'भाजपा-कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी गुटबाजी एक्सपर्ट बोले- हार मिली तो नेता छोड़ सकते हैं पार्टी, SIR से बदल सकता है वोटों का गणित

राजनीतिक एक्सपर्ट के मुताबिक भाजपा और कांग्रेस की गुटबाजी चुनावी नुकसान का कारण बन सकती है। हार की स्थिति में नेताओं के पाला बदलने और SIR से वोट गणित बदलने की चर्चा है।
'भाजपा-कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी गुटबाजी एक्सपर्ट बोले- हार मिली तो नेता छोड़ सकते हैं पार्टी, SIR से बदल सकता है वोटों का गणित
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नावी राजनीति में किसी भी पार्टी के लिए संगठन की एकजुटता बेहद महत्वपूर्ण होती है। नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल मजबूत हो तो पार्टी चुनावी मैदान में बेहतर तरीके से मुकाबला कर सकती है, लेकिन गुटबाजी बढ़ने पर इसका सीधा असर उम्मीदवारों के चयन, प्रचार और बूथ स्तर के प्रबंधन तक दिखाई देता है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के सामने अंदरूनी गुटबाजी को बड़ी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि चुनाव में किसी दल को अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो संगठन के भीतर असंतोष बढ़ सकता है और कुछ नेता भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को देखते हुए पाला बदलने का फैसला भी कर सकते हैं।

राजनीतिक विश्लेषण में यह भी चर्चा है कि चुनावी मुकाबला केवल दो दलों के बीच वोट प्रतिशत की लड़ाई नहीं रह गया है। उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय समीकरण, जातीय और सामाजिक समूहों का समर्थन, संगठन की सक्रियता और मतदाता सूची में बदलाव जैसे कई कारक अंतिम परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। इसी क्रम में SIR यानी Special Intensive Revision को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक दलों के बीच पहले से बहस चलती रही है। विपक्ष जहां इससे मतदाताओं के नाम प्रभावित होने की आशंका जताता रहा है, वहीं समर्थक पक्ष इसे मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने की प्रक्रिया बताता है।

SIR के कारण चुनावी गणित पर असर की चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी विधानसभा क्षेत्र में कुछ हजार वोटों का अंतर भी परिणाम बदल सकता है। यदि किसी क्षेत्र में मतदाता सूची में बड़े स्तर पर बदलाव होता है तो राजनीतिक दलों को अपने पारंपरिक वोट बैंक के वास्तविक आकार का नए सिरे से आकलन करना पड़ सकता है। यही वजह है कि चुनाव से पहले मतदाता सूची की स्थिति राजनीतिक दलों की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है।

हालांकि SIR को लेकर लगाए जाने वाले राजनीतिक आरोपों को तथ्य के रूप में देखने के बजाय संबंधित चुनाव आयोग की प्रक्रिया और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर समझना जरूरी है। बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले भी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद हुआ था। विपक्षी दलों ने मतदाताओं के नाम हटने को लेकर सवाल उठाए थे, जबकि समर्थक पक्ष ने इसे मृत, स्थानांतरित या अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को अद्यतन करने की प्रक्रिया बताया था।

भाजपा और कांग्रेस की गुटबाजी की बात करें तो दोनों राष्ट्रीय दलों में अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर नेताओं के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं। हरियाणा कांग्रेस में हाल के घटनाक्रम में वरिष्ठ नेता संपत सिंह ने पार्टी छोड़ते हुए संगठन की अंदरूनी गुटबाजी और नेतृत्व से जुड़े कई सवाल उठाए थे। उनके इस्तीफे में कई वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने के उदाहरण भी दिए गए थे।

कांग्रेस के लिए गुटबाजी की समस्या खास तौर पर तब गंभीर हो सकती है जब किसी राज्य में पार्टी सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही हो। अलग-अलग नेताओं के अपने समर्थक समूह होने की स्थिति में टिकट वितरण के समय विवाद पैदा हो सकता है। यदि किसी नेता को टिकट नहीं मिलता या उसे लगता है कि संगठन में उसकी अनदेखी हो रही है तो उसके समर्थकों पर भी इसका असर पड़ सकता है।

