अमेरिकी बेस कैंप में धमाकों से दहशत अबू धाबी से लौटे युवक ने बताया-अलर्ट मिलते ही भागना पड़ता था, दिन में 5 बार आती थी चेतावनी"

अबू धाबी से लौटे युवक ने अमेरिकी बेस कैंप में हुए धमाकों का खौफनाक अनुभव साझा किया। बताया कि हर दिन 5 बार अलर्ट मिलता था और जान बचाने के लिए भागना पड़ता था।
अमेरिकी बेस कैंप में धमाकों से दहशत अबू धाबी से लौटे युवक ने बताया-अलर्ट मिलते ही भागना पड़ता था, दिन में 5 बार आती थी चेतावनी"
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मुजफ्फरपुर-अबू धाबी से लौटे एक युवक ने अमेरिकी बेस कैंप के भीतर के खौफनाक हालात का ऐसा खुलासा किया है, जिसे सुनकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं। युवक ने बताया कि वहां रहना किसी जंग के मैदान में जिंदगी बिताने जैसा था, जहां हर पल डर, अनिश्चितता और खतरे का माहौल बना रहता था। उसने कहा कि अक्सर देर रात या सुबह के शांत माहौल में अचानक तेज धमाकों की आवाज गूंज उठती थी, जो सीधे कमरे तक सुनाई देती थी। इन धमाकों की तीव्रता इतनी अधिक होती थी कि कई बार दीवारें तक हिलती महसूस होती थीं और दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं।

युवक के मुताबिक, बेस कैंप के अंदर रह रहे लोगों के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी लगातार मिल रही चेतावनियां। उसने बताया कि दिन में करीब पांच बार अलर्ट जारी किया जाता था, और हर अलर्ट के साथ एक नई घबराहट शुरू हो जाती थी। जैसे ही सायरन बजता या मोबाइल पर नोटिफिकेशन आता, सभी लोग अपने-अपने काम छोड़कर तुरंत सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगते थे। कई बार यह स्थिति इतनी अचानक बनती थी कि लोगों को समझ ही नहीं आता था कि क्या करें और कहां जाएं। कुछ लोग घबराहट में इधर-उधर भागते नजर आते थे, तो कुछ लोग पहले से तय शेल्टर की ओर दौड़ पड़ते थे।

उसने बताया कि वहां के हालात इतने तनावपूर्ण थे कि सामान्य जीवन जीना लगभग असंभव हो गया था। खाने-पीने से लेकर सोने तक हर चीज पर इस डर का असर पड़ता था। रात को सोते समय भी यही चिंता रहती थी कि न जाने कब अगला अलर्ट आ जाए और फिर भागना पड़े। कई बार तो लोग पूरी रात जागते रहते थे, क्योंकि हर थोड़ी देर में किसी न किसी तरह की हलचल या चेतावनी मिल जाती थी। इस वजह से मानसिक थकान और तनाव लगातार बढ़ता चला जाता था।

युवक ने यह भी बताया कि बेस कैंप में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम जरूर थे, लेकिन खतरा इतना ज्यादा था कि उन इंतजामों के बावजूद डर कम नहीं होता था। हर जगह सुरक्षाकर्मी तैनात रहते थे और समय-समय पर सुरक्षा अभ्यास भी कराया जाता था, ताकि किसी आपात स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया दी जा सके। बावजूद इसके, जब असली धमाके होते थे, तो स्थिति पूरी तरह से बदल जाती थी और हर कोई अपनी जान बचाने के लिए भागने लगता था।

उसने कहा कि वहां काम करने वाले लोगों के लिए यह सब धीरे-धीरे रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि डर खत्म हो गया था। बल्कि हर दिन एक नई चिंता और तनाव लेकर आता था। कई लोग इस माहौल में खुद को ढालने की कोशिश करते थे, लेकिन अंदर ही अंदर वे भी इस स्थिति से परेशान रहते थे। कुछ लोग तो ऐसे भी थे जो इस डर के कारण ठीक से काम नहीं कर पा रहे थे और हर समय मानसिक दबाव में रहते थे।

युवक के अनुसार, कई बार ऐसा भी हुआ जब अलर्ट के बाद कोई बड़ा धमाका नहीं हुआ, लेकिन उस दौरान जो घबराहट और अफरा-तफरी मचती थी, वह भी कम डरावनी नहीं होती थी। लोग जल्दी-जल्दी अपने जरूरी सामान उठाकर सुरक्षित स्थानों की ओर भागते थे, और उस समय किसी को किसी की परवाह नहीं होती थी, हर कोई सिर्फ अपनी जान बचाने में लगा रहता था। इस तरह की स्थिति बार-बार बनने से लोगों के मन में असुरक्षा की भावना और गहरी होती चली गई।

उसने बताया कि लंबे समय तक ऐसे माहौल में रहने के बाद उसका मानसिक संतुलन भी प्रभावित होने लगा था। उसे हर वक्त ऐसा लगता था कि कहीं कुछ होने वाला है। अचानक तेज आवाज सुनते ही वह चौंक जाता था और दिल तेजी से धड़कने लगता था। इस डर और तनाव ने उसकी दिनचर्या पूरी तरह बदल दी थी। आखिरकार, जब उसे लगा कि अब इस माहौल में रहना उसके लिए संभव नहीं है, तो उसने वहां से लौटने का फैसला किया।

भारत लौटने के बाद भी वह उन अनुभवों को भूल नहीं पा रहा है। उसने कहा कि आज भी जब वह उन दिनों को याद करता है, तो उसके मन में वही डर और बेचैनी वापस आ जाती है। हालांकि अब वह सुरक्षित जगह पर है, लेकिन उस बेस कैंप में बिताए गए दिन उसके जीवन के सबसे कठिन और भयावह अनुभवों में शामिल हो गए हैं। उसने कहा कि वह कभी भी दोबारा ऐसे माहौल में जाने की कल्पना भी नहीं कर सकता, जहां हर पल जान का खतरा महसूस होता हो और जिंदगी अनिश्चितता के बीच गुजरती हो

 

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