CDS जनरल अनिल चौहान की आर्मेनिया यात्रा ने भारत-आर्मेनिया रक्षा सहयोग को नया आयाम दिया। आधुनिक हथियार, प्रशिक्षण और साझा रणनीति से क्षेत्रीय संतुलन मजबूत हुआ। यात्रा से भारत की वैश्विक रक्षा कूटनीति में नई ताकत दिखी।
नई दिल्ली: भारतीय सेना की बढ़ती ताकत और स्वदेशी रक्षा प्रणालियों की सफलता अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। इसी कड़ी में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान की आर्मेनिया यात्रा को रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह यात्रा यह संदेश देती है कि भारत अब केवल रक्षा का उपभोक्ता नहीं बल्कि भरोसेमंद निर्माता और वैश्विक साझेदार बन गया है।
जनरल चौहान के नेतृत्व में उच्च स्तरीय भारतीय रक्षा प्रतिनिधिमंडल एक फरवरी को येरेवन पहुँचा। उनका औपचारिक स्वागत किया गया और सम्मान गार्ड भी दिया गया। यह पहला अवसर है जब भारत के इतने वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व ने आर्मेनिया के साथ सीधे और व्यापक रक्षा संवाद को इस स्तर पर आगे बढ़ाया।
द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को मजबूती
जनरल चौहान ने आर्मेनिया के रक्षा मंत्री सुरेन पापक्यान से विस्तृत वार्ता की। दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को मजबूत करने, दीर्घकालिक सुरक्षा साझेदारी को गहरा करने और साझा सामरिक हितों को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। 2026 के लिए निर्धारित गतिविधियों के प्रभावी क्रियान्वयन, सैन्य शिक्षा, पेशेवर प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास और युद्धाभ्यास पर भी जोर दिया गया।

इसके अलावा, आर्मेनियाई सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख स्टाफ और उप मंत्री लेफ्टिनेंट जनरल एडवर्ड अस्र्यान के साथ बैठक में सशस्त्र सेनाओं के आधुनिकीकरण में भारत की भूमिका पर चर्चा हुई। दोनों देशों ने तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षण और आधुनिक हथियार प्रणालियों के आदान-प्रदान पर महत्वपूर्ण समझौते किये।
आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप पर दृष्टिकोण
जनरल चौहान ने राष्ट्रीय रक्षा अनुसंधान विश्वविद्यालय में बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य, प्रौद्योगिकी के बढ़ते महत्व और बहु-क्षेत्रीय युद्ध पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि अब युद्ध स्थल, आकाश, समुद्र, अंतरिक्ष और डिजिटल फील्ड में एक साथ संचालित हो रहा है। भारतीय सेना का अनुभव, अनुकूलन क्षमता और स्वदेशी तकनीक इस नए युद्ध वातावरण में निर्णायक साबित हो रही है।
मानवीय संवेदना का संदेश
अपनी यात्रा के दौरान जनरल चौहान ने आर्मेनियाई जनसंहार स्मारक और संग्रहालय में पुष्पांजलि अर्पित की। इस स्मारक में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लगभग पंद्रह लाख नागरिकों के मृत्यु पर श्रद्धांजलि दी गई। भारतीय प्रमुख रक्षा अध्यक्ष की उपस्थिति ने मानवीय संवेदना और ऐतिहासिक पीड़ा के प्रति सम्मान का संदेश दिया।
भारत-आर्मेनिया रक्षा समझौते
भारत और आर्मेनिया के संबंधों में रक्षा सहयोग की धुरी तेजी से मजबूत हो रही है। वर्ष 2020 के बाद आर्मेनिया ने भारत से कई बड़े रक्षा समझौते किए। इनमें पिनाका बहु नली रॉकेट प्रक्षेपक, आकाश वायु रक्षा प्रणाली, टैंक रोधी प्रक्षेपास्त्र, राडार और गोला बारूद शामिल हैं। आर्मेनिया आकाश प्रणाली को अपनाने वाला पहला विदेशी देश बना।

वर्ष 2022 में पिनाका प्रणाली की चार बैटरी के लिए समझौता किया गया जिसकी कीमत हजारों करोड़ रुपये आंकी गई। हाल ही में पिनाका रॉकेट की पहली खेप रवाना की गई। आर्मेनिया ने अन्य प्रणालियों में भी रुचि दिखाई और सुखोई 30 लड़ाकू विमानों के अपग्रेडेशन पर विचार कर रहा है।
क्षेत्रीय सामरिक संतुलन
आर्मेनिया लंबे समय तक सोवियत और रूसी हथियारों पर निर्भर रहा। भारत ने इन प्रणालियों को आधुनिक बनाने में दक्षता दिखाई। साझा पृष्ठभूमि ने दोनों देशों को स्वाभाविक साझेदार बनाया। आर्मेनियाई अधिकारियों ने भारतीय अनुभव को प्रभावशाली बताया। बदलते क्षेत्रीय हालात, खासकर अजरबैजान और तुर्की से तनाव, आर्मेनिया को अपने रक्षा स्रोतों में विविधता लाने पर मजबूर कर रहे हैं।
इसके विपरीत, तुर्की, पाकिस्तान और अजरबैजान के बीच बढ़ती सैन्य नजदीकी क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित कर रही है। इस तिकड़ी ने कई मौकों पर एक-दूसरे को समर्थन दिया, संयुक्त अभ्यास और तकनीकी सहयोग बढ़ाया। ऐसे में भारत-आर्मेनिया साझेदारी दक्षिण काकेशस क्षेत्र में संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण कदम है।
आर्थिक और खनन सहयोग की संभावनाएं
भारत और आर्मेनिया के बीच आर्थिक सहयोग में भी संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। द्विपक्षीय व्यापार फिलहाल सीमित है, लेकिन आर्मेनिया का यूरोपीय और ईरान के निकट स्थान, सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र और प्रवासी समुदाय भारत के लिए प्रवेश द्वार बन सकते हैं। खनन क्षेत्र में सोना, तांबा और मोलिब्डेनम के भंडार भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन संसाधनों का उपयोग रक्षा निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग में किया जा सकता है।