भाजपा में भी चुनाव के दौरान टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व को लेकर असंतोष की स्थिति बन सकती है। हालांकि भाजपा का संगठनात्मक ढांचा आमतौर पर मजबूत माना जाता है, लेकिन अलग-अलग राज्यों में स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद सामने आते रहे हैं। चुनाव में हार या कमजोर प्रदर्शन की स्थिति में यह असंतोष खुलकर सामने आने की संभावना बढ़ सकती है।

एक्सपर्ट के मुताबिक चुनावी हार के बाद सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि पार्टी के भीतर जिम्मेदारी किसकी तय होगी। यदि नेता एक-दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ने लगें तो संगठन में तनाव बढ़ सकता है। इसके बाद कुछ नेता अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दूसरे दलों की ओर भी देख सकते हैं। हालांकि किसी नेता के पार्टी छोड़ने का फैसला कई व्यक्तिगत और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

पाला बदलने की राजनीति भारतीय चुनावों में नई नहीं है। कई बार चुनाव से पहले ही नेता दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें वहां बेहतर राजनीतिक अवसर दिखाई देता है। कुछ मामलों में चुनाव परिणाम के बाद भी दल बदल देखने को मिलता है। इसलिए यदि किसी पार्टी में चुनाव से पहले गुटबाजी तेज हो जाए तो नेतृत्व के लिए असंतुष्ट नेताओं को साथ रखना बड़ी चुनौती बन जाता है।

चुनाव में उम्मीदवारों की भूमिका भी इस पूरे समीकरण को प्रभावित करती है। कई सीटों पर पार्टी का नाम महत्वपूर्ण होता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि और उसके समर्थकों का नेटवर्क परिणाम बदल सकता है। यदि किसी मजबूत स्थानीय नेता को पार्टी का टिकट नहीं मिलता और वह बागी होकर चुनाव लड़ता है तो उसके कारण पार्टी का वोट विभाजित हो सकता है।

इसी तरह गुटबाजी का असर चुनाव प्रचार पर भी पड़ता है। एक ही पार्टी के अलग-अलग नेता यदि अलग-अलग उम्मीदवारों के समर्थन में सक्रिय हों तो कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का उत्साह कम होने का असर मतदान वाले दिन भी दिखाई दे सकता है।

दूसरी तरफ यदि पार्टी नेतृत्व समय रहते मतभेद दूर कर लेता है तो गुटबाजी को चुनावी नुकसान में बदलने से रोका जा सकता है। बड़े नेताओं की संयुक्त सभाएं, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय और उम्मीदवारों के समर्थन में एकजुट अभियान संगठन को मजबूत संदेश दे सकता है।

SIR का मुद्दा भी राजनीतिक दलों के लिए दोधारी तलवार की तरह है। मतदाता सूची में बदलाव से यदि किसी क्षेत्र में वास्तविक मतदाताओं की संख्या और सामाजिक संरचना बदलती है तो पार्टियों को अपनी रणनीति भी बदलनी पड़ सकती है। जिन बूथों पर किसी दल का पारंपरिक वोट मजबूत रहा है, वहां मतदाता सूची में हुए बदलाव के बाद उसे नए आंकड़ों के आधार पर बूथ मैनेजमेंट करना होगा।

विपक्षी दलों के लिए यह जरूरी होगा कि वे मतदाता सूची में नाम कटने या बदलाव से संबंधित शिकायतों को प्रमाण और आधिकारिक प्रक्रिया के जरिए सामने रखें। वहीं सत्तारूढ़ या चुनावी प्रक्रिया का समर्थन करने वाले दलों के लिए पारदर्शिता और मतदाताओं को सही जानकारी देना महत्वपूर्ण होगा। चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा तभी मजबूत होगा जब मतदाता यह महसूस करें कि सूची में बदलाव स्पष्ट और नियमों के अनुसार हुआ है।

