CJI सूर्यकांत की टिप्पणी को लेकर बढ़ते विवाद पर देश के 44 पूर्व जज समर्थन में आ गए। उनका कहना है कि आलोचना सीमाओं से आगे बढ़ चुकी है और यह न्यायपालिका की साख कमजोर करने की सुनियोजित कोशिश लगती है।
New Delhi: रोहिंग्या प्रवासी मुद्दे की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा पूछे गए एक कानूनी सवाल पर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक समूहों द्वारा की गई आलोचनाओं के बीच देश के सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के 44 पूर्व न्यायाधीश खुलकर CJI के समर्थन में सामने आए हैं। उन्होंने कहा है कि CJI पर हो रहा हमला “सोची-समझी रणनीति” का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य न्यायपालिका की साख को कमजोर करना है।
पूर्व जज बोले— विवाद ने आलोचना की सीमा पार की
44 पूर्व न्यायाधीशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा कि अदालत की कार्यवाही और फैसलों की मर्यादित व तथ्य-आधारित आलोचना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन CJI सूर्यकांत के मामले में जिस तरह आलोचना को बढ़ाया गया, उसने सभी सीमाएं लांघ दीं। उनका कहना है कि एक साधारण कानूनी प्रश्न को पूर्वाग्रह और पक्षपात के रूप में प्रस्तुत करना न्यायपालिका की गरिमा पर प्रहार है। यह केवल असहमति नहीं, बल्कि न्यायपालिका के खिलाफ अविश्वास पैदा करने की योजनाबद्ध कोशिश है।
न्यायिक टिप्पणी को गलत अर्थ देकर विवाद खड़ा किया गया
पूर्व जजों का कहना है कि CJI सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान सिर्फ एक बुनियादी सवाल उठाया था- 'जिस दर्जे (legal status) का दावा किया जा रहा है, वह दर्जा किसने दिया है।'
उनका कहना है कि संवेदनशील मामलों की सुनवाई में यह पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होता है। किसी भी अधिकार, सुरक्षा या हक पर फैसले से पहले यह स्पष्ट करना जरूरी होता है कि संबंधित व्यक्ति या समूह का कानूनी दर्जा क्या है। बयान में कहा गया कि इस सामान्य प्रश्न को पूर्वाग्रहपूर्ण टिप्पणी बताकर अदालत पर हमला करना न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर विकृति है।
CJI के मानवाधिकार संबंधी संदेश पर अनदेखी की गई
पूर्व न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि आलोचकों ने CJI की पूरी टिप्पणी को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया। CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा था कि—
भारत की धरती पर किसी भी व्यक्ति, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी, को न यातना दी जा सकती है, न गायब किया जा सकता है और न ही अमानवीय व्यवहार किया जा सकता है।
पूर्व जजों के अनुसार, यह स्पष्ट मानवाधिकार संबंधी संदेश था, जिसे आलोचकों ने पूरी तरह नजरअंदाज कर सिर्फ एक लाइन को गलत तरीके से उछालकर विवाद खड़ा किया।
न्यायपालिका को निशाना बनाने का अभियान बताया गया
पूर्व जजों ने चेतावनी दी कि वर्तमान विवाद किसी स्वाभाविक आलोचना का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक संगठित अभियान है जिसका उद्देश्य संवैधानिक संस्थानों में जनता के विश्वास को कम करना है। उनका कहना है कि न्यायपालिका को राजनीतिक बहस में खींचना और अदालत की टिप्पणियों को गलत तरीके से प्रस्तुत करना एक ऐसी रणनीति है जो लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करती है। पूर्व जजों के अनुसार न्यायपालिका नागरिकों के मौलिक अधिकारों की अंतिम संरक्षक है और उस पर हमला सीधे नागरिक अधिकारों को कमजोर करने जैसा है।
आलोचना और दुर्भावनापूर्ण अभियान के अंतर पर जोर
पूर्व न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि तथ्य आधारित, मर्यादित और रचनात्मक आलोचना आवश्यक है, लेकिन जब आलोचना का स्वरूप इस तरह बदल जाए कि अदालत की मंशा पर सवाल उठने लगे, न्यायिक प्रक्रिया को तोड़ा-मरोड़ा जाए और स्वतंत्र न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचे, तो यह आलोचना नहीं बल्कि एक नकारात्मक और हानिकारक अभियान बन जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे अभियानों को रोकना लोकतंत्र के हित में बेहद जरूरी है क्योंकि न्यायपालिका का विश्वास ही संवैधानिक व्यवस्था की नींव है।
रोहिंग्या मुद्दे पर अदालत का संतुलित रुख दोहराया
पूर्व जजों ने कहा कि रोहिंग्या प्रवासियों से जुड़े मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया था कि वह मानवाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों को संतुलन में रखते हुए निर्णय लेगा। अदालत ने कहा था कि भारत की सुरक्षा चिंताएं सर्वोपरि हैं, लेकिन हर व्यक्ति की गरिमा और अधिकारों का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। पूर्व जजों का कहना है कि अदालत के इस संतुलित दृष्टिकोण को नजरअंदाज कर केवल एक सामान्य कानूनी प्रश्न को विवाद का केंद्र बनाना भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण है।









