Carbon14: 27 फरवरी का इतिहास; जब खोजा गया कार्बन-14, पुरातत्व और भूविज्ञान में आया क्रांतिकारी बदलाव

🎧 Listen in Audio
0:00

आज का दिन विज्ञान जगत के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है। वर्ष 1940 में ठीक इसी दिन अमेरिकी वैज्ञानिकों मार्टिन कामेन और सैम रूबेन ने एक क्रांतिकारी कार्बन-14 (C-14) समस्थानिक की खोज की थी। इस खोज ने विज्ञान की दुनिया में एक नया अध्याय जोड़ा और पुरातत्व एवं भूविज्ञान के क्षेत्र में गहरी पैठ बनाई।

क्या है कार्बन-14 और क्यों है यह महत्वपूर्ण

कार्बन-14 एक रेडियोधर्मी समस्थानिक है, जो प्राकृतिक रूप से वातावरण में मौजूद कार्बन के अन्य रूपों से थोड़ा अलग होता है। यह समस्थानिक मुख्य रूप से ब्रह्मांडीय किरणों के प्रभाव से उत्पन्न होता है और जीवों के चयापचय (मेटाबॉलिज्म) में सम्मिलित हो जाता है। जब कोई जीव मरता है, तो उसके शरीर में मौजूद कार्बन-14 धीरे-धीरे क्षय होने लगता है। इस प्रक्रिया की दर को मापकर वैज्ञानिक किसी भी जैविक अवशेष की आयु का अनुमान लगा सकते हैं। इस पद्धति को रेडियोकार्बन डेटिंग कहा जाता है।

कैसे हुई कार्बन-14 की खोज

27 फरवरी 1940 को कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के वैज्ञानिक मार्टिन कामेन और सैम रूबेन ने प्रयोगशाला में कार्बन-14 का सफलतापूर्वक पता लगाया। यह खोज उस समय की जा रही आणविक अनुसंधान गतिविधियों का हिस्सा थी। वैज्ञानिकों ने इस रेडियोधर्मी समस्थानिक की मौजूदगी को पहचाना और जल्द ही इसके व्यावहारिक उपयोगों का भी अध्ययन शुरू कर दिया।

कार्बन-14 की खोज ने विज्ञान की दुनिया को झकझोर दिया, क्योंकि इससे न केवल पुरातत्वविदों को प्राचीन अवशेषों की सटीक उम्र जानने में मदद मिली, बल्कि भूवैज्ञानिकों को भी पृथ्वी की परतों और जलवायु परिवर्तन के अध्ययन में सहायता मिली।

रेडियोकार्बन डेटिंग: एक क्रांतिकारी तकनीक

कार्बन-14 की खोज के बाद वैज्ञानिकों ने इस समस्थानिक के क्षय की दर को आधार बनाकर रेडियोकार्बन डेटिंग तकनीक विकसित की। इस तकनीक के माध्यम से पुरातत्वविद 50,000 वर्षों तक पुराने कार्बनिक पदार्थों की उम्र का निर्धारण कर सकते हैं। यह विधि मुख्य रूप से हड्डियों, लकड़ी, वस्त्रों और अन्य जैविक नमूनों के विश्लेषण में उपयोगी साबित हुई।

1950 के दशक में इस विधि का पूर्ण विकास हुआ और अमेरिकी वैज्ञानिक विलार्ड लिब्बी ने इस तकनीक को पूर्णरूपेण विकसित करने के लिए 1960 में नोबेल पुरस्कार भी जीता। तब से लेकर आज तक, यह तकनीक पुरातत्व और भूविज्ञान के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक बनी हुई है।

कार्बन-14 की खोज का प्रभाव

1. पुरातत्व – इस तकनीक की मदद से हजारों साल पुराने मानव अवशेषों, कलाकृतियों और प्राचीन सभ्यताओं की कालगणना संभव हो सकी।
2. भूविज्ञान – पृथ्वी की परतों, हिम युगों और जलवायु परिवर्तन के अध्ययन में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।
3. अपराध विज्ञान – न्यायालयों में सबूतों की सत्यता परखने के लिए फॉरेंसिक विज्ञान में भी इसका उपयोग होता है।
4. पर्यावरण अध्ययन – वैज्ञानिक कार्बन-14 का उपयोग करके प्रदूषण और जैविक चक्रों का विश्लेषण करते हैं।

क्या कहती है आज की विज्ञान 

आज, 27 फरवरी 2025 को, कार्बन-14 की खोज के 85 वर्ष पूरे हो चुके हैं, और यह खोज विज्ञान के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ चुकी है। आधुनिक शोधकर्ता अब इस तकनीक को और उन्नत बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। हाल ही में कई वैज्ञानिक संस्थान रेडियोकार्बन डेटिंग को और अधिक सटीक बनाने के लिए नई तकनीकों का विकास कर रहे हैं, जिससे वैज्ञानिक और भी पुराने अवशेषों की आयु मापने में सक्षम होंगे।

27 फरवरी 1940 को हुई यह ऐतिहासिक खोज आज भी विज्ञान जगत में उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी 85 साल पहले थी। कार्बन-14 न केवल पुरानी सभ्यताओं और जीवाश्मों की कहानी बयां करता है, बल्कि पृथ्वी के अतीत को समझने का एक अनमोल माध्यम भी प्रदान करता है।

Leave a comment