हरियाणा के गुरुग्राम में एक बड़े कॉर्पोरेट फ्रॉड का मामला सामने आया है, जिसमें कंपनी के पूर्व कर्मचारियों पर फर्जी वेंडर बनाकर करोड़ों रुपए की ठगी करने का आरोप है। इस मामले में गुरुग्राम पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
गुरुग्राम: हरियाणा में 1.85 करोड़ रुपये की बड़ी ठगी का मामला सामने आया है। आरोपियों ने फर्जी वेंडर बनाकर एक कंपनी को निशाना बनाया और धोखाधड़ी के जरिए लाखों रुपये ट्रांसफर करवा लिए। मामले का खुलासा होने के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस अब इस ठगी में शामिल अन्य लोगों और नेटवर्क की जांच कर रही है। यह मामला वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कॉर्पोरेट गवर्नेंस और वित्तीय पारदर्शिता से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है।

फर्जी वेंडर बनाकर करोड़ों की ठगी
मामला तब सामने आया जब कावासाकी रोबोटिक्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रतिनिधि ने 20 मई 2025 को पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई। कंपनी रोबोटिक्स और ऑटोमेशन सेवाएं प्रदान करती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कार्यरत है।
शिकायत के अनुसार, 2015 से 2023 के बीच कंपनी के कुछ कर्मचारियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए फर्जी वेंडर और कंपनियां बनाई। इन फर्जी संस्थाओं के नाम पर नकली बिल तैयार किए गए और बिना किसी वास्तविक सेवा के कंपनी से बड़ी रकम ट्रांसफर करवा ली गई।
इस तरह आरोपियों ने सुनियोजित तरीके से वित्तीय धोखाधड़ी को अंजाम दिया।
तकनीकी जांच से हुआ खुलासा
पुलिस ने मामले की जांच के दौरान तकनीकी साक्ष्यों और बैंक ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड का विश्लेषण किया। इसके आधार पर 19 फरवरी को फरीदाबाद से गौरव धींगड़ा (37) को गिरफ्तार किया गया।
पूछताछ में पता चला कि गौरव धींगड़ा के बैंक खातों में लगभग 1.85 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए गए थे। उसने अपने सहयोगी लवीश के साथ मिलकर धींगड़ा एंटरप्राइजेज” नाम की एक फर्जी फर्म बनाई थी, जिसे कंपनी का वैध वेंडर दिखाया गया।
इस फर्जी फर्म के जरिए कंपनी से भुगतान हासिल किया गया। आरोपी को इस काम के बदले करीब 5 लाख रुपए का हिस्सा मिला।
रिश्तेदारों के खातों में ट्रांसफर की गई रकम
जांच के दौरान एक और आरोपी कमल कालरा (42) को 6 अप्रैल को फरीदाबाद से गिरफ्तार किया गया।
पुलिस के अनुसार, कमल कालरा मुख्य आरोपी लवीश का रिश्तेदार है। उसके बैंक खाते में लगभग 1.82 लाख रुपए और उसकी पत्नी के खाते में करीब 35 लाख रुपए ट्रांसफर किए गए थे।
यह ट्रांजैक्शन इस बात की ओर इशारा करता है कि आरोपियों ने पैसे को अलग-अलग खातों में बांटकर ट्रैकिंग से बचने की कोशिश की।
संगठित धोखाधड़ी का मामला
जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि यह कोई साधारण धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक संगठित वित्तीय अपराध है, जिसमें कई लोग शामिल हो सकते हैं।
पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान करने और उनकी गिरफ्तारी के प्रयास में जुटी है। साथ ही, यह भी जांच की जा रही है कि क्या इस तरह की धोखाधड़ी अन्य कंपनियों में भी की गई है।
इस घटना ने कॉर्पोरेट सेक्टर में आंतरिक नियंत्रण और ऑडिट सिस्टम की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।









