द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विशेष तिथि है, जो भगवान गणेश को समर्पित मानी जाती है. मान्यता है कि इस दिन व्रत और कथा का पाठ करने से संकट दूर होते हैं. व्रत कथा भक्ति, सेवा और विनम्रता के महत्व को रेखांकित करती है.
Dwijapriya Sankashti Chaturthi 2026: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है, जो इस वर्ष 5 फरवरी को देशभर में श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है. इस दिन भगवान गणेश की पूजा, व्रत और कथा का विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती को स्वयं गणेश जी ने इस व्रत की कथा सुनाई थी. कथा के माध्यम से यह बताया गया है कि सच्ची भक्ति, सेवा भाव और सम्मान से गणेश जी प्रसन्न होते हैं और भक्तों के कष्ट दूर करते हैं.
क्या है द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जिसका अर्थ है संकटों से मुक्ति दिलाने वाली तिथि. वहीं फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विशेष रूप से द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश ब्राह्मणों और अपने भक्तों की पूजा से शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं.
धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं में उल्लेख मिलता है कि माता पार्वती ने स्वयं भगवान गणेश से इस व्रत और इससे जुड़ी कथा के बारे में पूछा था. तब गणेश जी ने उन्हें द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की कथा सुनाई थी, जो आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित है.
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा
प्रचलित कथा के अनुसार, प्राचीन समय में युवनाश्व नाम के एक धर्मनिष्ठ और दयालु राजा राज्य किया करते थे. उसी राज्य में विष्णुशर्मा नामक एक ब्राह्मण रहते थे. विष्णुशर्मा के सात पुत्र थे, लेकिन उनके परिवार में हमेशा कलह और अशांति का माहौल बना रहता था. आपसी विवादों के कारण उनके सभी पुत्र अलग-अलग रहने लगे.
विष्णुशर्मा वृद्ध हो चुके थे और शारीरिक रूप से भी कमजोर हो गए थे. इसके बावजूद वे अपने पुत्रों से स्नेह बनाए रखने के लिए प्रतिदिन बारी-बारी से उनके घर भोजन करने जाया करते थे. समय के साथ उनकी स्थिति और खराब होती गई और बहुएं भी उनका आदर करने के बजाय तिरस्कार करने लगीं.
एक बार संकष्टी चतुर्थी का दिन आया. उस दिन विष्णुशर्मा भगवान गणेश का व्रत रखना चाहते थे. वे अपनी बड़ी बहू के घर गए और उससे विनम्रता से कहा कि आज संकष्टी चतुर्थी है और वे गणेश पूजा करना चाहते हैं. उन्होंने बहू से पूजा सामग्री की व्यवस्था करने को कहा और यह भी बताया कि इससे घर में भगवान गणेश का आशीर्वाद बना रहेगा.
लेकिन बड़ी बहू ने घर के कामों का बहाना बनाकर उनकी बात अनसुनी कर दी. निराश होकर विष्णुशर्मा वहां से लौट आए. इसके बाद वे एक-एक करके अपनी अन्य बहुओं के घर गए, लेकिन किसी ने भी उनके व्रत और पूजा में सहयोग नहीं किया.
अंत में वे अपनी छोटी बहू के घर पहुंचे. छोटी बहू अत्यंत निर्धन थी और उसका जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था. उसकी आर्थिक स्थिति देखकर विष्णुशर्मा पहले तो उससे कुछ कहने में संकोच करने लगे. लेकिन छोटी बहू ने ससुर को स्नेह और सम्मान के साथ देखा और स्वयं ही उनके व्रत की बात पूछी.
जब विष्णुशर्मा ने संकष्टी चतुर्थी के व्रत की इच्छा जताई, तो छोटी बहू ने बिना किसी हिचक के कहा कि वह भी उनके साथ व्रत करेगी. सीमित साधनों के बावजूद उसने जैसे-तैसे पूजा की सामग्री एकत्र की और ससुर के साथ मिलकर विधिपूर्वक भगवान गणेश की पूजा की.

व्रत का फल और कथा का संदेश
पूजा के बाद रात में चंद्रोदय के समय दोनों ने चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया. कथा के अनुसार, इस व्रत और पूजा के प्रभाव से छोटी बहू के जीवन में बड़ा परिवर्तन आया. भगवान गणेश उसकी भक्ति, सेवा भाव और ससुर के प्रति सम्मान से प्रसन्न हुए और उसे कुबेर समान धन-संपत्ति का वरदान दिया.
कुछ ही समय में छोटी बहू का घर धन और समृद्धि से भर गया. वहीं जिन बहुओं ने विष्णुशर्मा का अपमान किया था, उन्हें जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. इस कथा के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि सच्ची भक्ति, सेवा और विनम्रता से भगवान गणेश शीघ्र प्रसन्न होते हैं.
क्यों जरूरी है व्रत कथा का पाठ
धार्मिक मान्यता है कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत कथा का पाठ या श्रवण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है. जो श्रद्धालु किसी कारणवश कथा पढ़ नहीं पाते, उन्हें कम से कम कथा का श्रवण जरूर करना चाहिए. माना जाता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई गणेश पूजा जीवन की बाधाओं को दूर करती है और सुख-शांति प्रदान करती है.
इसी विश्वास के साथ देशभर में आज श्रद्धालु द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखकर भगवान गणेश की आराधना कर रहे हैं और रात्रि में चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत का पारण करेंगे.











