गुजरात सरकार ने पूर्व क्रिकेटर और सांसद यूसुफ पठान को वडोदरा में विवादित 978 वर्ग मीटर जमीन आवंटित करने का प्रस्ताव रखा है। इसमें 500 वर्ग मीटर जमीन उपहार स्वरूप और शेष जमीन 45 प्रतिशत रियायत पर देने की योजना है।
वडोदरा: गुजरात सरकार ने पूर्व क्रिकेटर और सांसद यूसुफ पठान से जुड़े वडोदरा की एक विवादित जमीन के मामले में नया प्रस्ताव आगे बढ़ाया है। प्रस्ताव के तहत वडोदरा नगर निगम (VMC) के स्वामित्व वाली कुल 978 वर्ग मीटर जमीन में से 500 वर्ग मीटर जमीन पठान को उपहार स्वरूप देने और शेष 478 वर्ग मीटर जमीन रियायती दर पर आवंटित करने की योजना है। इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय भारतीय जनता पार्टी (BJP) शासित नगर निगम की स्थायी समिति की बैठक में लिया जाना है, जो 23 अक्टूबर को निर्धारित है।
यह मामला एक दशक से अधिक समय से विवादों में रहा है। जमीन आवंटन को लेकर यूसुफ पठान और नगर निगम के बीच लंबे समय तक कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया चली। अब नगर निगम आयुक्त की ओर से पेश किया गया नया प्रस्ताव इस विवाद को सुलझाने की दिशा में एक अहम कदम हो सकता है। हालांकि, जमीन का आवंटन स्थायी समिति की मंजूरी और निर्धारित शर्तों के पालन पर निर्भर करेगा।
978 वर्ग मीटर जमीन के आवंटन का प्रस्ताव
नगर निगम आयुक्त की ओर से रखे गए प्रस्ताव में जमीन के दो हिस्से किए गए हैं। इसके अनुसार, 500 वर्ग मीटर जमीन यूसुफ पठान को उपहार के रूप में देने की सिफारिश की गई है। बाकी 478 वर्ग मीटर जमीन वडोदरा शहरी विकास प्राधिकरण (VUDA) की मूल्यांकन समिति द्वारा निर्धारित दर के मुकाबले 45 प्रतिशत रियायत पर उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। इसका अर्थ है कि इस हिस्से के लिए निर्धारित मूल्य का 55 प्रतिशत भुगतान करना होगा।
प्रस्ताव में कहा गया है कि आवंटन राज्य के शहरी विकास एवं शहरी आवास विभाग के वर्ष 2024 के प्रस्ताव में निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप विशिष्ट नियमों और शर्तों के अधीन होगा। इसलिए इसे जमीन के अंतिम आवंटन के रूप में नहीं देखा जा सकता। स्थायी समिति की मंजूरी और संबंधित शर्तें पूरी होने के बाद ही आगे की प्रक्रिया स्पष्ट होगी।
इस प्रस्ताव का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नगर निगम की जमीन का एक हिस्सा बिना सामान्य बिक्री मूल्य के देने और शेष हिस्सा रियायती दर पर आवंटित करने की बात कही गई है। ऐसे निर्णय में सरकारी भूमि के मूल्यांकन, लागू नीतियों और आवंटन की शर्तों की भूमिका अहम होगी।
2012 से चल रहा है जमीन का विवाद
यूसुफ पठान वडोदरा के तांदलजा इलाके में अपने परिवार के घर के पास स्थित इस जमीन को खरीदने के लिए वर्ष 2012 से प्रयास कर रहे थे। उन्होंने नगर निगम से इस भूखंड को खरीदने का अनुरोध किया था। शुरुआत में नगर निगम ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने की दिशा में कदम बढ़ाए थे, लेकिन वर्ष 2014 में गुजरात सरकार ने जमीन की बिक्री को मंजूरी देने से इनकार कर दिया।
इसके बाद मामला लंबे समय तक अनसुलझा रहा। जमीन नगर निगम के स्वामित्व में बनी रही और इसके उपयोग तथा आवंटन को लेकर विवाद जारी रहा। यह भूखंड पठान के परिवार के घर के पास होने के कारण उनके लिए महत्वपूर्ण था, लेकिन सरकारी भूमि के हस्तांतरण के लिए आवश्यक स्वीकृतियां नहीं मिल पाने से मामला आगे नहीं बढ़ सका।
एक दशक से अधिक समय तक चले इस विवाद में प्रशासनिक निर्णय, सरकारी भूमि पर कथित अतिक्रमण और न्यायिक कार्यवाही जैसे मुद्दे शामिल रहे। अब नया प्रस्ताव उसी जमीन के आवंटन का एक वैकल्पिक रास्ता प्रस्तुत करता है।
2024 में नगर निगम ने जारी किया था नोटिस
वर्ष 2024 में यूसुफ पठान के पश्चिम बंगाल की बहरामपुर लोकसभा सीट से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के टिकट पर सांसद चुने जाने के बाद विवाद ने फिर तूल पकड़ा। वडोदरा नगर निगम ने उन्हें नोटिस जारी कर कथित अतिक्रमण हटाने और नगर निगम के स्वामित्व वाली जमीन खाली करने को कहा था।
