उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर से जुड़े करीब 48 साल पुराने आपराधिक मामले में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को ठोस सबूतों के साथ साबित करने में नाकाम रहा है।
जानकारी के मुताबिक यह मामला करीब चार दशक से ज्यादा पुराना था। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने मामले के सभी तथ्यों और सबूतों की विस्तार से समीक्षा की।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए कई साक्ष्य कमजोर थे और गवाहों के बयानों में भी स्पष्टता नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे हालात में केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी होती है कि वह आरोपों को संदेह से परे साबित करे, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हो पाया। इसी आधार पर कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए आरोपी को राहत दी।
इस फैसले के बाद कानूनी हलकों में चर्चा शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला इस बात को दोहराता है कि अदालत में दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य होना जरूरी है।
फिलहाल कोर्ट के आदेश के बाद आरोपी को बड़ी राहत मिली है और मामले का लंबा कानूनी संघर्ष खत्म हो गया है।











