दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के तीन नेता 23 घंटे की हिरासत के बाद रिहा हो गए। कोर्ट ने एक साल तक शांति बनाए रखने की शर्त रखी। प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई से जुड़ी दो याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है।
नई दिल्ली: दिल्ली में 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किया था। पुलिस का कहना था कि आवेदन निर्धारित समय से काफी देर से दिया गया और पहले के प्रदर्शन में तय शर्तों का पालन नहीं हुआ था। दूसरी ओर, CJP ने प्रदर्शन को चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाने का प्रयास बताया।
23 घंटे हिरासत में रहने के बाद तीनों की रिहाई
अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को शनिवार को दिल्ली एयरपोर्ट पर हिरासत में लिया गया था। वे CJP के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए राजधानी पहुंचे थे। रविवार सुबह तीनों को दिल्ली कैंट स्थित कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक, तीनों के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 170 के तहत एहतियाती कार्रवाई की गई थी। अदालत ने उन्हें एक साल तक शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया।
रिहाई के लिए तीनों ने 50-50 हजार रुपये के जमानती मुचलके भरे। CJP की कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने भी सोशल मीडिया पर उनकी रिहाई की जानकारी साझा की।
एक साल की शर्त का क्या मतलब है?
अदालत की शर्त के अनुसार, तीनों नेताओं को अगले एक साल तक शांति भंग करने वाली गतिविधियों से दूर रहना होगा। मुचलके की शर्तों का उल्लंघन होने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है और जमानती राशि जब्त किए जाने का सवाल भी उठ सकता है।
हालांकि, शांति बनाए रखने की शर्त का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि तीनों नेताओं पर हर तरह के प्रदर्शन में शामिल होने का पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। शांतिपूर्ण विरोध और कानून-व्यवस्था भंग करने वाली गतिविधियों के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। किसी भी प्रतिबंध का वास्तविक दायरा अदालत के आदेश और लागू कानून के अनुसार तय होगा।
सुप्रीम कोर्ट में दो याचिकाओं पर सुनवाई
दिल्ली में पुलिस कार्रवाई और सार्वजनिक परिवहन पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में रविवार को विशेष सुनवाई रखी गई। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ के सामने दो अलग-अलग याचिकाएं आईं।
पहली याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर की। इसमें आरोप लगाया गया कि 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद नहीं करने के निर्देश के बावजूद मेट्रो स्टेशनों और रेल सेवाओं पर व्यापक पाबंदियां लगाई गईं।
याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) की अध्यक्ष डी. थारा के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई। ये आरोप याचिकाकर्ता के हैं; अवमानना का दोष अदालत के निर्णय के बिना स्थापित नहीं माना जा सकता।
दूसरी याचिका में हिरासत को चुनौती
दूसरी याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी की ओर से दायर की गई। इसमें प्रदर्शन के दौरान विपक्षी नेताओं और अन्य लोगों को एहतियातन हिरासत में लेने की कार्रवाई को चुनौती दी गई।
याचिका में दलील दी गई कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था और मौलिक अधिकारों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एहतियाती हिरासत का इस्तेमाल इस अधिकार को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
इस मामले में अदालत के सामने यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन कौन-से कदम उठा सकता है और उन कदमों से नागरिकों के अधिकारों पर कितना असर पड़ता है।

45 मेट्रो स्टेशन बंद करने और ट्रेनें रद्द करने पर विवाद
CJP के प्रदर्शन से पहले दिल्ली में व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। कई मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश और निकास रोकने के साथ कुछ रेल सेवाओं पर भी असर पड़ा। इससे यात्रियों को परेशानी हुई और सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंधों की आवश्यकता को लेकर सवाल उठे।
9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुरक्षा उपायों और परिवहन सेवाओं पर व्यापक रोक के अनुपात पर चिंता जताई थी। अदालत ने कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के प्रयासों में आम नागरिकों की आवाजाही पर अनावश्यक असर नहीं पड़ना चाहिए। उसने प्रशासन को सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह बंद करने के बजाय नियंत्रित संचालन सुनिश्चित करने के लिए कहा था।
प्रदर्शन के दौरान मेट्रो और रेल सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों के पालन को लेकर ही अवमानना याचिका दायर की गई है। इस मामले में अंतिम कानूनी स्थिति अदालत की सुनवाई और आदेशों से स्पष्ट होगी।
दिल्ली में 30 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती
प्रदर्शन के दूसरे दिन भी राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस और अर्धसैनिक बलों के हजारों जवान संवेदनशील इलाकों, प्रमुख सड़कों, रेलवे स्टेशनों और मेट्रो परिसरों में तैनात किए गए थे।
कनॉट प्लेस, मंडी हाउस और जंतर-मंतर के आसपास बैरिकेडिंग की गई। दिल्ली के प्रवेश मार्गों पर वाहनों की जांच भी की गई। प्रशासन का कहना था कि सुरक्षा इंतजामों का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना और संभावित अव्यवस्था को रोकना था।
दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों और विपक्षी नेताओं ने हिरासत तथा परिवहन प्रतिबंधों पर सवाल उठाए। शनिवार की कार्रवाई में कितने लोगों को हिरासत में लिया गया, इसे लेकर विभिन्न रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े सामने आए। इसलिए संख्या को किसी एक सर्वमान्य आधिकारिक आंकड़े के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
अभिजीत दीपके के परिवार ने जताया दुख
CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके की हिरासत के दौरान उनके परिवार से जुड़ा एक भावनात्मक मामला भी सामने आया। उनकी मां अनीता दीपके के मुताबिक, परिवार उनकी 85 वर्षीय दादी सावित्रीबाई शंकरराव दीपके के निधन के बाद उनके घर लौटने का इंतजार कर रहा था।
परिवार ने कहा कि यदि अभिजीत को पहले रिहा कर दिया जाता, तो वह अपनी दादी के अंतिम संस्कार में शामिल हो सकते थे। उनकी मां ने पुलिस की ओर से परिवार को दी गई जानकारी और संपर्क की स्थिति पर भी सवाल उठाए।
यह परिवार का पक्ष है। पुलिस और परिवार के बीच संचार को लेकर उठे सवालों पर स्पष्टता संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयान से ही आ सकती है।
CJP का अगला कदम क्या होगा?
रिहाई के बाद CJP ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “कॉकरोच कभी नहीं मरते।” पार्टी ने रविवार दोपहर 2 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की घोषणा भी की, जिसमें नेताओं की हिरासत, अदालत की शर्तों और आंदोलन की आगे की रणनीति पर जानकारी दिए जाने की उम्मीद थी।
CJP मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर अपनी आपत्तियां उठा रही है। पार्टी और प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में बदलावों पर सवाल किए हैं, जबकि इन आरोपों और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े दावों का मूल्यांकन आधिकारिक आंकड़ों और संबंधित संस्थाओं के जवाब के आधार पर किया जाना चाहिए।
फिलहाल, तीनों नेताओं की रिहाई से हिरासत से जुड़ा एक घटनाक्रम समाप्त हुआ है, लेकिन प्रदर्शन की अनुमति, सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंध और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को लेकर कानूनी सवाल बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और संबंधित पक्षों के आगे के कदम इस मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे।










