मुजफ्फरपुर में सरकारी स्कूलों में लगाए गए आरओ प्लांट को लेकर बिहार की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से एनडीए प्रत्याशी और जदयू के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक कुमार झा ने विधान पार्षद बंशीधर ब्रजवासी पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत सरकारी विद्यालयों में लगाए गए 66 आरओ सिस्टम की खरीद और स्थापना में खर्च हुई राशि को लेकर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। अभिषेक झा ने कहा कि जो बंशीधर ब्रजवासी पहले सरकारी योजनाओं में कथित गड़बड़ी को लेकर सरकार और अधिकारियों से हिसाब मांगते थे, अब उनकी अनुशंसा से जुड़ी योजना पर सवाल उठ रहे हैं तो उन्हें भी जनता को जवाब देना चाहिए। इसी क्रम में उन्होंने ब्रजवासी को ‘दूसरे केजरीवाल’ बताते हुए तंज कसा। यह टिप्पणी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के संदर्भ में है और फिलहाल लगाए गए आरोपों की जांच होना बाकी है।
अभिषेक झा के अनुसार, मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी के सरकारी विद्यालयों में 25 लीटर क्षमता वाले ड्रिंकिंग वाटर प्यूरीफायर चिलर सिस्टम लगाने के लिए करीब 50 लाख रुपये तक की राशि की अनुशंसा की गई। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक 66 स्कूलों में लगाए गए सिस्टम की औसत लागत लगभग 75,758 रुपये बैठती है। अभिषेक झा का दावा है कि बाजार में समान क्षमता और गुणवत्ता की मशीनें इससे काफी कम कीमत पर उपलब्ध हैं। इसी अंतर को आधार बनाकर उन्होंने खरीद प्रक्रिया, निविदा, सप्लाई ऑर्डर, बिल, भुगतान वाउचर और गुणवत्ता प्रमाण-पत्र की जांच की मांग की है।
जदयू नेता ने सवाल उठाया कि अगर आरओ प्लांट लगाने में सरकारी राशि नियमों के मुताबिक खर्च हुई है तो पूरी प्रक्रिया के दस्तावेज सार्वजनिक करने में किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए। उनका कहना है कि जनता के पैसे से होने वाले किसी भी विकास कार्य में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण है। योजना की लागत कितनी थी, मशीन की वास्तविक खरीद कीमत क्या थी, किस एजेंसी या आपूर्तिकर्ता से उपकरण खरीदे गए, टेंडर की प्रक्रिया क्या रही, कितने भुगतान किए गए और संबंधित विद्यालयों में लगाए गए सिस्टम की गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई—इन सभी सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।
अभिषेक झा ने इसी मुद्दे को बंशीधर ब्रजवासी के पुराने राजनीतिक रुख से जोड़ते हुए हमला किया। उनका कहना है कि ब्रजवासी जब शिक्षक नेता और विधान पार्षद के तौर पर दूसरे विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठाते थे, तब पारदर्शिता और जांच की मांग करते थे। अब जब उनके एमएलसी फंड से जुड़ी अनुशंसाओं वाली योजना सवालों के घेरे में आई है तो उन्हें भी उसी तरह दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक, अभिषेक झा ने ब्रजवासी से खर्च का बिल, निविदा और बीओक्यू समेत संबंधित कागजात दिखाने की मांग की है और जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय दिए जाने की बात कही है।
इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सरकारी स्कूलों में बच्चों को उपलब्ध कराए जाने वाले पेयजल की गुणवत्ता से जुड़ा है। अभिषेक झा ने सिर्फ आर्थिक अनियमितता के आरोपों की जांच की मांग नहीं की, बल्कि आरओ सिस्टम से निकलने वाले पानी की भी स्वतंत्र प्रयोगशाला में जांच कराने की मांग रखी है। उनका तर्क है कि अगर स्कूलों में बच्चों के लिए पेयजल की व्यवस्था की गई है तो यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि मशीनें सही स्थिति में हों और उनसे मिलने वाला पानी निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो।
