1979 के रेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने दो पुलिसकर्मियों को रिहा किया। CJI गवई ने इसे न्यायिक शर्मिंदगी बताया। इसके बाद कानून में बदलाव, सहमति की परिभाषा और महिलाओं के अधिकार मजबूत किए गए।
New Delhi: साल 1979 के रेप मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला लंबे समय तक विवादों में रहा। उस मामले में एक आदिवासी लड़की के साथ थाने में रेप का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट ने उस समय दो पुलिसकर्मियों को रिहा कर दिया क्योंकि उनके अनुसार लड़की की सहमति से संबंध बने और शरीर पर कोई निशान नहीं थे। इस फैसले ने लोगों को निराश किया और न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।
CJI बी आर गवई का बयान
मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई ने इस मामले को संस्थागत शर्मिंदगी का क्षण बताया। उन्होंने कहा कि अदालत का यह फैसला न्यायिक प्रणाली की गरिमा की रक्षा करने में विफल रहा। सीजेआई ने माना कि यह फैसला देश के लिए एक टर्निंग पॉइंट था। इसके कारण जनता और महिला संगठनों ने महिलाओं के अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किया।
कानून में बदलाव
सीजेआई गवई ने बताया कि 1979 के फैसले ने क्रिमिनल लॉ की कमियों को उजागर किया। इस फैसले के बाद सहमति की अवधारणा को फिर से परिभाषित किया गया और कस्टोडियल रेप में कानूनी सुरक्षा मजबूत हुई। उन्होंने कहा कि इसके बाद जेंडर जस्टिस के लिए कई कानून लाए गए और कोर्ट ने कई फैसलों के जरिए लैंगिक समानता को मजबूत किया।
महिलाओं की संवैधानिक स्थिति में सुधार
1979 के फैसले के बाद कानून में बदलाव से महिलाओं को परिवार और रीति-रिवाज में अंतर्निहित असमानताओं से बाहर लाया गया। महिलाओं को संवैधानिक नागरिकता के केंद्र में लाने की दिशा में कदम बढ़े। सीजेआई ने यह भी कहा कि फैसले ने समाज में महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को मजबूत करने में योगदान दिया।












