हिमाचल में प्राइवेट स्कूल खोलना आसान, खेल मैदान का मानक आधा; दस्तावेजों का बोझ भी घटा

हिमाचल में निजी स्कूल खोलने के नियम आसान हुए हैं। खेल मैदान का क्षेत्रफल घटा, सरकारी मैदान के उपयोग की छूट मिली और गैर-जरूरी दस्तावेजों का बोझ भी कम हुआ।
हिमाचल में प्राइवेट स्कूल खोलना आसान, खेल मैदान का मानक आधा; दस्तावेजों का बोझ भी घटा
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हिमाचल प्रदेश में अब निजी स्कूल खोलने की प्रक्रिया पहले की तुलना में आसान हो गई है। राज्य सरकार ने पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों और जमीन की सीमित उपलब्धता को देखते हुए निजी स्कूलों के लिए खेल मैदान के न्यूनतम क्षेत्रफल के मानकों में बड़ा बदलाव किया है। शिक्षा विभाग की ओर से संशोधित व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है। इसके साथ ही स्कूलों के पंजीकरण और नवीनीकरण की प्रक्रिया में मांगे जाने वाले दस्तावेजों को भी सीमित किया गया है। सरकार के इस फैसले से उन संस्थाओं और प्रबंधनों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में निजी स्कूल शुरू करना चाहते हैं।

नए नियमों में सबसे बड़ा बदलाव खेल मैदान के न्यूनतम क्षेत्रफल को लेकर किया गया है। अब प्री-प्राइमरी से पांचवीं कक्षा तक स्कूल संचालित करने के लिए कम से कम 500 वर्गमीटर का खेल मैदान अनिवार्य होगा। इसी तरह प्री-प्राइमरी से आठवीं या दसवीं कक्षा तक स्कूल के लिए 800 वर्गमीटर और जमा दो यानी 12वीं कक्षा तक स्कूल के लिए 1000 वर्गमीटर खेल मैदान की आवश्यकता होगी। विभाग के अनुसार ये संशोधित मानक पहले की तुलना में लगभग आधे हैं।

सरकार के इस फैसले का सीधा संबंध हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियों से है। प्रदेश का बड़ा हिस्सा पहाड़ी है और यहां समतल जमीन की उपलब्धता मैदानी राज्यों की तुलना में काफी कम है। कई क्षेत्रों में स्कूल भवन के लिए जमीन उपलब्ध कराना ही चुनौतीपूर्ण होता है। इसके बाद उसी परिसर में बड़े आकार का खेल मैदान उपलब्ध कराना स्कूल प्रबंधन के लिए अतिरिक्त परेशानी बन जाता है। कई प्रस्ताव केवल इसलिए अटक सकते थे क्योंकि स्कूल के पास निर्धारित क्षेत्रफल का मैदान उपलब्ध नहीं था। नए नियमों से इस तरह की व्यावहारिक समस्या को कम करने की कोशिश की गई है।

संशोधित व्यवस्था के तहत स्कूल प्रबंधन को अब भी खेल मैदान की व्यवस्था करनी होगी। सरकार ने मैदान की अनिवार्यता को खत्म नहीं किया है, बल्कि उसके न्यूनतम आकार को कम किया है। इसका मतलब यह है कि विद्यार्थियों के लिए खेल और शारीरिक गतिविधियों की सुविधा उपलब्ध कराना अभी भी स्कूल की जिम्मेदारी रहेगी। केवल इतना बदलाव किया गया है कि पहाड़ी क्षेत्रों में जमीन की वास्तविक उपलब्धता को देखते हुए मैदान के लिए जरूरी क्षेत्रफल पहले से कम रखा गया है।

नए नियमों में उन स्कूलों के लिए भी राहत का रास्ता खोला गया है, जिनके पास अपने परिसर में खेल मैदान के लिए पर्याप्त जमीन नहीं है। ऐसे निजी स्कूल नजदीकी सरकारी, नगर निकाय या पंचायत के खेल मैदान का उपयोग कर सकेंगे। इसके लिए स्कूल प्रबंधन को संबंधित प्राधिकरण या जमीन मालिक के साथ किराया अथवा साझा उपयोग का समझौता करना होगा। यानी स्कूल के पास अपना मैदान नहीं होने की स्थिति में भी केवल इसी वजह से उसका पंजीकरण रोकने की स्थिति नहीं होगी, बशर्ते वह निर्धारित वैकल्पिक व्यवस्था और जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत करे।

