दिल्ली से शुरू हुई ‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’ आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अगुवाई में देशभर के सनातन धर्म प्रेमियों में चर्चा का विषय बनी हुई है। पदयात्रा का मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म की एकता और जागरूकता फैलाना है। भक्तों में यह उत्सुकता है कि क्या प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज भी इस यात्रा में शामिल होंगे।
Bageshwar Dham Padyatra: दिल्ली से 10 दिनों के लिए शुरू हुई ‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’ आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अगुवाई में देशभर में सनातन धर्म की जागरूकता और एकता का संदेश फैलाने के लिए निकाली गई है। यह पदयात्रा 16 नवंबर को वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर में समाप्त होगी। पदयात्रा में शामिल संतों और भक्तों के बीच यह चर्चा भी गर्म है कि वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज इस यात्रा में शारीरिक रूप से शामिल होंगे या नहीं।
सनातन एकता पदयात्रा की शुरुआत और महत्व
दिल्ली से शुरू हुई ‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’ देशभर के सनातन धर्म प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अगुवाई में यह पदयात्रा 10 दिन तक चलेगी और 16 नवंबर को वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर में समापन होगा। इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म की एकता और जागरूकता फैलाना है।
पद यात्रा में शामिल संतों और भक्तों के लिए यह एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अनुभव साबित हो रहा है। यात्रियों और स्थानीय लोगों के बीच उत्साह चरम पर है, और लोग इस अवसर पर धर्म और समाज सेवा के संदेश को समझने और साझा करने के लिए जुटे हैं।

प्रेमानंद महाराज से हुई भेंट और आमंत्रण
पिछले महीने बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर आचार्य धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने वृंदावन पहुंचकर प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज से भेंट की। इस भेंट के दौरान बागेश्वर बाबा ने उन्हें पदयात्रा में शामिल होने का आमंत्रण दिया। प्रेमानंद महाराज ने इसे स्नेहपूर्वक स्वीकार किया और लगभग पंद्रह मिनट तक सनातन धर्म की एकता और समाज में जागरूकता जैसे विषयों पर गहन चर्चा की।
हालांकि, पदयात्रा में उनकी शारीरिक उपस्थिति को लेकर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। संत प्रेमानंद महाराज ने कहा कि वह भाव रूप में इस यात्रा में सम्मिलित रहेंगे और यह पहल सनातन धर्म को नई दिशा देगी।
भक्तों और समाज में उत्सुकता
सनातन धर्म के दो प्रमुख संतों के संभावित संगम को लेकर भक्तों में उत्सुकता बढ़ गई है। प्रेमानंद महाराज की भागीदारी यात्रा को और अधिक महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक दृष्टि से मूल्यवान बना सकती है।
भक्त और धर्मप्रेमी अब 16 नवंबर तक इंतजार कर रहे हैं, जब पदयात्रा का समापन होगा और यह स्पष्ट होगा कि दोनों संतों का संगम संभव हो पाया या नहीं।











