पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों के आलोचक रहे हैं, ने पहली बार उनकी सरकार की किसी बड़ी पहल की खुलकर सराहना की है। उन्होंने भारत की अध्यक्षता में संपन्न हुए BRICS शिखर सम्मेलन को पूरी तरह सफल बताया।
नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ राजनेता यशवंत सिन्हा ने भारत की अध्यक्षता में आयोजित BRICS Summit 2026 को सफल बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की भूमिका की सराहना की है। लंबे समय से मोदी सरकार की नीतियों के आलोचक रहे सिन्हा का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने BRICS सम्मेलन के दौरान भारत की कूटनीतिक सक्रियता और आयोजन की उपलब्धियों की खुलकर तारीफ की। हालांकि, चीन को लेकर उन्होंने अपने पुराने संदेह को बरकरार रखा और कहा कि बीजिंग पर आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता।
BRICS Summit की सफलता पर यशवंत सिन्हा ने क्या कहा?
झारखंड के हजारीबाग में समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में यशवंत सिन्हा ने भारत की अध्यक्षता में हुए BRICS Summit की उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सम्मेलन को सफल माना जाना चाहिए, क्योंकि जिन राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया था, वे सम्मेलन में शामिल हुए। इसके अलावा बैठक के बाद साझा घोषणापत्र जारी होना भी बड़ी उपलब्धि रही।
सिन्हा के मुताबिक, इससे पहले विदेश मंत्रियों की बैठक में मतभेदों के कारण संयुक्त घोषणा जारी नहीं हो सकी थी। ऐसे में इस बार सभी देशों की सहमति से साझा दस्तावेज जारी होना भारत की कूटनीतिक क्षमता और अधिकारियों की मेहनत को दर्शाता है।
चीन और ईरान के साथ भारत की कूटनीति की तारीफ
यशवंत सिन्हा ने BRICS Summit के दौरान हुई द्विपक्षीय बैठकों को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने खास तौर पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति की मौजूदगी का उल्लेख किया। उनका कहना था कि इतने महत्वपूर्ण नेताओं की उपस्थिति के बीच भारत ने साझा घोषणापत्र में अपनी प्राथमिकताओं और विचारों को जगह दिलाने में प्रभावी भूमिका निभाई।
उन्होंने पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक स्थिति का भी जिक्र किया। सिन्हा ने कहा कि ईरान के खिलाफ इजरायल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के दौरान भारत कुछ हद तक अलग-थलग दिखाई दे रहा था। वहीं, फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारत के पारंपरिक रुख की ओर लौटने को उन्होंने सकारात्मक संकेत बताया।
'चीन ने पीठ में खंजर भोंके हैं, भरोसा करना मुश्किल'

भारत-चीन संबंधों पर यशवंत सिन्हा का रुख हालांकि काफी सतर्क रहा। उन्होंने कहा कि चीन के साथ बातचीत जारी रहनी चाहिए, लेकिन उस पर पूरी तरह भरोसा करना आसान नहीं है। उन्होंने चीन के पुराने व्यवहार का हवाला देते हुए कहा कि भारत के लिए बीजिंग पर विश्वास करना चुनौतीपूर्ण है। सिन्हा ने यह भी संकेत दिया कि BRICS Summit के दौरान भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय बातचीत में कुछ तल्खी संभव है। उन्होंने इसी संदर्भ में शी जिनपिंग के डिनर में शामिल नहीं होने को भी चर्चा का विषय बताया।
उन्होंने BRICS सम्मेलन के परिणामों को ‘आधा भरा और आधा खाली गिलास’ की तरह देखने के बजाय पूरी तस्वीर पर ध्यान देने की बात कही। उनके मुताबिक, सम्मेलन में कुछ चुनौतियां जरूर मौजूद हैं, लेकिन भारत ने अपनी अध्यक्षता की जिम्मेदारी को काफी प्रभावी ढंग से निभाया।
मोदी सरकार की भूमिका की खुलकर सराहना
यशवंत सिन्हा ने कहा कि भारत ने BRICS की अध्यक्षता के दौरान अपनी भूमिका सफलतापूर्वक निभाई और कई ऐसे मुद्दों को साझा दस्तावेज की भाषा में शामिल कराया, जिन्हें सभी सदस्य देशों ने स्वीकार किया। उनके बयान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति और भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यशवंत सिन्हा लंबे समय तक BJP में रहते हुए मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के आलोचक रहे। वर्ष 2017 के बाद उन्होंने सरकार की आर्थिक नीतियों, खासकर आर्थिक प्रबंधन को लेकर खुलकर सवाल उठाए। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने BJP छोड़ दी और लोकतंत्र तथा सरकार की कार्यशैली को लेकर अपनी चिंताएं सार्वजनिक कीं।
उन्होंने राफेल सौदे को लेकर भी अरुण शौरी और प्रशांत भूषण के साथ मिलकर कानूनी रास्ता अपनाया। बाद में वह तृणमूल कांग्रेस से जुड़े और वर्ष 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार बने। हालांकि, राष्ट्रपति चुनाव के बाद उनकी सक्रिय राजनीति में भूमिका सीमित होती गई।