सरकार ने खेल मैदान से जुड़े दस्तावेजों को लेकर भी स्पष्ट व्यवस्था की है। स्कूल खोलने के प्रस्ताव के साथ मैदान का पूरा विवरण देना होगा। जमीन मालिक के साथ किए गए मूल किराया समझौते की प्रति में खसरा नंबर के साथ मैदान की लंबाई और चौड़ाई भी दर्ज होनी चाहिए। इससे शिक्षा विभाग के अधिकारी यह सत्यापित कर सकेंगे कि आवेदन में जिस मैदान का उल्लेख किया गया है, वह वास्तव में उपलब्ध है और निर्धारित क्षेत्रफल के अनुरूप है।

सरकारी या पंचायत के मैदान का विकल्प मिलने से खास तौर पर छोटे शहरों और पहाड़ी ग्रामीण क्षेत्रों में निजी स्कूल खोलने वालों को फायदा हो सकता है। कई स्थानों पर गांव या स्थानीय निकाय के पास पहले से खेल मैदान मौजूद होते हैं, लेकिन स्कूल परिसर में अलग से मैदान विकसित करने के लिए पर्याप्त जमीन नहीं होती। अब वैध समझौते के आधार पर ऐसे मैदानों का उपयोग किया जा सकेगा। इससे स्कूल प्रबंधन को अतिरिक्त जमीन खरीदने या बड़े भूखंड की व्यवस्था करने की जरूरत कम हो सकती है।

शिक्षा विभाग ने निजी स्कूलों के पंजीकरण की प्रक्रिया में दस्तावेजों का बोझ भी कम करने का निर्णय लिया है। अब स्कूल प्रबंधन को वही दस्तावेज जमा करने होंगे, जो आरटीई अधिनियम, हिमाचल प्रदेश आरटीई नियम, 2025 और संबंधित कानूनों के तहत अनिवार्य हैं। ऐसे दस्तावेज जिन्हें कानून में अनिवार्य नहीं माना गया है, उन्हें हर आवेदन के साथ जमा कराने की आवश्यकता नहीं होगी।

अनिवार्य दस्तावेजों में फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र, बिल्डिंग सेफ्टी प्रमाणपत्र, सोसायटी या ट्रस्ट का पंजीकरण, पंजीकृत लीज एग्रीमेंट और खेल मैदान से जुड़े प्रमाणपत्र शामिल हैं। इन दस्तावेजों को बनाए रखने का उद्देश्य स्कूल की सुरक्षा और वैधता से जुड़े जरूरी पहलुओं की जांच करना है। यानी दस्तावेजों की संख्या कम करने के साथ सरकार ने उन प्रमाणपत्रों को बरकरार रखा है, जो विद्यार्थियों की सुरक्षा और स्कूल की कानूनी स्थिति के लिए महत्वपूर्ण हैं।

गैर-अनिवार्य दस्तावेजों के स्थान पर स्व-प्रमाणित घोषणा या प्रतिज्ञा पत्र देने की व्यवस्था की जा सकती है। इससे स्कूल खोलने वाले संस्थानों को अलग-अलग विभागों से कई कागजात जुटाने में लगने वाला समय कम हो सकता है। आवेदन प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत सरल होने की उम्मीद है। हालांकि यदि किसी संस्था ने स्व-प्रमाणित घोषणा में गलत जानकारी दी या जानबूझकर कोई तथ्य छिपाया तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। गलत जानकारी पाए जाने पर स्कूल का पंजीकरण रद्द करने की कार्रवाई भी हो सकती है।

शिक्षा विभाग के निदेशक स्कूल शिक्षा आशीष कोहली ने सभी जिलों के उपनिदेशकों को इस संबंध में निर्देश जारी किए हैं। विभाग ने आरटीई अधिनियम, 2009 के तहत निजी स्कूलों के पंजीकरण, नवीनीकरण और निजी स्कूलों में नौवीं से 12वीं कक्षा शुरू करने से जुड़े नियमों की समीक्षा के बाद बदलाव किए हैं। अब संबंधित अधिकारियों को निजी स्कूलों के प्रस्तावों की जांच संशोधित मानकों के अनुसार करने के निर्देश दिए गए हैं।

