महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दे पर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर चर्चा करने के लिए सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई जानी चाहिए।
मुंबई: महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे पर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने महिला आरक्षण लागू करने की समयसीमा को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस विषय पर चर्चा के लिए सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाने की मांग की है। उनका कहना है कि महिला आरक्षण से जुड़े वादे को पूरा करने के लिए जनगणना, परिसीमन और आवश्यक संवैधानिक प्रक्रियाओं पर समय रहते काम किया जाना चाहिए।
प्रियंका चतुर्वेदी ने इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच बातचीत को जरूरी बताते हुए कहा कि आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया और उसकी समयसीमा पर स्पष्टता होनी चाहिए। उनके मुताबिक, सभी दलों को साथ बैठकर इस विषय पर चर्चा करनी चाहिए, ताकि महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।
महिला आरक्षण पर सभी दलों की बैठक की मांग
प्रियंका चतुर्वेदी ने महिला आरक्षण को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच संवाद शुरू करने पर जोर दिया है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में पत्र लिखकर सभी दलों की बैठक बुलाने की मांग की गई है। उनका मानना है कि महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर केवल राजनीतिक बयानबाजी पर्याप्त नहीं है। इसके लिए कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया को समझते हुए समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ना जरूरी है। बैठक में आरक्षण लागू करने की संभावित समयसीमा, जनगणना की स्थिति और परिसीमन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो सकती है।
यह मांग ऐसे समय में सामने आई है, जब संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर राजनीतिक स्तर पर लगातार चर्चा होती रही है।
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2029 में 33 प्रतिशत आरक्षण का मुद्दा
शिवसेना (यूबीटी) नेता ने वर्ष 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं को 2029 के चुनावों में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी। उन्होंने इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए संबंधित प्रक्रियाओं को जल्द पूरा करने की जरूरत पर जोर दिया। हालांकि, महिला आरक्षण लागू होने की वास्तविक समयसीमा कानूनी प्रावधानों और उनसे जुड़ी प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है।
इसलिए 2029 के चुनावों में आरक्षण लागू होने को लेकर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित आधिकारिक फैसलों और संवैधानिक प्रक्रिया की स्थिति देखना जरूरी है।
जनगणना और परिसीमन क्यों हैं महत्वपूर्ण?
महिला आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया में जनगणना और परिसीमन की अहम भूमिका है। परिसीमन के तहत लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा प्रतिनिधित्व से जुड़े पहलुओं का निर्धारण किया जाता है। महिला आरक्षण कानून में आरक्षण को संबंधित जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने के बाद होने वाली पहली परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है। इसी वजह से जनगणना और परिसीमन की प्रगति इस कानून के लागू होने के समय को प्रभावित करती है।
प्रियंका चतुर्वेदी ने इन प्रक्रियाओं को समय पर पूरा करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनके अनुसार, आरक्षण को प्रभावी बनाने के लिए राजनीतिक दलों के बीच सहमति और जरूरी संवैधानिक कदमों पर चर्चा होनी चाहिए।
क्या है नारी शक्ति वंदन अधिनियम?
संसद ने सितंबर 2023 में संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम पारित किया था। इसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है। इस कानून में लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान शामिल है। हालांकि, कानून के तहत यह आरक्षण संबंधित जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने और उसके बाद परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने से जुड़ा हुआ है।
इसका अर्थ है कि कानून पारित होना और आरक्षण का वास्तविक रूप से लागू होना दो अलग-अलग चरण हैं। आरक्षण लागू करने के लिए निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पूरा होना आवश्यक है।








