जनगणना के नए नियमों पर CPI(M) का विरोध, राष्ट्रपति मुर्मू से संशोधन वापस लेने की मांग

महासचिव एमए बेबी ने राष्ट्रपति मुर्मू से जनगणना संशोधन नियम 2026 वापस लेने की मांग की। पार्टी ने गणनाकारों की नियुक्ति और निजी डेटा की गोपनीयता पर सवाल उठाए।

CPI(M) ने जनगणना संशोधन नियम 2026 वापस लेने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से हस्तक्षेप की मांग की है। महासचिव एमए बेबी ने गणनाकारों की नियुक्ति में मनमानी, राजनीतिक हस्तक्षेप और नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई।

नई दिल्ली: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) ने जनगणना गणनाकारों की नियुक्ति से संबंधित संशोधित नियमों पर आपत्ति जताते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से हस्तक्षेप करने की मांग की है। पार्टी के महासचिव एमए बेबी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर जनगणना (संशोधन) नियम, 2026 वापस लेने के लिए केंद्र सरकार से आग्रह करने की अपील की है। उनका कहना है कि नए प्रावधान गणनाकारों की नियुक्ति का दायरा बढ़ाते हैं और स्पष्ट मानदंडों के अभाव में मनमानी तथा राजनीतिक रूप से प्रेरित नियुक्तियों की आशंका पैदा कर सकते हैं।

CPI(M) ने चेतावनी दी है कि इन बदलावों से जनगणना की निष्पक्षता, विश्वसनीयता और गोपनीयता प्रभावित हो सकती है। पार्टी के अनुसार, जनगणना में देश के प्रत्येक परिवार और व्यक्ति से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी एकत्र की जाती है। इसलिए इस प्रक्रिया में शामिल कर्मचारियों की निष्पक्षता और नागरिकों का उन पर भरोसा बेहद महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रपति से संशोधित नियम वापस लेने की अपील

एमए बेबी के पत्र के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 16 अक्टूबर को जनगणना नियमों में संशोधन अधिसूचित किए। CPI(M) का कहना है कि इन बदलावों के जरिए गणनाकार नियुक्त करने के लिए पात्र व्यक्तियों की श्रेणियों का विस्तार किया गया है। पार्टी ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वह केंद्र सरकार को इन संशोधनों को वापस लेने के लिए कहें।

बेबी ने अपने पत्र में जनगणना को राष्ट्रीय महत्व की प्रक्रिया बताते हुए कहा कि इसकी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि गणनाकारों के चयन में स्पष्ट नियम और प्रभावी सुरक्षा उपाय नहीं होंगे, तो नागरिकों के भरोसे पर असर पड़ सकता है।

हालांकि, संशोधित नियमों पर CPI(M) की आपत्तियां पार्टी की ओर से उठाई गई चिंताओं को दर्शाती हैं। इन आशंकाओं को संभावित जोखिम के रूप में समझना चाहिए, न कि इस बात के प्रमाण के रूप में कि नियुक्तियों में राजनीतिक हस्तक्षेप हो चुका है या जनगणना के आंकड़ों का दुरुपयोग हुआ है।

गणनाकारों की नियुक्ति का दायरा बढ़ाने पर सवाल

CPI(M) के अनुसार, संशोधित नियमों में अब सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों को भी जनगणना गणनाकार नियुक्त करने की संभावना शामिल है। इसके अलावा, संस्थानों, सोसायटियों और ट्रस्टों में कार्यरत कर्मचारियों तथा अधिकारियों को भी इस काम में लगाया जा सकता है।

पत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, वैधानिक निकायों, बैंकों, कंपनियों और अन्य संस्थाओं के अधिकारियों तथा लिपिकीय कर्मचारियों को भी जनगणना संबंधी जिम्मेदारी सौंपे जाने के प्रावधान का उल्लेख किया गया है।

पार्टी की सबसे बड़ी आपत्ति उस प्रावधान को लेकर है, जिसके तहत राज्य सरकार या केंद्रशासित प्रदेश का प्रशासन किसी ऐसे व्यक्ति को भी गणनाकार नियुक्त कर सकता है, जिसे वह इस कार्य के लिए उपयुक्त समझता है।

बेबी का तर्क है कि यदि चयन के स्पष्ट मानदंड सार्वजनिक नहीं किए जाते और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं होते, तो नियुक्तियों में मनमानी की गुंजाइश बढ़ सकती है। उन्होंने आशंका जताई कि व्यापक विवेकाधिकार का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के अनुरूप नियुक्तियां करने के लिए किया जा सकता है।

नागरिकों की निजी जानकारी की सुरक्षा का मुद्दा

जनगणना के दौरान नागरिकों से प्राप्त जानकारी की गोपनीयता CPI(M) की प्रमुख चिंताओं में शामिल है। पार्टी का कहना है कि लोग अपने परिवार, पहचान और अन्य निजी विवरण तभी सहजता से साझा करेंगे, जब उन्हें जानकारी की सुरक्षा और उसे एकत्र करने वाले व्यक्तियों की निष्पक्षता पर भरोसा होगा।

बेबी ने चेतावनी दी कि यदि नागरिकों को गणनाकारों की विश्वसनीयता पर संदेह हुआ, तो वे संवेदनशील जानकारी देने में हिचकिचा सकते हैं। इससे जनगणना की प्रक्रिया और आंकड़ों की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है।

