'मंदिरों तक पहुंच सभी के लिए होनी चाहिए', सुप्रीम कोर्ट का सबरीमाला मामले में बड़ा बयान

Supreme Court of India ने सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि मंदिरों तक पहुंच सभी के लिए होनी चाहिए। इस टिप्पणी से धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर बहस तेज

Sabarimala Temple से जुड़े मामले में Supreme Court of India ने गुरुवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हर व्यक्ति को सभी मंदिरों और मठों में प्रवेश का अधिकार मिलना चाहिए।

नई दिल्ली: भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता और मंदिर प्रवेश नियमों पर अहम और सख्त टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति या समूह को मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो इससे सामाजिक विभाजन और असमानता को बढ़ावा मिल सकता है।

यह मामला लंबे समय से विवादों में रहे Sabarimala Temple से जुड़ा है, जहां परंपरागत धार्मिक प्रथाओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर बहस चल रही है।

मंदिरों तक पहुंच सभी के लिए होनी चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्थलों तक पहुंच को केवल किसी एक वर्ग तक सीमित करना सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि सभी व्यक्तियों को धार्मिक स्थलों और मठों तक समान रूप से पहुंच का अधिकार होना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी विशेष समूह के नाम पर अन्य लोगों को मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तो इसका नकारात्मक प्रभाव न केवल समाज पर पड़ता है, बल्कि धार्मिक एकता को भी प्रभावित कर सकता है।

केंद्र सरकार का पक्ष और 2018 के फैसले पर बहस

इस मामले में केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े 2018 के फैसले को लेकर अपना पक्ष रखा। सरकार की ओर से कहा गया कि यह निर्णय उस धारणा पर आधारित था, जिसे कुछ पक्षों द्वारा चुनौती दी जा रही है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में कहा कि यह मामला किसी “पुरुष-केंद्रित” या “महिला-केंद्रित” धार्मिक मान्यताओं का नहीं है, बल्कि यह धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन का विषय है।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने तर्क दिया कि धार्मिक संप्रदाय की अवधारणा को केवल एक धर्म तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक मंदिरों में सभी हिंदू वर्गों को प्रवेश की अनुमति होनी चाहिए, भले ही वह मंदिर किसी विशेष परंपरा से जुड़ा हो। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पहले के कुछ न्यायिक निर्णयों में यह माना गया था कि सार्वजनिक प्रकृति के मंदिरों में सभी हिंदुओं को प्रवेश का अधिकार होना चाहिए।

गैर-हिंदू श्रद्धालुओं को लेकर दलील

सुनवाई के दौरान यह भी तर्क सामने आया कि सबरीमाला मंदिर में गैर-हिंदू श्रद्धालुओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। यदि कोई व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, भगवान अयप्पा में आस्था रखता है, तो उसे मंदिर में प्रवेश से रोका नहीं जाता। इस तर्क ने यह बहस और तेज कर दी कि धार्मिक आस्था को आधार बनाकर प्रवेश नियम किस सीमा तक लागू किए जा सकते हैं।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति ने कई उदाहरणों का उल्लेख करते हुए धार्मिक परंपराओं की विविधता को समझाया। एक उदाहरण में कहा गया कि केरल के कुछ मंदिरों में शर्ट पहनकर प्रवेश की अनुमति नहीं होती, जो कि परंपरा का हिस्सा है। मुख्य न्यायाधीश ने भी गुरुवायूर मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पुरुषों के लिए विशेष ड्रेस कोड लागू होता है, जिसके तहत शर्ट पहनने की अनुमति नहीं होती। ऐसे नियमों को परंपरा और धार्मिक आचरण का हिस्सा माना जाता है।

Leave a comment