अरावली हिल्स पर बड़ा मोड़: सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश पर लगाई रोक, नई कमेटी होगी गठित

अरावली हिल्स पर बड़ा मोड़: सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश पर लगाई रोक, नई कमेटी होगी गठित

सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा से जुड़े पुराने आदेश पर रोक लगाई है। 100 मीटर नियम से संरक्षण सीमित होने की आशंका पर कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा और अगली सुनवाई 21 जनवरी तय की।

Rajasthan: अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित “100 मीटर नियम” को स्वीकार किया था। इस नियम के अनुसार, जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृति को अरावली पहाड़ी माना जाता था। साथ ही, 500 मीटर के दायरे में मौजूद दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों को अरावली रेंज की श्रेणी में रखा गया था।

सरकार का तर्क था कि इससे अरावली क्षेत्र की एक समान और वैज्ञानिक परिभाषा तय होगी। लेकिन इस परिभाषा को लेकर पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इस नियम से अरावली का बड़ा हिस्सा कानूनी सुरक्षा से बाहर हो सकता है।

पर्यावरणविदों की आपत्ति 

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली पहाड़ियां केवल ऊंचाई तक सीमित नहीं हैं। इनमें सहायक पहाड़ियां, ढलानें और आसपास की भूमि भी शामिल होती हैं, जो पूरे इकोसिस्टम को संतुलित रखती हैं। 100 मीटर नियम लागू होने से कई प्राकृतिक संरचनाएं अरावली की परिभाषा से बाहर हो सकती हैं।

इससे अवैध और वैध खनन को बढ़ावा मिलने का खतरा बताया गया। अरावली पर्वतमाला भूजल संरक्षण, जैव विविधता और थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने में अहम भूमिका निभाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर संरक्षण कमजोर हुआ तो इसके पर्यावरणीय नुकसान लंबे समय तक देखने को मिलेंगे।

सुप्रीम कोर्ट की रोक और केंद्र से सवाल

इन सभी आशंकाओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर को अपने पहले के आदेश पर रोक लगा दी। अदालत ने साफ कहा कि जब तक सभी तकनीकी, वैज्ञानिक और पर्यावरणीय पहलुओं की निष्पक्ष समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक पुराने आदेश को लागू नहीं किया जाएगा और यथास्थिति बनी रहेगी।

कोर्ट ने केंद्र सरकार से कई अहम सवालों पर जवाब मांगा है। इनमें अरावली पहाड़ियों की सही परिभाषा, 500 मीटर के दायरे का आधार, खनन पर पूरी रोक या सशर्त अनुमति जैसे मुद्दे शामिल हैं। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने एक हाई पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी गठित करने का सुझाव भी दिया है, ताकि मामले की गहराई से जांच हो सके।

21 जनवरी को अगली सुनवाई

इस मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने की। पीठ ने स्पष्ट किया कि 20 नवंबर को दिया गया आदेश अगली सुनवाई तक लागू नहीं रहेगा। अगली सुनवाई 21 जनवरी 2026 को होगी।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कोर्ट की कुछ टिप्पणियों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है, जिससे भ्रम फैल रहा है। उन्होंने साफ किया कि बिना ठोस और वैज्ञानिक रिपोर्ट के किसी भी आदेश को लागू करना सही नहीं होगा।

गौरतलब है कि यह मामला टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपद केस से भी जुड़ा हुआ है, जिसमें देशभर में वन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े दिशा-निर्देश दिए जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि अरावली जैसी प्राचीन पर्वतमाला के संरक्षण के लिए जल्दबाजी नहीं, बल्कि विशेषज्ञों की राय और विस्तृत अध्ययन के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाना चाहिए।

कोर्ट का उद्देश्य साफ है, ऐसी परिभाषा तय करना जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखे और आने वाली पीढ़ियों के लिए अरावली पर्वतमाला को सुरक्षित रख सके।

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