राजनीतिक जानकार यह भी मानते हैं कि SIR अकेले किसी चुनाव का परिणाम तय नहीं करता। बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, विकास, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की छवि, जातीय समीकरण और सरकार के प्रति जनता की नाराजगी या संतुष्टि जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए SIR को चुनावी गणित का एक कारक माना जा सकता है, लेकिन इसे अकेले निर्णायक मानना उचित नहीं होगा।

कई सीटों पर मुकाबला इतना करीबी होता है कि कुछ हजार वोटों का बदलाव भी जीत-हार का अंतर तय कर सकता है। ऐसे में राजनीतिक दल मतदाता सूची के हर बूथ के आंकड़ों पर नजर रखते हैं। पार्टी संगठन यह पता लगाने की कोशिश करता है कि किन बूथों पर उसके समर्थक मतदाताओं की संख्या अधिक है और कहां उसे अतिरिक्त मेहनत करनी होगी।

भाजपा और कांग्रेस के लिए एक और बड़ी चुनौती यह है कि दोनों पार्टियों को अपने पारंपरिक समर्थकों के साथ नए मतदाताओं को भी जोड़ना होगा। युवाओं, महिलाओं, पहली बार मतदान करने वालों और शहरी मतदाताओं के बीच मुद्दे अलग हो सकते हैं। यदि संगठन के अंदर गुटबाजी होती है तो इन नए मतदाताओं तक एक समान संदेश पहुंचाना मुश्किल हो सकता है।

चुनावी राजनीति में पार्टी की केंद्रीय रणनीति और स्थानीय संगठन के बीच तालमेल बेहद जरूरी है। राष्ट्रीय नेतृत्व यदि एक मुद्दा उठाता है, लेकिन स्थानीय नेता अलग-अलग मुद्दों पर बयान देते हैं, तो मतदाताओं के बीच पार्टी की प्राथमिकताओं को लेकर भ्रम पैदा हो सकता है। इसलिए चुनावी सफलता के लिए संदेश की एकरूपता भी महत्वपूर्ण है।

हाल के राजनीतिक घटनाक्रम यह दिखाते हैं कि गुटबाजी का मुद्दा केवल एक पार्टी तक सीमित नहीं है। हरियाणा कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं के बीच अंदरूनी मतभेद और पार्टी छोड़ने जैसे घटनाक्रम सामने आए हैं। वहीं अन्य राज्यों में भी चुनावी तैयारियों के दौरान स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

आने वाले चुनावों में भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए संगठन को एकजुट रखना इसलिए महत्वपूर्ण होगा क्योंकि मुकाबला कई क्षेत्रों में बेहद करीबी हो सकता है। यदि पार्टी के नेता एक-दूसरे के खिलाफ ही सक्रिय रहे तो विपक्षी उम्मीदवार को इसका फायदा मिल सकता है। इसके विपरीत यदि सभी गुट चुनाव के समय एक साथ मैदान में उतरते हैं तो संगठन की सामूहिक ताकत बढ़ सकती है।

SIR के मुद्दे पर भी आने वाले समय में राजनीतिक बयानबाजी जारी रहने की संभावना है। मतदाता सूची में बदलाव को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष के दावों के बीच चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रक्रिया और आंकड़े सबसे महत्वपूर्ण आधार होंगे। मतदाताओं के लिए भी यह जरूरी होगा कि वे समय रहते अपनी जानकारी मतदाता सूची में जांच लें और किसी तरह की गलती होने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत सुधार या आपत्ति दर्ज कराएं।

कुल मिलाकर, भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने चुनावी मैदान में संगठनात्मक एकजुटता बड़ी चुनौती है। राजनीतिक एक्सपर्ट के मुताबिक गुटबाजी का असर टिकट वितरण से लेकर बूथ मैनेजमेंट और चुनाव प्रचार तक पड़ सकता है। हार की स्थिति में असंतुष्ट नेताओं के पार्टी छोड़ने या पाला बदलने की संभावना भी बढ़ सकती है। वहीं SIR के जरिए मतदाता सूची में होने वाले बदलाव कुछ सीटों पर वोटों के समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन चुनाव का अंतिम परिणाम केवल SIR से नहीं बल्कि स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों, संगठन और मतदाताओं के रुख समेत कई कारकों पर निर्भर करेगा।

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