उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने लखनऊ से पार्टी कार्यकर्ताओं को बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। बसपा संस्थापक कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए मायावती ने उनके मिशन को आगे बढ़ाने और बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से मजबूत बनाने का संकल्प दोहराया। उन्होंने कहा कि कांशीराम के विचारों और उनके संघर्ष को आगे बढ़ाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। पार्टी के लिए सत्ता हासिल करना केवल चुनाव जीतने का लक्ष्य नहीं, बल्कि कांशीराम के सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक सशक्तीकरण के मिशन को आगे बढ़ाने का माध्यम है।
9 अक्टूबर 2026 को लखनऊ स्थित बसपा के केंद्रीय कैंप कार्यालय में कांशीराम के महापरिनिर्वाण दिवस पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान मायावती के साथ पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद और प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल समेत कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे। पार्टी कार्यालय में बड़ी संख्या में समर्थकों की उपस्थिति को बसपा के संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा गया। कांशीराम की पुण्यतिथि के अवसर पर पार्टी ने प्रदेश के विभिन्न मंडलों से कार्यकर्ताओं को लखनऊ पहुंचने का निर्देश दिया था।
मायावती ने कांशीराम को श्रद्धांजलि देते हुए उनके राजनीतिक जीवन और बहुजन समाज के उत्थान के लिए किए गए प्रयासों को याद किया। उन्होंने कहा कि कांशीराम का उद्देश्य दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों और समाज के अन्य वंचित वर्गों को उनके वोट की ताकत के माध्यम से राजनीतिक सत्ता में भागीदारी दिलाना था। उनके विचारों में चुनाव केवल प्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि सामाजिक असमानता को चुनौती देने और उन वर्गों को निर्णय लेने की व्यवस्था में स्थान दिलाने का माध्यम भी था, जिन्हें लंबे समय तक राजनीतिक और सामाजिक रूप से कमजोर माना जाता रहा।
बसपा प्रमुख ने उत्तर प्रदेश में अपनी सरकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि कांशीराम के मिशनरी संकल्प का ही परिणाम था कि प्रदेश में बसपा की चार बार सरकार बनी। उनके मुताबिक, इन सरकारों के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक मुक्ति, कानून-व्यवस्था और जनकल्याण से जुड़े काम किए गए। मायावती ने महात्मा ज्योतिबा फुले, नारायण गुरु, छत्रपति शाहूजी महाराज और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे महापुरुषों के विचारों का भी उल्लेख किया और कहा कि समानता तथा आत्मसम्मान के उनके संदेश को जमीन पर उतारना बहुजन आंदोलन का महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है।
कांशीराम की पुण्यतिथि पर दिया गया यह संदेश ऐसे समय आया है, जब उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल अपने संगठन को मजबूत करने और मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने में जुटे हैं। बसपा ने भी बूथ स्तर से लेकर मंडल स्तर तक संगठनात्मक गतिविधियों को तेज करने पर जोर दिया है। पार्टी की हालिया बैठकों में मतदाता सूची, बूथ कमेटियों के पुनर्गठन और संभावित उम्मीदवारों के चयन जैसे मुद्दों की समीक्षा की गई। मायावती ने पदाधिकारियों को संगठन मजबूत करने और चुनावी तैयारियों को गंभीरता से आगे बढ़ाने का संदेश दिया है।
बसपा की ओर से 9 अक्टूबर को लखनऊ में बड़े कार्यक्रम की तैयारी पहले से की जा रही थी। पार्टी ने प्रदेश के सभी मंडलों के कार्यकर्ताओं को कांशीराम स्मारक स्थल पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए पहुंचने को कहा था। पार्टी नेतृत्व ने यह भी स्पष्ट किया था कि दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर स्थित बहुजन प्रेरणा केंद्र में रखरखाव का काम चल रहा है, इसलिए वहां बड़ी संख्या में लोगों के जुटने से संभावित परेशानी को देखते हुए इस बार मुख्य कार्यक्रम लखनऊ में आयोजित किया जाएगा। अन्य राज्यों में भी जोन स्तर पर संगोष्ठियों के माध्यम से कांशीराम को याद करने की योजना बनाई गई थी।
मायावती के बयान का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है, क्योंकि बसपा की पहचान लंबे समय से बहुजन समाज की राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक न्याय के मुद्दों से जुड़ी रही है। कांशीराम ने संगठन निर्माण और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से वंचित वर्गों को राजनीतिक रूप से एकजुट करने का प्रयास किया था। बसपा का गठन इसी विचार के साथ हुआ कि समाज के कमजोर वर्ग अपनी आबादी और वोट की ताकत के आधार पर सत्ता तथा शासन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें।
