26 साल की कानूनी लड़ाई के बाद गरजा बुलडोजर CS कंपाउंड की 25 दुकानों-क्लिनिक पर चली जस्ब खाली कराई गई 9 कट्ठा जमीन

भागलपुर के CS कंपाउंड में 26 साल पुराने जमीन विवाद के बाद कोर्ट के आदेश पर 25 दुकानें और निजी क्लिनिक ढहाए गए। 9 कट्ठा जमीन खाली कराई गई।
26 साल की कानूनी लड़ाई के बाद गरजा बुलडोजर CS कंपाउंड की 25 दुकानों-क्लिनिक पर चली जस्ब खाली कराई गई 9 कट्ठा जमीन
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भागलपुर के सिविल सर्जन यानी CS कंपाउंड में करीब 26 साल से चल रहे जमीन विवाद का आखिरकार प्रशासनिक कार्रवाई के साथ पटाक्षेप हुआ। न्यायालय के आदेश के अनुपालन में रविवार को प्रशासनिक टीम ने परिसर में बनी 25 दुकानों और एक निजी क्लिनिक को जेसीबी की मदद से ढहा दिया। कार्रवाई के दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में पुलिस बल की तैनाती के बीच दखलदेहानी की प्रक्रिया पूरी कराई गई। लंबे समय से विवादित करीब 27 डिसमिल यानी लगभग 9 कट्ठा जमीन को खाली कराने के बाद अब वहां से मलबा हटाने का काम भी शुरू कर दिया गया है।

यह मामला केवल दुकानों और एक निजी क्लिनिक को हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे जमीन के मालिकाना हक को लेकर चली करीब ढाई दशक लंबी कानूनी लड़ाई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित जमीन को लेकर वैद्यनाथ गुप्ता की ओर से वर्ष 1998 में टाइटल सूट दायर किया गया था। विवाद की जड़ पुराने सर्वे रिकॉर्ड से जुड़ी बताई गई है। वादी पक्ष के अधिवक्ता के अनुसार वर्ष 1978 से 1985 के बीच हुए सर्वे के दौरान संबंधित जमीन को बिहार सरकार के नाम दर्ज कर दिया गया था, जबकि वादी पक्ष का दावा था कि जमीन पर उनका वैध अधिकार है।

मामला अदालत में पहुंचने के बाद लंबे समय तक इसकी सुनवाई चली। वर्ष 2011 में अदालत ने वादी वैद्यनाथ गुप्ता के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से प्रथम अपील की गई। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक प्रथम अपील में भी सरकार को राहत नहीं मिली और वादी के पक्ष में आया निर्णय बरकरार रहा। इसके बाद न्यायालय की ओर से जमीन पर दखलदेहानी का आदेश दिया गया। इसी आदेश के अनुपालन में प्रशासन ने अब सीएस कंपाउंड में बनी दुकानों और निजी क्लिनिक को हटाने की कार्रवाई की है।

कार्रवाई के दौरान प्रशासन की ओर से पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया गया था, ताकि किसी तरह का विवाद या विरोध होने पर स्थिति को नियंत्रित किया जा सके। पूरी कार्रवाई मजिस्ट्रेट की निगरानी में कराई गई। रिपोर्ट के अनुसार दखलदेहानी की कार्रवाई के लिए तीन जेसीबी मशीनें लगाई गई थीं, जबकि ढहाई गई दुकानों और क्लिनिक का मलबा हटाने के लिए तीन से चार ट्रैक्टर लगाए गए। प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार पूरे परिसर को खाली कराने और मलबा हटाने में दो से तीन दिन का समय लग सकता है।

इस जमीन पर बनी दुकानों और क्लिनिक को हटाने की कार्रवाई इससे पहले भी शुरू की गई थी, लेकिन उस समय मामला काफी विवादित हो गया था। करीब छह-सात महीने पहले प्रशासनिक टीम न्यायालय के आदेश के आधार पर दखलदेहानी के लिए पहुंची थी। कार्रवाई शुरू होते ही दुकानदारों ने विरोध और हंगामा किया था। स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि कार्रवाई कर रही टीम के साथ हाथापाई की स्थिति तक बन गई थी। बाद में तत्कालीन सदर एसडीएम विकास कुमार मौके पर पहुंचे और तत्काल कार्रवाई रोक दी गई थी। उस समय दुकानदारों की ओर से आरोप लगाया गया था कि उन्हें पर्याप्त नोटिस नहीं दिया गया और दुकान तथा क्लिनिक से सामान हटाने के लिए भी पर्याप्त समय नहीं मिला।

इस बार प्रशासन ने पहले से तैयारी की। रिपोर्ट के मुताबिक 7 अगस्त को न्यायालय के आदेश के बाद संबंधित दुकानदारों को नोटिस दिया गया था। उन्हें दुकान और क्लिनिक खाली करने तथा अपना सामान निकालने के लिए समय दिया गया। इसके बाद रविवार को पुलिस बल की मौजूदगी में दखलदेहानी की कार्रवाई शुरू की गई। इस वजह से प्रशासन ने पिछली कार्रवाई के दौरान पैदा हुई स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस बार सुरक्षा व्यवस्था भी मजबूत रखी।

