मध्य प्रदेश के 16 वर्षीय छात्र व्यासजी मिश्रा ने अपने भाई की मदद से पानी और केरोसिन से चलने वाला हाइब्रिड चूल्हा तैयार किया। इसके प्रोटोटाइप की लागत करीब 600 रुपये आई, जबकि IIT गुवाहाटी ने 20% तक केरोसिन बचत पाई।
Tech: पानी से चलने वाला हाइब्रिड चूल्हा: मध्य प्रदेश के 11वीं कक्षा के छात्र व्यासजी मिश्रा ने सीमित संसाधनों के बावजूद एक ऐसा हाइब्रिड चूल्हा तैयार किया, जिसमें पानी और केरोसिन का इस्तेमाल होता है। 16 साल की उम्र में तैयार किए गए इस प्रोटोटाइप का उद्देश्य ईंधन की खपत और धुएं को कम करना था। IIT गुवाहाटी ने तकनीक को ऑप्टिमाइज करने के बाद इसमें 20% तक केरोसिन बचत की संभावना पाई।
बड़े भाई की अधूरी कोशिश से मिला आइडिया
मध्य प्रदेश के व्यासजी मिश्रा ने महज 16 साल की उम्र में पानी और केरोसिन की मदद से चलने वाला हाइब्रिड चूल्हा तैयार किया। वह उस समय 11वीं कक्षा में पढ़ रहे थे। इस तकनीक को विकसित करने में उनके बड़े भाई पवनजी मिश्रा ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस चूल्हे को बनाने का विचार उनके बड़े भाई की एक अधूरी कोशिश से आया था। शुरुआत में इसे 2001-02 के एक साइंस मेले के लिए तैयार करने का प्रयास किया गया था। इसके बाद 2002-03 में दोनों भाइयों ने मिलकर इस प्रोजेक्ट पर दोबारा काम शुरू किया।
लगातार करीब छह महीने की मेहनत के बाद दोनों ने हाइब्रिड चूल्हे का प्रोटोटाइप तैयार किया। इसके लिए दो सामान्य केरोसिन स्टोव और तीन रेगुलेटरों का इस्तेमाल किया गया।
पानी और केरोसिन से कैसे काम करता है चूल्हा?
इस हाइब्रिड चूल्हे में दो अलग-अलग टैंक लगाए गए हैं। एक टैंक में केरोसिन और दूसरे में पानी रखा जाता है। दोनों टैंकों में हवा का दबाव बनाने के लिए पंप लगाए गए हैं। पाइप के जरिए दोनों टैंक एक ही बर्नर से जुड़े होते हैं।
चूल्हे को शुरू करने के लिए पहले केरोसिन की मदद से बर्नर को गर्म किया जाता है। जब बर्नर पर्याप्त गर्म होकर लाल हो जाता है, तब केरोसिन का रेगुलेटर बंद कर पानी वाला रेगुलेटर खोला जाता है।
गर्म बर्नर पानी को भाप में बदल देता है। इस प्रक्रिया से चूल्हे की आंच बनी रहती है। जब आंच धीमी होने लगती है, तो पानी की सप्लाई बंद करके दोबारा केरोसिन चालू किया जाता है, जिससे बर्नर फिर गर्म हो सके।
इस तरह केरोसिन और पानी के बीच क्रमिक रूप से बदलाव करते हुए चूल्हे को चलाने की कोशिश की जाती है।
600 रुपये में तैयार हुआ प्रोटोटाइप
इस हाइब्रिड चूल्हे के शुरुआती प्रोटोटाइप को तैयार करने में करीब 600 रुपये की लागत आई थी। सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद व्यासजी और उनके भाई ने इस तकनीक को विकसित किया।
रिपोर्ट के अनुसार, व्यासजी के पिता देवसर तहसील में क्लर्क थे और परिवार की सालाना आय 60 हजार रुपये से कम थी। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उनके बड़े भाई, जो बीसीए के छात्र थे, ने उन्हें तकनीकी और आर्थिक सहयोग दिया।
IIT गुवाहाटी ने जांच के बाद बताई 20% बचत
इस तकनीक को आगे ऑप्टिमाइज करने का काम IIT गुवाहाटी ने किया। संस्थान के परीक्षण और ऑप्टिमाइजेशन के बाद पाया गया कि हाइब्रिड चूल्हे से 20% तक केरोसिन की बचत हो सकती है।
इस उपलब्धि ने व्यासजी के प्रोजेक्ट को खास पहचान दिलाई। उनकी तकनीक ने कई जगह आयोजित विज्ञान प्रतियोगिताओं और प्रदर्शनियों में पुरस्कार भी हासिल किए।
कम लागत में तैयार किया गया यह प्रोटोटाइप दिखाता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद स्कूली स्तर पर किए गए प्रयोग नई तकनीकी सोच को जन्म दे सकते हैं।