उन्होंने मांग की है कि मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी में लगाए गए सभी आरओ प्लांटों की स्वतंत्र तकनीकी एजेंसी से जांच कराई जाए। इसके साथ ही प्रत्येक प्लांट की खरीद और स्थापना से जुड़े वित्तीय रिकॉर्ड की भी जांच हो। अगर जांच में उपकरण की गुणवत्ता खराब पाई जाती है या भुगतान और वास्तविक बाजार कीमत के बीच नियमविरुद्ध अंतर सामने आता है तो जिम्मेदार लोगों से सरकारी राशि की वसूली और नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। अभिषेक झा ने इस जांच को सिर्फ दो जिलों तक सीमित रखने के बजाय मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत पूरे बिहार में लगाए गए आरओ सिस्टम तक विस्तारित करने की मांग भी की है।
अभिषेक झा ने जिस कीमत को लेकर सवाल उठाया है, उसमें काफी बड़ा अंतर बताया गया है। उनके अनुसार कुछ आरओ सिस्टम की बाजार कीमत लगभग 12 से 15 हजार रुपये के आसपास बताई जा रही है, जबकि सरकारी योजना के तहत प्रति मशीन 75 हजार रुपये से लेकर करीब एक लाख रुपये तक की राशि खर्च किए जाने का दावा किया गया है। हालांकि यह अंतर वास्तव में किस वजह से आया, इसमें मशीन की कीमत के अलावा इंस्टॉलेशन, चिलर सिस्टम, परिवहन, संरचना, वारंटी, सर्विसिंग या अन्य मद शामिल हैं या नहीं, इसका स्पष्ट निष्कर्ष किसी स्वतंत्र जांच के बाद ही सामने आ सकता है। इसलिए इस पूरे मामले में आरोप और प्रमाण के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
दरअसल, सरकारी खरीद में किसी उपकरण की बाजार कीमत और सरकारी परियोजना की कुल लागत हमेशा एक जैसी नहीं होती। किसी मशीन की आपूर्ति के साथ इंस्टॉलेशन, इलेक्ट्रिकल फिटिंग, पाइपलाइन, स्टैंड, वाटर कनेक्शन, परिवहन, तकनीकी सेवा और वारंटी जैसी लागतें भी जुड़ सकती हैं। लेकिन यदि किसी परियोजना की स्वीकृत राशि और वास्तविक सामग्री की लागत के बीच असामान्य अंतर हो, तो खरीद प्रक्रिया की जांच स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी आधार पर अभिषेक झा ने टेंडर और बीओक्यू जैसे दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग की है।
राजनीतिक तौर पर इस विवाद को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बंशीधर ब्रजवासी तिरहुत क्षेत्र में शिक्षक आंदोलन से जुड़े रहे हैं और बाद में विधान परिषद के सदस्य बने। 2024 में हुए तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के उपचुनाव में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत दर्ज की थी। उनकी जीत के बाद वे बिहार की राजनीति में एक चर्चित स्वतंत्र राजनीतिक चेहरे के रूप में उभरे।
अब तिरहुत स्नातक क्षेत्र के आगामी राजनीतिक मुकाबले के बीच अभिषेक झा और बंशीधर ब्रजवासी के बीच बयानबाजी का यह नया दौर सामने आया है। एक ओर अभिषेक झा एनडीए उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में हैं, वहीं ब्रजवासी पहले से क्षेत्र में सक्रिय हैं। ऐसे में आरओ प्लांट का विवाद केवल सरकारी योजना की जांच तक सीमित नहीं रहकर राजनीतिक बहस का विषय भी बन गया है।
अभिषेक झा ने अपने आरोपों के जरिए यह सवाल उठाया है कि सार्वजनिक धन के इस्तेमाल में जवाबदेही सभी के लिए समान होनी चाहिए। उनका कहना है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, जनप्रतिनिधि हो या अधिकारी—जिसके माध्यम से सरकारी राशि खर्च होती है, उससे खर्च का हिसाब मांगना जनता का अधिकार है। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने ब्रजवासी से भी आरओ योजना से संबंधित सभी कागजात सार्वजनिक करने की मांग की है।
उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी व्यक्ति को सीधे भ्रष्टाचारी घोषित नहीं कर रहे हैं, बल्कि योजना से जुड़े खर्च और प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी वित्तीय अनियमितता का अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजों, तकनीकी जांच और संबंधित विभाग की जांच के आधार पर ही निकाला जा सकता है। फिलहाल अभिषेक झा द्वारा लगाए गए आरोप राजनीतिक बयान और जांच की मांग के स्तर पर हैं।