उन्होंने यह भी चिंता जताई कि निजी जानकारी का इस्तेमाल लोगों की राजनीतिक प्रोफाइल तैयार करने, समुदायों को निशाना बनाने, नागरिकता पर सवाल उठाने या पात्र नागरिकों को उनके अधिकारों और सरकारी लाभों से वंचित करने के लिए किया जा सकता है।

ये आशंकाएं डेटा सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े व्यापक सवाल उठाती हैं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में ऐसे किसी दुरुपयोग के घटित होने का प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है। पार्टी की मांग है कि संभावित जोखिमों को रोकने के लिए पहले से स्पष्ट और प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

जनगणना 2027 के प्रश्नपत्र पर भी आपत्ति

CPI(M) ने गणनाकारों की नियुक्ति के नियमों के साथ-साथ जनगणना 2027 के दूसरे चरण के लिए अधिसूचित प्रश्नावली पर भी सवाल उठाए हैं। बेबी के पत्र के अनुसार, यह प्रश्नावली 14 अगस्त को अधिसूचित की गई थी और इसमें कई तरह की व्यक्तिगत जानकारियां मांगे जाने का उल्लेख है।

पार्टी ने जिन विवरणों को लेकर चिंता जताई है, उनमें माता-पिता का धर्म, बैंक खाते से संबंधित जानकारी, आधार और अन्य पहचान दस्तावेज, पासपोर्ट नंबर तथा मोबाइल नंबर शामिल हैं।

CPI(M) का कहना है कि इतनी व्यापक व्यक्तिगत जानकारी एकत्र करने के उद्देश्य, उसकी सुरक्षा और इस्तेमाल की सीमाओं को स्पष्ट किया जाना चाहिए। पार्टी ने यह भी मांग की है कि जनगणना के आंकड़ों को अन्य डेटाबेस से जोड़ने या निर्धारित उद्देश्यों से अलग इस्तेमाल किए जाने से रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय लागू हों।

बेबी के मुताबिक, CPI(M) ने 24 अगस्त को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त को ज्ञापन सौंपकर इन व्यक्तिगत विवरणों के संग्रह को रोकने की मांग की थी। पार्टी ने डेटा के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट नियमों और जवाबदेही की व्यवस्था पर जोर दिया था।

मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से भी जोड़ा मुद्दा

अपने पत्र में बेबी ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया में अपारदर्शी प्रक्रियाओं और मनमानी दस्तावेजी शर्तों के कारण पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची से बाहर किए गए हैं।

CPI(M) के महासचिव ने इस संदर्भ में चिंता जताई कि यदि संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी ऐसे व्यापक नेटवर्क के माध्यम से जुटाई जाती है, जिसके चयन और निगरानी के लिए पर्याप्त स्पष्ट नियम न हों, तो नागरिकों के भरोसे को नुकसान पहुंच सकता है।

यह तुलना पार्टी के उस तर्क का हिस्सा है कि जनगणना और मतदाता सूची जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्यों में पारदर्शिता, निष्पक्षता तथा नागरिक अधिकारों की सुरक्षा अनिवार्य है। हालांकि, जनगणना और मतदाता सूची पुनरीक्षण अलग-अलग प्रशासनिक प्रक्रियाएं हैं और उनके नियमों तथा उद्देश्यों का मूल्यांकन अलग आधार पर किया जाना चाहिए।

कांग्रेस ने भी उठाए सवाल

जनगणना गणनाकारों की नियुक्ति के नियमों में संशोधन को लेकर कांग्रेस ने भी आलोचना की है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इन बदलावों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यकर्ताओं की भर्ती की योजना करार दिया।

यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे संशोधित नियमों का प्रमाणित उद्देश्य नहीं माना जा सकता। फिर भी, विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट है कि गणनाकारों की नियुक्ति और जनगणना के दौरान निजी जानकारी के प्रबंधन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

निष्पक्ष जनगणना और भरोसे पर बहस

CPI(M) ने राष्ट्रपति से अपील की है कि वह संवैधानिक प्रमुख के रूप में मामले में तत्काल हस्तक्षेप करें और केंद्र सरकार से संशोधित नियम वापस लेने को कहें। पार्टी का कहना है कि जनगणना देश के नागरिकों से जुड़ी राष्ट्रीय प्रक्रिया है और इसे किसी सत्तारूढ़ दल या उससे संबद्ध संगठन के राजनीतिक हितों का साधन नहीं बनने देना चाहिए।

इस मामले में आगे की दिशा केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया, संशोधित नियमों के क्रियान्वयन और डेटा सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों पर निर्भर करेगी। फिलहाल, CPI(M) की मुख्य मांग है कि गणनाकारों की नियुक्ति के लिए स्पष्ट मानदंड बनाए जाएं, चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो और नागरिकों की निजी जानकारी के इस्तेमाल पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित किया जाए।

जनगणना की सफलता केवल आंकड़े जुटाने पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि नागरिक उस प्रक्रिया को कितना निष्पक्ष और सुरक्षित मानते हैं। ऐसे में नियुक्ति प्रक्रिया, गोपनीयता और जवाबदेही से जुड़े सवाल आने वाले समय में इस बहस के केंद्र में बने रह सकते हैं।

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