Chaiti Chhath Puja: तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य आज, जानें समय और नियम

चैती छठ 2026 के तीसरे दिन संध्या अर्घ्य का महत्व, शुभ समय, पूजा विधि और नियम जानें। रोहिणी नक्षत्र व प्रीति योग में व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे।

चैती छठ 2026 का तीसरा दिन आज संध्या अर्घ्य के साथ मनाया जा रहा है, जहां व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगे। रोहिणी नक्षत्र और प्रीति योग का शुभ संयोग इस दिन को खास बना रहा है। श्रद्धालु विधि-विधान से पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं।

Chaiti Chhath 2026: आज चैत्र शुक्ल षष्ठी के मौके पर देशभर के नदी-घाटों और जलाशयों पर व्रती संध्या अर्घ्य देंगे। इस दौरान महिलाएं और पुरुष निर्जला उपवास रखकर डूबते सूर्य की पूजा करते हैं। छठी मैया की आराधना परिवार की खुशहाली, संतान की लंबी आयु और समृद्धि के लिए की जाती है। खास बात यह है कि इस बार पूजा के समय रोहिणी नक्षत्र और प्रीति योग का संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।

संध्या अर्घ्य का शुभ समय और महत्व

आज चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देने का शुभ समय शाम के समय है। ज्योतिष के अनुसार, आज पूजा के समय रोहिणी नक्षत्र और प्रीति योग का संयोग रहेगा, जिसे अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। इस दिन व्रती पानी में खड़े होकर सूर्य की ओर मुख करके अर्घ्य देंगे।

संध्या अर्घ्य के समय व्रती पारंपरिक गीत गाकर छठी मैया से अपने परिवार की खुशहाली और संतान की लंबी आयु की प्रार्थना करते हैं। घाटों और नदियों के किनारे श्रद्धालुओं का जनसैलाब इस पर्व की भक्ति और आस्था को दिखाता है।

पूजा की विधि और आवश्यक सामग्री

संध्या अर्घ्य के लिए व्रती विशेष सामग्री का उपयोग करते हैं। प्रमुख प्रसाद में गेहूं के आटे और गुड़ से बना ठेकुआ, चावल के लड्डू और पूरी शामिल हैं। इसके अलावा फल और सब्जियों में नींबू, केला, सिंघाड़ा, गन्ना, शकरकंद और मौसमी फल शामिल होते हैं।

अन्य पूजन सामग्री में नारियल, अगरबत्ती, मिट्टी का दीपक, सिंदूर और अक्षत शामिल होते हैं। सभी सामग्री को सूप या डोंगी में सजाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती इस दौरान शांतचित्त होकर छठी मैया का ध्यान करते हैं और पारिवारिक सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।

छठ पूजा के नियम और परंपराएं

छठ पूजा में स्वच्छता और सात्विक जीवनशैली का विशेष महत्व है। प्रसाद बनाने की जगह, बर्तन और सभी सामग्री को पूरी तरह से शुद्ध रखना अनिवार्य है। व्रती उपवास के दौरान लहसुन और प्याज का सेवन नहीं करते और जमीन पर ही सोते हैं।

पूजा के समय व्रती को वाणी पर संयम रखना होता है। कटु वचन न बोलना और शांत रहकर छठी मैया की आराधना करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह नियम श्रद्धा और भक्ति के साथ चार दिवसीय महापर्व को सफलतापूर्वक संपन्न करने में मदद करता है।

कल का पर्व और व्रत समापन

चैत्र शुक्ल सप्तमी तिथि पर व्रती सुबह सूर्योदय के समय उगते सूर्य को अर्घ्य देंगे। इसके बाद कच्चे दूध और प्रसाद के साथ उपवास खुल जाएगा और इस चार दिवसीय अनुष्ठान का समापन होगा। व्रती पारंपरिक विधि से पारण कर पूजा के समापन के साथ अपने परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।

यह महापर्व न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत करता है, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक मेल-जोल को भी बढ़ावा देता है। घाटों पर उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ और सामूहिक प्रार्थना इस लोक पर्व की महिमा को दर्शाती है।

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