विवाद में सबसे अहम दस्तावेज टेंडर, बीओक्यू, सप्लाई ऑर्डर, बिल, भुगतान वाउचर और गुणवत्ता प्रमाण-पत्र होंगे। यदि इन दस्तावेजों में मशीनों की खरीद कीमत, स्थापना लागत और भुगतान की गई राशि का स्पष्ट विवरण मिलता है तो यह पता लगाना आसान होगा कि प्रति आरओ सिस्टम पर वास्तव में कितना खर्च हुआ। इसी तरह स्वतंत्र तकनीकी जांच से यह भी पता चल सकता है कि लगाए गए सिस्टम निर्धारित क्षमता और गुणवत्ता के हैं या नहीं।
स्कूलों में लगे आरओ प्लांटों की वर्तमान स्थिति भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। केवल खरीद की कीमत की तुलना बाजार भाव से करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि कितने स्कूलों में मशीनें वास्तव में चालू हैं, कितने स्थानों पर नियमित रूप से पानी मिल रहा है, मशीनों का रखरखाव कौन कर रहा है, फिल्टर कब बदले गए और क्या पानी की गुणवत्ता की समय-समय पर जांच की गई। अगर योजना का उद्देश्य बच्चों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना है तो परिणाम का मूल्यांकन भी इसी आधार पर होना चाहिए।
अभिषेक झा की ओर से पूरे बिहार में मुख्यमंत्री क्षेत्र विकास योजना के तहत लगाए गए आरओ प्लांटों की जांच की मांग इस विवाद को और बड़ा बना देती है। यदि सरकार इस मांग पर जांच बैठाती है तो मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी के अलावा दूसरे जिलों में लगाए गए सिस्टम की खरीद और स्थापना प्रक्रिया भी जांच के दायरे में आ सकती है। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि सामने आया मामला किसी एक परियोजना तक सीमित है या सरकारी स्कूलों में पेयजल उपकरणों की खरीद से जुड़ी कोई व्यापक प्रक्रिया संबंधी समस्या है।
वहीं, इस पूरे मामले में बंशीधर ब्रजवासी का पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण होगा। यदि वे टेंडर, बीओक्यू, स्वीकृति आदेश, भुगतान और मशीनों की तकनीकी जानकारी सार्वजनिक करते हैं तो आरोपों पर स्थिति काफी स्पष्ट हो सकती है। इसी तरह यदि वे यह बताते हैं कि प्रति मशीन खर्च में कौन-कौन से मद शामिल थे और खरीद किस निर्धारित प्रक्रिया के तहत हुई, तो राजनीतिक विवाद के बीच वास्तविक तथ्य सामने रखने में मदद मिलेगी।
मुजफ्फरपुर में यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब तिरहुत स्नातक क्षेत्र की राजनीति पहले से ही सक्रिय है। चुनावी माहौल में सरकारी योजनाओं, शिक्षण संस्थानों और विकास कार्यों से जुड़े मुद्दे सीधे मतदाताओं के बीच चर्चा का विषय बनते हैं। इसलिए 66 आरओ प्लांट का मामला आने वाले दिनों में राजनीतिक मंचों पर भी उठना तय माना जा रहा है।
फिलहाल अभिषेक झा के आरोपों का केंद्र तीन प्रमुख सवाल हैं—सरकारी राशि से आरओ सिस्टम की खरीद किस प्रक्रिया के तहत हुई, प्रति सिस्टम वास्तविक लागत कितनी थी और लगाए गए उपकरणों की गुणवत्ता कैसी है। इन सवालों का अंतिम जवाब स्वतंत्र वित्तीय और तकनीकी जांच से ही मिल सकेगा। अगर जांच में प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुरूप पाई जाती है तो आरोपों की राजनीतिक धार कमजोर हो सकती है, लेकिन यदि गंभीर वित्तीय या तकनीकी अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करने का सवाल उठेगा।
इस विवाद ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि जनप्रतिनिधियों की विकास निधि से होने वाले कामों में खर्च और गुणवत्ता की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। खासकर स्कूलों से जुड़े कामों में पारदर्शिता का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि इन योजनाओं का सीधा संबंध बच्चों की सुविधाओं और सरकारी शिक्षा व्यवस्था से होता है। ऐसे में राजनीतिक आरोपों से अलग हटकर दस्तावेज आधारित जांच ही यह तय करेगी कि 66 आरओ सिस्टम की खरीद में वास्तव में कोई वित्तीय अनियमितता हुई है या नहीं।