जिस जमीन को लेकर यह पूरा विवाद चला, उसका क्षेत्रफल करीब 27 डिसमिल बताया गया है, जो लगभग 9 कट्ठा के बराबर है। इस जमीन के मालिकाना हक को लेकर दायर टाइटल सूट ने करीब 26 वर्षों तक कानूनी प्रक्रिया का रूप लिया। ऐसे मामलों में पुराने सर्वे रिकॉर्ड, खाता-कहानी, कब्जे और मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज अहम भूमिका निभाते हैं। इस मामले में भी पुराने सर्वे के दौरान जमीन के सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज होने को लेकर विवाद खड़ा हुआ और बाद में यही विवाद अदालत तक पहुंचा।

रिपोर्ट के अनुसार वादी पक्ष का कहना था कि सर्वे के दौरान उनकी जमीन को बिहार सरकार की जमीन के तौर पर दर्ज कर दिया गया। इसके बाद वर्ष 1998 में न्यायालय में टाइटल सूट दायर किया गया। वर्ष 2011 में फैसला आने के बाद भी मामला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, क्योंकि सरकार की ओर से प्रथम अपील की गई। प्रथम अपील में भी राहत नहीं मिलने के बाद न्यायालय के आदेश के आधार पर जमीन पर दखल दिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। आखिरकार अब प्रशासन ने वहां मौजूद निर्माण को हटाकर जमीन खाली कराने की कार्रवाई की।

सीएस कंपाउंड में कार्रवाई के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा 25 दुकानों और निजी क्लिनिक को हटाए जाने को लेकर रही। लंबे समय से यहां दुकानें और क्लिनिक संचालित हो रहे थे। प्रशासन की कार्रवाई के बाद इन सभी संरचनाओं को जेसीबी से गिरा दिया गया। दुकानों के ढहने के बाद निकले मलबे को हटाने के लिए ट्रैक्टरों की मदद ली गई। प्रशासनिक टीम का फोकस अब पूरे परिसर को खाली कराने और न्यायालय के आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने पर है।

इस कार्रवाई ने भागलपुर में जमीन से जुड़े पुराने विवादों और सरकारी रिकॉर्ड में जमीन के दर्ज होने के मामलों को लेकर भी चर्चा तेज कर दी है। भागलपुर में जमीन से जुड़े विवादों को लेकर न्यायालयों में कई मामले सामने आते रहे हैं। जुलाई 2026 में पटना हाई कोर्ट ने भी भागलपुर से जुड़े एक अलग जमीन मामले में कहा था कि किसी व्यक्ति की रैयती जमीन पर बिना कानूनी अधिग्रहण और मुआवजे के सरकारी निर्माण नहीं किया जा सकता। हालांकि, वह मामला सीएस कंपाउंड के मौजूदा विवाद से अलग है, लेकिन इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि जमीन के मालिकाना हक और सरकारी रिकॉर्ड से जुड़े विवादों में न्यायिक प्रक्रिया और दस्तावेजों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है।

सीएस कंपाउंड मामले में भी अदालत के फैसले के बाद प्रशासन को दखलदेहानी की कार्रवाई करनी पड़ी। खास बात यह रही कि शुरुआती स्तर पर कार्रवाई का विरोध हुआ और प्रक्रिया रोकनी पड़ी, लेकिन बाद में नोटिस दिए जाने के बाद प्रशासन ने दोबारा कार्रवाई की। इससे यह भी पता चलता है कि न्यायालय के आदेश को जमीन पर लागू कराने की प्रक्रिया कई बार केवल आदेश जारी होने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रशासन को मौके की स्थिति, कब्जाधारियों, सुरक्षा और सामान हटाने जैसी व्यावहारिक परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ता है।

भागलपुर में जमीन से जुड़े मामलों की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन के लिए ऐसी कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी बड़ी चुनौती होती है। यही कारण रहा कि सीएस कंपाउंड में इस बार मजिस्ट्रेट के साथ पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती की गई। अधिकारियों की मौजूदगी में कार्रवाई होने से किसी बड़े विवाद की स्थिति बनने से रोका गया और जेसीबी से निर्माण हटाने की प्रक्रिया पूरी की गई।

अब प्रशासन के सामने अगला काम परिसर से पूरी तरह मलबा हटाने का है। अधिकारियों के मुताबिक इसमें दो से तीन दिन तक का समय लग सकता है। इसके बाद करीब 27 डिसमिल यानी 9 कट्ठा विवादित जमीन पूरी तरह खाली हो जाएगी। लंबे समय से चले आ रहे इस मामले में जमीन पर मौजूद निर्माण हटाए जाने के बाद अब न्यायालय के आदेश के अनुपालन की प्रक्रिया भी पूरी होने की दिशा में आगे बढ़ गई है।

26 साल से चल रहे इस विवाद के खत्म होने के बाद सबसे बड़ा संदेश यही है कि जमीन के मालिकाना हक से जुड़े मामलों में पुराने रिकॉर्ड और दस्तावेजों की भूमिका बेहद अहम होती है। एक ओर जहां सरकारी रिकॉर्ड में जमीन को लेकर विवाद सामने आया, वहीं दूसरी ओर अदालत में लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद फैसला आया। फैसला आने के बाद भी अपील की प्रक्रिया चली और अंततः प्रशासन को न्यायालय के आदेश पर मौके पर जाकर कार्रवाई करनी पड़ी। भागलपुर के सीएस कंपाउंड में 25 दुकानों और एक निजी क्लिनिक पर चली जेसीबी की कार्रवाई इसी लंबे कानूनी विवाद का अंतिम प्रशासनिक चरण मानी जा रही है।

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