15 जनवरी को महाराष्ट्र के कुल 29 नगर निगमों के चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे, लेकिन इन 29 चुनावों में सबसे ज्यादा चर्चा सिर्फ एक नगर निगम के चुनाव की है—बीएमसी यानी बृहन्मुंबई नगर निगम।
मुंबई: 15 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के कुल 29 नगर निगमों के चुनाव होंगे, लेकिन इनमें सबसे अधिक चर्चा बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के चुनाव को लेकर है। बीएमसी चुनाव सिर्फ नगर निगम की सीटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि पैसा, पावर और सियासी रसूख का महासंग्राम है। यही कारण है कि महाराष्ट्र की हर बड़ी पार्टी इस चुनाव को अपनी नाक का सवाल मानती है।
बीएमसी: क्यों है इतना महत्व?
बीएमसी यानी बृह्नमुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन महाराष्ट्र और भारत की राजनीति में अकेली ऐसी संस्था है, जिसका बजट कई छोटे राज्यों से बड़ा है। फरवरी 2025 में बीएमसी ने 2025-26 का बजट पेश किया, जो 74,427 करोड़ रुपये का था। इसका मतलब यह है कि मुंबई का नगर निगम अकेले कई राज्यों का सालाना बजट नियंत्रित करता है।
सिर्फ इतना ही नहीं, बीएमसी हर साल लगभग 3,000-4,000 करोड़ रुपये की बचत करता है, जिससे कुल सरप्लस 84,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुँच जाता है। यही वजह है कि हर पार्टी इस चुनाव में जीत के लिए पूरी ताकत लगा रही है।
बीएमसी जीतने का मतलब: पैसा, पावर और राजनीति
बीएमसी का चुनाव सिर्फ वित्तीय ताकत हासिल करने का जरिया नहीं है। मेयर और नगर निगम के माध्यम से जीतने वाली पार्टी को मुंबई की विकास, निर्माण और नक्शा पास कराने की शक्ति मिलती है। कोई नई इमारत बनानी हो, सड़क या नाली बनवानी हो, बीएमसी की अनुमति जरूरी है। मुंबई रियल एस्टेट के लिहाज से देश का सबसे महंगा शहर है। इसलिए इस पर नियंत्रण की ताकत सीधे राजनीतिक और आर्थिक शक्ति में बदलती है।
सिर्फ प्रशासनिक ताकत ही नहीं, बीएमसी चुनाव की सियासी अहमियत भी अद्वितीय है। बीएमसी क्षेत्र में 36 विधानसभा और 6 लोकसभा सीटें आती हैं। इसका मतलब कि इस नगर निगम की राजनीतिक धरपकड़ सीधे राज्य और केंद्र की राजनीति को प्रभावित करती है।

बीएमसी की सीटें और मेयर का महत्व
बीएमसी में कुल 227 सीटें हैं। किसी पार्टी को मेयर बनाने के लिए कम से कम 114 सीटें जीतनी होती हैं। ये मेयर अकेले नहीं, बल्कि आईएएस रैंक के म्यूनिसिपल कमिश्नर के साथ मिलकर निर्णय लेते हैं। मुंबई को प्रशासनिक तौर पर 7 जोनों में बांटा गया है, जिनमें कुल 24 वार्ड और 227 सिविक इलेक्टोरल वार्ड शामिल हैं। कॉरपोरेटर चुनाव जीतकर मेयर का चुनाव करते हैं, जैसे विधायक मुख्यमंत्री चुनते हैं।
- बीएमसी में शिवसेना का दबदबा लंबे समय से रहा है।
- 1971 में हेमचंद्र गुप्ते पहले शिवसैनिक मेयर बने।
- 1996 से 2022 तक अधिकतर मेयर शिवसेना के ही रहे।
लेकिन अब शिवसेना दो हिस्सों में बंट चुकी है:
उद्धव ठाकरे की शिवसेना
एकनाथ शिंदे की शिवसेना, जो बीजेपी के साथ है इस टूट के बाद बीएमसी की लड़ाई और भी जटिल हो गई है। बीजेपी का भी मकसद स्पष्ट है: कमजोर पड़ चुकी उद्धव शिवसेना को हराकर मेयर की कुर्सी पर कब्जा जमाना। राज ठाकरे की मनसे भी इस चुनाव में अहम खिलाड़ी है। बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बावजूद, राज ठाकरे का बीएमसी में समर्थन उद्धव को टक्कर दे सकता है। मनसे का वोट बैंक शिवसेना के दोनों गुटों के बीच विभाजित हो सकता है, जिससे चुनाव का रोमांच और बढ़ जाएगा।
मुकाबला किसके हाथ में जाएगा?
- उद्धव शिवसेना: कमजोर लेकिन अभी भी बीएमसी क्षेत्र में मजबूत
- शिंदे शिवसेना + बीजेपी: गठबंधन से मेयर की कुर्सी की दावेदारी
- राज ठाकरे/मनसे: वोट बैंक विभाजन और रणनीतिक भूमिका
बीएमसी चुनाव में जीतना मतलब सिर्फ नगर निगम पर कब्जा नहीं, बल्कि मुंबई के विकास, आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण की कुंजी हासिल करना है। यही वजह है कि हर पार्टी ने इस चुनाव को अपनी राजनीतिक नाक का सवाल बना लिया है।












