान में धोफर विद्रोह हुआ था, जिसमें सुल्तान कबूस बिन सईद को विद्रोहियों के खिलाफ ईरान के शाह ने सहायता दी थी। उन्होंने हजारों ईरानी सैनिक भेजकर विद्रोह को दबाने में मदद की। इस सहयोग के बाद मस्कट और तेहरान के बीच एक मजबूत सुरक्षा और रणनीतिक संबंध स्थापित हुआ, जो दशकों तक बना रहा।
1979 के ईरान में सत्ता परिवर्तन के बाद भी कई खाड़ी देशों ने ईरान पर शक करना जारी रखा, लेकिन ओमान ने अपने रिश्ते को बनाए रखा। यह रिश्तों की स्थिरता और आपसी सम्मान पर आधारित रही।
मिडिल ईस्ट का स्विट्जरलैंड
ओमान ने हमेशा एक न्यूट्रल फॉरेन पॉलिसी अपनाई है। वह गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल का सदस्य होने के बावजूद ईरान-विरोधी देशों के साथ पूरी तरह से जुड़ने से बचता रहा है। मस्कट ने नॉन-इंटरवेंशन स्ट्रैटेजी अपनाते हुए ईरान और पश्चिमी देशों दोनों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखे हैं। यही कारण है कि ईरान के हालिया हमलों में भी ओमान को निशाना नहीं बनाया गया।

ओमान ने कई बार ईरान और उसके विरोधियों के बीच मीडिएटर का काम किया है। अमेरिका के साथ बैक-चैनल बातचीत में ओमान ने अहम भूमिका निभाई, जिससे 2015 की न्यूक्लियर डील संभव हो पाई। इस तरह ओमान हमेशा से दोनों पक्षों के बीच संवाद का पुल बना रहा है।
स्ट्रेटेजिक और भूगोलिक महत्व
ओमान पर हमला करना ईरान के लिए महंगा साबित हो सकता है। मस्कट के अलग रहने से ईरान को ऐसे समय में एक महत्वपूर्ण कम्युनिकेशन चैनल खोने का खतरा होगा। भूगोल के लिहाज से भी ओमान का महत्व है। ओमान और ईरान मिलकर होर्मुज स्ट्रेट की निगरानी करते हैं, जो दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल चोकपॉइंट है। इस पानी के रास्ते की सुरक्षा दोनों देशों के लिए जरूरी है।
ओमान और ईरान के बीच आर्थिक सहयोग भी मजबूत है। प्रस्तावित ईरान-ओमान गैस पाइपलाइन जैसे प्रोजेक्ट दोनों देशों के लिए फायदेमंद हैं। यह पाइपलाइन ओमान को ईरानी गैस एक्सपोर्ट का हब बनाने में मदद करेगी। इसके अलावा ट्रेड, शिपिंग और टूरिज़्म संबंधी सहयोग भी दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है।
खाड़ी में ईरान के झगड़े
ईरान ने खाड़ी देशों के साथ ज्यादातर प्रॉक्सी ग्रुप, समुद्री घटनाओं, साइबर एक्टिविटी और राजनीतिक दबाव के जरिए झगड़े किए हैं। उसने सीधे तौर पर कोई बड़ा हमला नहीं किया। वहीं, ओमान ने हमेशा तटस्थ और संतुलित भूमिका निभाई। इस वजह से ओमान हमेशा ग्रे-जोन संघर्षों में निशाना बनने से बचता रहा है।
ओमान ने भरोसेमंद और बैलेंस्ड फॉरेन पॉलिसी अपनाई। ईरानी नेताओं ने भी इसका समर्थन किया है। मस्कट ने पीक क्राइसिस के समय भी दोनों पक्षों के बीच संवाद जारी रखा। नवंबर 2002 में ओमान के पुराने शासक सुल्तान कबूस बिन सईद ने कहा था कि देश हमेशा सही, इंसाफ और शांति के रास्ते पर चलता है।












