पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी की एतिहासिक जीत के नायक रहे सुवेंदु अधिकारी अब मुख्यमंत्री पद संभालने जा रहे हैं। शुक्रवार को अमित शाह ने CM के रूप में सुवेंदु अधिकारी के नाम का एलान कर दिया है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक समय ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे सुवेंदु अधिकारी आज राज्य के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। छात्र राजनीति से शुरुआत कर नंदीग्राम आंदोलन की अगुवाई तक और फिर तृणमूल कांग्रेस (TMC) से भारतीय जनता पार्टी (BJP) तक का उनका सफर बंगाल की राजनीति में बड़े बदलावों की कहानी बयान करता है।
हालांकि हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों में उनके मुख्यमंत्री बनने को लेकर चर्चाएं तेज हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका प्रभाव मुख्य रूप से संगठन और जमीनी रणनीति में ज्यादा दिखाई देता है।
राजनीतिक परिवार से मिली शुरुआती सीख
सुवेंदु अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले के कांथी में हुआ था। वे एक मजबूत राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी लंबे समय तक क्षेत्र की राजनीति में सक्रिय और प्रभावशाली नेता रहे हैं। राजनीति का माहौल उन्हें बचपन से ही मिला, जिससे उनकी सोच और समझ शुरुआती दौर से ही राजनीतिक दिशा में विकसित होती गई।
सुवेंदु अधिकारी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 1989 में छात्र राजनीति से की थी। उस समय उन्होंने कांग्रेस के छात्र संगठन से जुड़कर अपनी राजनीतिक पहचान बनानी शुरू की। 1990 के दशक में जब पश्चिम बंगाल में वामपंथी छात्र संगठनों का दबदबा था, तब विपक्षी छात्र नेता के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।
संघर्ष और विरोध की राजनीति ने उन्हें आगे चलकर एक मजबूत नेता के रूप में तैयार किया। 1995 में वे कांथी नगर पालिका के पार्षद बने, जो उनका पहला बड़ा चुनावी अनुभव था।

टीएमसी में शामिल होकर बदली राजनीतिक दिशा
1998 में जब ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) की स्थापना की, तब सुवेंदु अधिकारी अपने परिवार के साथ इस नई पार्टी से जुड़ गए। इसके बाद वे तेजी से पार्टी संगठन में मजबूत होते चले गए। टीएमसी के भीतर उन्हें एक जमीनी नेता और संगठनकर्ता के रूप में देखा जाने लगा, जिन्होंने कई चुनावी अभियानों में अहम भूमिका निभाई।
सुवेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट 2007 का नंदीग्राम आंदोलन रहा। यह आंदोलन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के संघर्ष से जुड़ा था। उन्होंने “भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति (BUPC)” का गठन किया और जमीनी स्तर पर आंदोलन का नेतृत्व किया। इस दौरान उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित किया और आंदोलन को मजबूत आधार दिया।
14 मार्च 2007 की पुलिस कार्रवाई के बाद यह आंदोलन और तेज हो गया, जिसने पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी। इस आंदोलन को 2011 में वामपंथी सरकार के अंत और टीएमसी की सत्ता में वापसी का महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।
टीएमसी से बीजेपी तक का सफर
लंबे समय तक ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी रहे सुवेंदु अधिकारी ने 2020 में टीएमसी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) जॉइन कर ली। यह फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति के लिए बड़ा मोड़ साबित हुआ। 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम सीट से खुद ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा और उन्हें कड़ी टक्कर दी।
इस चुनाव में उनकी जीत ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। इसके बाद वे विधानसभा में विपक्ष के नेता बने और बीजेपी के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए।









