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चंद्रबदनी शक्तिपीठ: मूर्ति नहीं, श्रीयंत्र की होती है पूजा, जानें रात में अप्सराओं के नृत्य का रहस्य

चंद्रबदनी शक्तिपीठ: मूर्ति नहीं, श्रीयंत्र की होती है पूजा, जानें रात में अप्सराओं के नृत्य का रहस्य
अंतिम अपडेट: 17 घंटा पहले

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित चंद्रकूट पर्वत पर एक ऐसा शक्तिपीठ है, जो रहस्यों और चमत्कारों से भरपूर है। इस शक्तिपीठ का नाम है चंद्रबदनी मंदिर, जो समुद्र तल से लगभग 2277 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह मंदिर माता सती के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। लेकिन इस शक्तिपीठ की खासियत यह है कि यहां देवी की मूर्ति नहीं, बल्कि श्रीयंत्र की पूजा की जाती है।

कैसे हुआ चंद्रबदनी शक्तिपीठ का निर्माण?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, स्कंद पुराण में वर्णित कथा के मुताबिक, देवी सती ने अपने पिता दक्ष के अपमान से आहत होकर यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया था। भगवान शिव, सती के शरीर को लेकर आकाश में विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने शिव के मोह को तोड़ने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। 

जहां-जहां ये टुकड़े गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। चंद्रबदनी शक्तिपीठ उस स्थान पर स्थापित है, जहां देवी सती का कटि भाग (कमर का हिस्सा) गिरा था। इसलिए इस मंदिर को चंद्रबदनी कहा जाता है।

मूर्ति नहीं, श्रीयंत्र का होता है पूजन

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां देवी की मूर्ति नहीं है। मंदिर के गर्भगृह में एक दिव्य श्रीयंत्र स्थित है। इसे इतना पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है कि पूजा करने वाले पुजारी भी आंखों पर पट्टी बांधकर इसकी पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस श्रीयंत्र का तेज इतना प्रबल है कि इसे खुली आँखों से देखना वर्जित है।

स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, गर्भगृह में देवी की मूर्ति भी विद्यमान है, लेकिन उसे देखना वर्जित है। कहा जाता है कि जो कोई भी इसे देखने का प्रयास करता है, वह अंधा हो जाता है। मंदिर के पुजारी भट्ट और सेमल्टी ब्राह्मण होते हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस पवित्र कार्य को निभाते आ रहे हैं।

रहस्यमय रातें: अप्सराओं के नृत्य का चमत्कार

चंद्रबदनी मंदिर को लेकर एक और प्रचलित मान्यता है कि रात के समय यहां अप्सराएं और गंधर्व नृत्य करते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जब रात के समय ढोल-दमाऊ (पारंपरिक वाद्ययंत्र) की आवाजें सुनाई देती हैं, तो समझा जाता है कि देवी की सेवा में गंधर्व और अप्सराएं नृत्य कर रही हैं। कहा जाता है कि जो साधक इस मंदिर में निराहार रहकर साधना करते हैं, उन्हें अद्भुत सिद्धियों की प्राप्ति होती है। माता चंद्रबदनी की कृपा से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और मुरादें पूरी होती हैं।

चंद्रबदनी मंदिर में नवरात्रि के अवसर पर विशेष आयोजन किए जाते हैं। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन और पूजा के लिए आते हैं। नौ दिनों तक माता के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। भक्तों का विश्वास है कि नवरात्रि में यहां देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

सिद्धपीठ का चमत्कारिक प्रभाव

माता चंद्रबदनी का यह मंदिर न सिर्फ एक धार्मिक स्थल है बल्कि एक चमत्कारिक शक्तिपीठ भी है। मान्यता है कि माता के दर्शन मात्र से ही कष्ट दूर हो जाते हैं। जिन भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं, वे यहां विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु अक्सर बताते हैं कि रात के समय मंदिर परिसर में एक अलग ही ऊर्जा का अहसास होता है। कई लोगों ने अप्सराओं के नृत्य को देखने का दावा भी किया है।

चंद्रबदनी मंदिर में देवी के श्रीयंत्र की पूजा करना और अप्सराओं के नृत्य का विश्वास केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। भक्तों का मानना है कि यहां देवी स्वयं अपनी उपस्थिति का अहसास कराती हैं।

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