इस बदलाव का असर केवल नए स्कूल खोलने वालों पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि पहले से संचालित निजी स्कूलों के पंजीकरण और नवीनीकरण से जुड़े मामलों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। खासकर ऐसे स्कूल जो उच्च कक्षाएं शुरू करना चाहते हैं या अपनी संबद्धता का नवीनीकरण कराना चाहते हैं, उनके लिए संशोधित नियम महत्वपूर्ण होंगे। विभाग ने प्रक्रिया को एक समान और स्पष्ट बनाने की दिशा में यह कदम उठाया है।

हिमाचल प्रदेश में निजी स्कूल शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वर्तमान में 1162 निजी स्कूल हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड से संबद्ध बताए गए हैं। इनमें पांच स्कूलों ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई से संबद्धता के लिए बोर्ड से एनओसी ली है। निजी स्कूलों की संबद्धता हर वर्ष नवीनीकृत होती है और दस्तावेजों की जांच के साथ मौके पर भी सत्यापन किया जाता है।

ऐसे में सरकार के नए नियमों से निजी स्कूलों के लिए आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन स्कूलों की गुणवत्ता और सुरक्षा के साथ समझौता नहीं किया गया है। फायर सेफ्टी और बिल्डिंग सेफ्टी प्रमाणपत्र अब भी जरूरी हैं। संस्था का पंजीकरण और स्कूल की जमीन से संबंधित वैध दस्तावेज भी आवश्यक रहेंगे। खेल मैदान की व्यवस्था भी अनिवार्य है। अंतर केवल इतना है कि मैदान के लिए पहले की तुलना में कम क्षेत्रफल पर्याप्त माना जाएगा और अपना मैदान नहीं होने पर स्थानीय सरकारी या पंचायत मैदान का विकल्प उपलब्ध रहेगा।

खेल मैदान के मानकों में बदलाव को हिमाचल की जमीन संबंधी समस्या के संदर्भ में समझना जरूरी है। पहाड़ी क्षेत्रों में कई बार जमीन का एक बड़ा हिस्सा ढलान पर होता है। समतल जमीन का छोटा टुकड़ा भी महंगा और सीमित हो सकता है। ऐसे में मैदानी राज्यों के लिए सामान्य माना जाने वाला बड़ा खेल मैदान हिमाचल के किसी छोटे पहाड़ी कस्बे में स्कूल के लिए व्यावहारिक रूप से उपलब्ध कराना कठिन हो सकता है। सरकार ने इसी अंतर को ध्यान में रखकर क्षेत्रफल को कम किया है।

हालांकि खेल मैदान को पूरी तरह खत्म नहीं किया गया है, क्योंकि विद्यार्थियों के लिए खेल गतिविधियां शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बच्चों के शारीरिक विकास के साथ खेल अनुशासन, टीमवर्क और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी माने जाते हैं। इसलिए सरकार ने स्कूलों को मैदान की सुविधा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी बनाए रखी है। केवल यह सुनिश्चित किया गया है कि जमीन की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप मैदान का आकार व्यावहारिक हो।

सरकारी मैदान के उपयोग की अनुमति मिलने से स्कूल प्रबंधन और स्थानीय निकायों के बीच सहयोग की संभावना भी बढ़ेगी। यदि किसी पंचायत या नगर निकाय के पास पहले से खेल मैदान है तो स्कूल निर्धारित समझौते के तहत उसका इस्तेमाल विद्यार्थियों के लिए कर सकता है। इससे एक ही मैदान का उपयोग स्थानीय बच्चों और स्कूल के विद्यार्थियों के लिए किया जा सकता है, हालांकि इसके लिए उपयोग की शर्तें और समय से संबंधित व्यवस्था पहले से तय करना जरूरी होगा।

मैदान के दस्तावेजों में खसरा नंबर, लंबाई और चौड़ाई का उल्लेख किए जाने की शर्त का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सत्यापन भी है। इससे आवेदन में केवल कागजों पर मैदान दिखाने की संभावना कम होगी। विभाग के पास यह जांचने का आधार रहेगा कि स्कूल जिस जमीन को खेल मैदान के रूप में दिखा रहा है, वह वास्तव में उसी स्थान पर मौजूद है और उसका क्षेत्रफल आवेदन में दिए गए विवरण के अनुरूप है।

