विजय सिंह पथिक जयंती: राजस्थान के पहले किसान सत्याग्रह के महानायक को नमन

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आज देश भर में स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी और किसान आंदोलन के पुरोधा विजय सिंह पथिक की जयंती धूमधाम से मनाई जा रही है। राष्ट्रीय पथिक के नाम से प्रसिद्ध इस वीर स्वतंत्रता सेनानी ने अपने संघर्षों से अंग्रेजी हुकूमत को हिला कर रख दिया था। उनका जन्म 27 फरवरी 1882 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के गुठावली कलाँ गांव में एक क्रांतिकारी गुर्जर परिवार में हुआ था।

1857 की क्रांति से जागी स्वतंत्रता की लौ

विजय सिंह पथिक के दादा इंद्र सिंह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। वहीं, उनके पिता हमीर सिंह गुर्जर को भी ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार किया था। इस देशभक्त पृष्ठभूमि ने उन्हें युवा अवस्था में ही स्वतंत्रता संग्राम की ओर प्रेरित किया। उनका संपर्क रास बिहारी बोस और शचींद्रनाथ सान्याल जैसे क्रांतिकारियों से हुआ और उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सशस्त्र क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बिजौलिया किसान आंदोलन: पहला संगठित किसान सत्याग्रह

1915 के फिरोजपुर षड्यंत्र केस के बाद उन्होंने अपना नाम भूप सिंह से बदलकर विजय सिंह पथिक रख लिया और राजस्थान की धरती पर किसानों के हक की लड़ाई का नेतृत्व किया। उन्होंने बिजौलिया किसान आंदोलन की अगुवाई की, जिसे भारत का पहला संगठित किसान सत्याग्रह कहा जाता है। इस आंदोलन के माध्यम से उन्होंने किसानों से लिए जाने वाले 84 प्रकार के करों को समाप्त कराने के लिए अंग्रेजों और देसी रियासतों के खिलाफ मोर्चा खोला। उनके नेतृत्व में किसानों ने संगठित होकर कर न चुकाने का आंदोलन छेड़ा, जिससे ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा।

महात्मा गांधी से मतभेद, लेकिन उद्देश्य एक

बिजौलिया आंदोलन की गूंज जब राष्ट्रीय स्तर पर पहुंची, तब महात्मा गांधी ने भी इसका संज्ञान लिया। गांधीजी ने किसानों को हिजरत (स्थानांतरण) की सलाह दी, लेकिन पथिक ने इसे ठुकराते हुए कहा, "यह सिर्फ हिजड़ों के लिए उचित है, मर्दों के लिए नहीं।" उन्होंने स्पष्ट रूप से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के साथ-साथ सामंतवाद के खिलाफ भी संघर्ष छेड़ा, जिसे कांग्रेस ने पूर्ण समर्थन नहीं दिया।

पत्रकार, कवि और लेखक के रूप में योगदान

विजय सिंह पथिक न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि एक बेहतरीन पत्रकार, कवि और लेखक भी थे। उन्होंने ‘नव संदेश’ और ‘राजस्थान संदेश’ नाम से हिंदी अखबार निकाले, जिससे जन जागरूकता बढ़ी। उनकी लिखी पुस्तकें ‘अजय मेरु’, ‘पथिक प्रमोद’ और ‘पथिक के जेल के पत्र’ आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं। उनकी कविताओं में राष्ट्रभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी थी।

पथिक की विरासत और सम्मान

भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया, वहीं ग्रेटर नोएडा में एक स्टेडियम और उनके पैतृक गांव में एक भव्य स्मारक स्थापित किया गया है। हर वर्ष उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर भव्य कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिसमें उनकी क्रांतिकारी गाथाओं को याद किया जाता है।

जुल्म और भेदभाव के खिलाफ थे विजय सिंह पथिक

विजय सिंह पथिक न केवल एक क्रांतिकारी थे, बल्कि समाज सुधारक भी थे। उनकी रचनाओं में अन्याय, जाति व्यवस्था, सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वास के खिलाफ तीखा प्रहार साफ देखा जा सकता है। वह हमेशा ऐसी समाज व्यवस्था के पक्षधर रहे, जहां किसी भी प्रकार का अन्याय और शोषण न हो। पथिक का मानना था कि समाज में आर्थिक, जातीय, नस्लीय, लैंगिक और धार्मिक आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। 

उन्होंने अपने जीवनभर इन बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई और लोगों को समानता व न्याय की राह पर चलने के लिए प्रेरित किया। उनकी लेखनी ने समाज को जागरूक करने का काम किया और क्रांति की भावना को बल दिया।आज भी उनकी रचनाएं और विचार प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं, जो हमें एक निष्पक्ष और न्यायपूर्ण समाज की दिशा में आगे बढ़ने की सीख देते हैं।

विजय सिंह पथिक के जीवन से मिलती हैं ये प्रेरणादायक सीख

विजय सिंह पथिक का जीवन संघर्ष, साहस और समाज सुधार का प्रतीक है। उन्होंने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई, बल्कि किसानों, गरीबों और शोषित वर्गों के हक की लड़ाई भी लड़ी। उनके जीवन से हमें कई महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं:

1. अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना: पथिक ने हमेशा जुल्म और शोषण के खिलाफ संघर्ष किया। चाहे अंग्रेजी हुकूमत हो या देसी सामंतवाद, उन्होंने हर अन्याय का विरोध किया।
2. संगठन और एकता की शक्ति: बिजौलिया किसान आंदोलन से उन्होंने साबित किया कि अगर लोग संगठित हों, तो बड़े से बड़ा अत्याचार भी खत्म किया जा सकता है।
3. निडरता और आत्मसम्मान: गांधीजी की ‘हिजरत’ की सलाह को ठुकराकर उन्होंने दिखाया कि अन्याय के खिलाफ डटे रहना ही सच्ची क्रांति है।
4. समाज सुधार की प्रतिबद्धता: जातिवाद, अंधविश्वास और भेदभाव के खिलाफ उनकी सोच आज भी प्रासंगिक है।

अमर रहेंगे विजय सिंह पथिक

28 मई 1954 को यह महान क्रांतिकारी चिरनिद्रा में सो गया, लेकिन उनकी संघर्षगाथा सदैव भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगी। उनके प्रसिद्ध शब्द आज भी हर क्रांतिकारी हृदय में गूंजते हैं:
"न यश, न वैभव, न सुख की अभिलाषा, जीवन रहे या न रहे कोई परवाह नहीं; बस एक ही इच्छा है – इस संसार में अन्याय और अत्याचार का अंत हो।"
आज उनकी जयंती पर समूचा राष्ट्र उन्हें नमन करता है और उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प दोहराता है।

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