मायावती ने अपने संदेश में इसी विचारधारा को आगे बढ़ाने की बात कही। पार्टी के लिए अब चुनौती यह है कि कांशीराम के विचारों को याद करने के साथ-साथ उन्हें संगठनात्मक मजबूती और चुनावी समर्थन में कैसे बदला जाए। इसके लिए बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व की भूमिका, मतदाताओं से संवाद और उम्मीदवारों के चयन जैसे विषय महत्वपूर्ण होंगे। राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर कांशीराम की पुण्यतिथि का कार्यक्रम बसपा को अपने पुराने समर्थक आधार से संपर्क मजबूत करने और नए मतदाताओं तक संदेश पहुंचाने का अवसर भी देता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता एक महत्वपूर्ण चुनावी समूह हैं। अलग-अलग राजनीतिक दल इस वर्ग के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं। बसपा की राजनीति का मुख्य आधार बहुजन समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिलाने का विचार रहा है, जबकि अन्य दल भी सामाजिक न्याय, संविधान, आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े मुद्दों के माध्यम से इस वर्ग का समर्थन हासिल करने की कोशिश करते हैं। ऐसे माहौल में मायावती का कांशीराम के मिशन को आगे बढ़ाने वाला बयान पार्टी की राजनीतिक दिशा को रेखांकित करता है।
समाजवादी पार्टी समेत दूसरे दल भी कांशीराम की विरासत और बहुजन राजनीति से जुड़े मुद्दों को अपने-अपने तरीके से सामने रखते रहे हैं। हालिया राजनीतिक गतिविधियों में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों को जोड़ने की रणनीतियां चर्चा में हैं। ऐसे में बसपा के लिए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को मजबूत करना और यह संदेश देना अहम है कि कांशीराम का आंदोलन केवल प्रतीकात्मक श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता में भागीदारी और सामाजिक परिवर्तन के लक्ष्य से जुड़ा है।
बसपा के सामने संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ चुनावी जमीन पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की चुनौती भी है। पार्टी को स्थानीय स्तर पर सक्रिय कार्यकर्ताओं, क्षेत्रीय नेताओं और संभावित उम्मीदवारों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना होगा। बूथ कमेटियों की मजबूती, मतदाता सूची की समीक्षा और क्षेत्रवार राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन चुनावी तैयारियों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। मायावती ने पहले भी पदाधिकारियों को संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय रखने और उम्मीदवारों के चयन में गंभीरता बरतने के निर्देश दिए हैं।
कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम का संदेश केवल अतीत को याद करने तक सीमित नहीं रहा। इसमें बसपा के राजनीतिक भविष्य, संगठन की सक्रियता और बहुजन समाज की राजनीतिक भागीदारी को लेकर पार्टी की प्राथमिकताएं भी सामने आईं। मायावती ने अपने बयान के माध्यम से समर्थकों को यह संदेश देने की कोशिश की कि कांशीराम के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक सत्ता हासिल करना जरूरी है। हालांकि, आगामी चुनाव में पार्टी को कितनी सफलता मिलेगी, यह संगठन की तैयारियों, उम्मीदवारों, चुनावी मुद्दों और मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।
मायावती के साथ आकाश आनंद की मौजूदगी भी कार्यक्रम का एक उल्लेखनीय पहलू रही। पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक के रूप में उनकी उपस्थिति को बसपा के संगठनात्मक नेतृत्व के संदर्भ में देखा जा रहा है। वहीं, प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल और अन्य पदाधिकारियों की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि पार्टी प्रदेश स्तर पर अपने कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाने और चुनावी गतिविधियों को तेज करने पर ध्यान दे रही है।
कुल मिलाकर, कांशीराम की 20वीं पुण्यतिथि पर मायावती ने सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक मुक्ति और बहुजन समाज की राजनीतिक भागीदारी के मुद्दों को फिर से केंद्र में रखा। उनका संदेश साफ है कि संस्थापक के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए पार्टी को सक्रिय संगठन और राजनीतिक सफलता दोनों पर ध्यान देना होगा। लखनऊ में कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और चुनावी तैयारियों को लेकर दिए गए निर्देश बसपा की आगामी रणनीति का हिस्सा हैं। अब देखना होगा कि यह संदेश प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में संगठन की सक्रियता और मतदाताओं के समर्थन में कितना बदलाव ला पाता है।