दस्तावेजों में राहत से स्कूल प्रबंधन को आवेदन प्रक्रिया में कम समय लग सकता है। पहले यदि कई गैर-जरूरी कागजात जुटाने पड़ते थे तो इससे स्कूल शुरू करने की प्रक्रिया लंबी हो सकती थी। अब कानूनी रूप से जरूरी दस्तावेजों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इससे शिक्षा विभाग के अधिकारियों के लिए भी आवेदन की जांच अधिक व्यवस्थित तरीके से करने की संभावना है।

सरकार के इस कदम का उद्देश्य निजी स्कूलों की संख्या बढ़ाना मात्र नहीं है। इसके पीछे प्रशासनिक प्रक्रिया को सरल बनाने और पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा संस्थान स्थापित करने की व्यावहारिक कठिनाइयों को कम करना भी महत्वपूर्ण कारण है। यदि किसी क्षेत्र में निजी स्कूल शुरू करने की मांग है और जमीन की समस्या के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही थी, तो संशोधित नियम उसके लिए राहत दे सकते हैं।

वहीं स्कूल प्रबंधन के लिए यह भी जरूरी होगा कि वे नए नियमों को केवल कागजी औपचारिकता न समझें। विद्यार्थियों की सुरक्षा, भवन की मजबूती, अग्नि सुरक्षा और खेल सुविधाओं को वास्तविक रूप से उपलब्ध कराना होगा। सरकार ने भले ही कुछ मानकों में राहत दी है, लेकिन जरूरी सुरक्षा प्रमाणपत्रों को बरकरार रखकर यह स्पष्ट किया है कि प्रक्रिया सरल होने का अर्थ नियमों से पूरी छूट नहीं है।

नए नियमों के तहत यदि कोई स्कूल प्रबंधन अपने मैदान के बजाय सरकारी, नगर निकाय या पंचायत के मैदान का उपयोग करता है तो उसे संबंधित प्राधिकरण या जमीन मालिक के साथ वैध किराया अथवा साझा उपयोग समझौता प्रस्तुत करना होगा। इससे स्कूल और मैदान के स्वामित्व या उपयोग को लेकर भविष्य में विवाद की स्थिति को कम किया जा सकेगा।

कुल मिलाकर हिमाचल प्रदेश सरकार ने निजी स्कूल खोलने की प्रक्रिया में दो महत्वपूर्ण स्तरों पर राहत दी है। एक तरफ खेल मैदान के न्यूनतम क्षेत्रफल को पहले के मुकाबले आधा कर दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ अपना मैदान उपलब्ध नहीं होने पर सरकारी, नगर निकाय या पंचायत के मैदान के इस्तेमाल का विकल्प दिया गया है। इसके अलावा पंजीकरण के दौरान गैर-जरूरी दस्तावेजों का बोझ कम किया गया है। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में निजी स्कूल खोलने की प्रक्रिया अधिक व्यावहारिक और सरल होने की उम्मीद है।

नई व्यवस्था तत्काल प्रभाव से लागू हो चुकी है। अब निजी स्कूल खोलने या पंजीकरण का नवीनीकरण कराने वाले संस्थानों को संशोधित मानकों के अनुसार आवेदन करना होगा। प्री-प्राइमरी से पांचवीं तक 500 वर्गमीटर, आठवीं या दसवीं तक 800 वर्गमीटर और 12वीं तक 1000 वर्गमीटर खेल मैदान की व्यवस्था करनी होगी। साथ ही फायर सेफ्टी, बिल्डिंग सेफ्टी, संस्था पंजीकरण, पंजीकृत लीज और खेल मैदान से जुड़े जरूरी प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने होंगे।

इस फैसले से हिमाचल के उन क्षेत्रों में निजी शिक्षा संस्थान शुरू करने की राह आसान हो सकती है जहां जमीन की कमी सबसे बड़ी बाधा रही है। सरकार ने नियमों को सरल बनाते हुए यह कोशिश की है कि विद्यार्थियों की जरूरी सुविधाएं और सुरक्षा मानक भी बने रहें। अब देखना होगा कि संशोधित व्यवस्था के बाद निजी स्कूलों के नए आवेदन कितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं और पहाड़ी क्षेत्रों में इसका कितना व्यावहारिक लाभ मिलता है।

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