बिहार का अगला सीएम कौन? सम्राट चौधरी की रॉकेट रफ्तार और बीजेपी-आरएसएस में अंदरूनी समीकरण

बिहार में मुख्यमंत्री पद को लेकर सियासी हलचल तेज है। जानें कैसे Samrat Chaudhary की रॉकेट रफ्तार और बीजेपी-आरएसएस के अंदरूनी समीकरण अगले सीएम की

बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री पद को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर कई संभावित चेहरों के नाम सामने आए हैं, लेकिन सम्राट चौधरी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। मात्र 7-8 वर्षों में पार्टी में उनका तेज उभार और अब मुख्यमंत्री पद की दावेदारी ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया है। 

पटना: बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री पद को लेकर इन दिनों चर्चाओं का बाजार गर्म है। भाजपा के भीतर कई नेताओं के नाम चर्चा में हैं, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान सम्राट चौधरी पर है। महज 7-8 वर्षों में पार्टी में उनके तेज उभार और मुख्यमंत्री पद की दावेदारी ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया है। हालांकि, इस तेजी से पार्टी और वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कुछ वर्गों में असहजता भी महसूस की जा रही है।

सम्राट चौधरी: तेज उभार और राजनीति की गति

सम्राट चौधरी ने 2018 में बीजेपी में शामिल होकर अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। वह पिछड़ी जाति (कोयरी) से आते हैं और पार्टी में अपने सामाजिक विस्तार की रणनीति के लिए उन्हें जाना जाता है। महज कुछ वर्षों में वे प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद तक पहुंचे और अब मुख्यमंत्री पद की दौड़ में प्रमुख दावेदार बन गए हैं।

हालांकि, इस तेजी ने संगठन और वरिष्ठ नेताओं के बीच सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजेपी और आरएसएस में आमतौर पर संगठनात्मक अनुभव और वैचारिक प्रतिबद्धता को महत्व दिया जाता है। ऐसे में सम्राट चौधरी की तेज प्रगति कुछ वर्गों को ‘शॉर्टकट राजनीति’ के रूप में भी दिख रही है।

आरएसएस का नजरिया और संगठनात्मक संतुलन

आरएसएस हमेशा से बीजेपी का वैचारिक मार्गदर्शन करती रही है। संघ की प्राथमिकता ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाना रही है जिनका संगठन में लंबा अनुभव हो और जो विवादों से दूर संतुलित नेतृत्व दे सकें। सूत्रों के अनुसार, संघ के भीतर ऐसे नेताओं को तरजीह दी जाती है जिनकी स्वीकार्यता व्यापक हो। इस दृष्टिकोण से सम्राट चौधरी की तेज रफ्तार पर कुछ नेताओं में संदेह है। संगठन के पारंपरिक नेताओं, जैसे विजय कुमार सिन्हा, को अधिक स्थायित्व और वैचारिक संतुलन के लिए प्राथमिकता दी जाती रही है।

सम्राट चौधरी का पिछड़ी जाति (कोयरी) से होना उनके लिए राजनीतिक लाभ है। बिहार में जातीय राजनीति महत्वपूर्ण है और गैर यादव ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने के लिए यह बीजेपी के लिए रणनीतिक प्लस पॉइंट है। लेकिन सवर्ण समाज के कुछ वर्गों में यह भावना है कि उनका प्रतिनिधित्व कम हो रहा है। राज्य में पिछले समय में आरक्षण और सामाजिक मुद्दों पर नाराजगी देखी गई है। मुख्यमंत्री पद पर ओबीसी चेहरे को प्राथमिकता देने से यह नाराजगी और बढ़ सकती है।

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