यह नोटिस इस आधार पर जारी किया गया था कि संबंधित भूखंड नगर निगम का है और उस पर कथित तौर पर अनधिकृत कब्जे का मामला मौजूद है। हालांकि, पठान ने नगर निगम की कार्रवाई को चुनौती देते हुए गुजरात हाई कोर्ट का रुख किया।
उन्होंने अदालत में दलील दी कि विवाद एक दशक से अधिक पुराना है और नगर निगम को जमीन खाली करने का निर्देश देने से पहले उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करना चाहिए था। उनका यह भी तर्क था कि जमीन नगर निगम के स्वामित्व में है, न कि राज्य सरकार के। इस आधार पर उन्होंने संबंधित प्रशासनिक कार्रवाई और जमीन आवंटन से जुड़े फैसले को चुनौती दी।
गुजरात हाई कोर्ट में भी चला मामला
यूसुफ पठान की याचिका पर विचार करते हुए गुजरात हाई कोर्ट ने जमीन आवंटन के उनके अनुरोध को अस्वीकार करने के राज्य सरकार के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद पठान ने अदालत की खंडपीठ के समक्ष इस आदेश को चुनौती दी।
हालांकि, इस वर्ष अगस्त में उनकी अपील वापस लेने की अनुमति के साथ खारिज हो गई। यह कदम उनके वकील द्वारा अदालत को यह बताए जाने के बाद उठाया गया कि पठान राज्य सरकार की नीति के तहत अपने दावे को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
इस घटनाक्रम के बाद जमीन आवंटन का मामला न्यायिक चुनौती से आगे बढ़कर सरकारी नीति और प्रशासनिक निर्णय की प्रक्रिया पर केंद्रित हो गया। मौजूदा प्रस्ताव इसी पृष्ठभूमि में सामने आया है। फिर भी, प्रस्ताव को मंजूरी मिलना और जमीन का वास्तविक हस्तांतरण होना दो अलग-अलग चरण हैं।
राजनीतिक घटनाक्रम के बीच आया नया प्रस्ताव
यूसुफ पठान का नाम क्रिकेट से राजनीति में आने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा है। वर्ष 2024 में उन्होंने पश्चिम बंगाल की बहरामपुर लोकसभा सीट से TMC उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीता था। उपलब्ध खबर के अनुसार, इसके बाद उन्होंने पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) से जुड़ने वाले TMC सांसदों के समूह के साथ NDA का रुख किया।
रिपोर्ट में इस राजनीतिक बदलाव और जमीन आवंटन के नए प्रस्ताव के बीच समय-संबंध का उल्लेख किया गया है। हालांकि, केवल घटनाओं के क्रम के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि प्रस्ताव राजनीतिक बदलाव के कारण ही लाया गया है। प्रस्ताव का घोषित आधार राज्य सरकार की नीति और नगर निगम आयुक्त की सिफारिश है। इसके पीछे किसी विशेष राजनीतिक उद्देश्य का स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध जानकारी में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
23 अक्टूबर की बैठक पर टिकी निगाहें
अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण चरण 23 अक्टूबर को प्रस्तावित वडोदरा नगर निगम की स्थायी समिति की बैठक है। समिति प्रस्ताव को मंजूरी देती है या उसमें बदलाव करती है, इससे जमीन आवंटन की आगे की दिशा तय होगी।
यदि प्रस्ताव स्वीकृत होता है, तो यूसुफ पठान को 500 वर्ग मीटर जमीन उपहार स्वरूप और शेष 478 वर्ग मीटर जमीन निर्धारित रियायती मूल्य पर प्राप्त करने का रास्ता खुल सकता है। इसके बावजूद अंतिम आवंटन संबंधित नियमों, शर्तों और आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाओं के पालन पर निर्भर रहेगा।
यह मामला सरकारी जमीन के आवंटन, नगर निगम के अधिकारों और लंबे समय से चले आ रहे विवादों के समाधान से जुड़े सवाल भी उठाता है। जमीन का एक हिस्सा उपहार स्वरूप देने और बाकी को रियायती दर पर उपलब्ध कराने का प्रस्ताव सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग और सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
फिलहाल, स्थायी समिति की मंजूरी से पहले जमीन को यूसुफ पठान के नाम आवंटित मानना उचित नहीं होगा। 23 अक्टूबर की बैठक के फैसले और उसके बाद की प्रशासनिक प्रक्रिया से ही स्पष्ट होगा कि एक दशक से अधिक समय से चला आ रहा यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।









