सुप्रीम कोर्ट के CJI सूर्यकांत ने हाल ही में रोहिंग्या घुसपैठियों पर अदालत की टिप्पणियों को लेकर उठ रही आलोचनाओं पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत की कार्यवाही में बाहरी हस्तक्षेप या न्यायाधीशों द्वारा पूछे गए सवालों पर आधारित नैरेटिव तैयार करना सहन नहीं किया जाएगा।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोहिंग्या घुसपैठियों के अधिकारों को लेकर उठाए गए सवालों की सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और कई वकीलों ने आलोचना की थी, जिस पर अब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग अदालत की कार्यवाही के दौरान न्यायाधीशों को वकीलों से प्रश्न पूछने से रोकने का प्रयास कर रहे हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया के लिए अनुचित है।
प्रज्वल रेवन्ना की याचिका पर सुनवाई के दौरान सीजेआई ने remarks देते हुए कहा कि आजकल लोग इतने संवेदनशील हो गए हैं कि अदालत द्वारा की गई किसी भी टिप्पणी या वकील से पूछे गए किसी भी प्रश्न को लेकर भी आलोचना करने लगते हैं।
आलोचनाओं से नहीं डरते, लेकिन हल्के में नहीं लेंगे
CJI सूर्यकांत ने कहा कि वे ऐसी आलोचनाओं से डरते नहीं, लेकिन इसे हल्के में भी नहीं लेंगे। उनका स्पष्ट कहना था कि न्यायाधीशों द्वारा तथ्यों और बेहतर दलीलों को सामने लाने के लिए पूछे गए सवालों पर ग़लत नैरेटिव बनाना गंभीर अपराध है। उन्होंने चेतावनी दी कि अदालत के कामकाज में हस्तक्षेप करने वाले लोग कड़ी कार्रवाई का सामना करेंगे।
उन्होंने कहा, लोग इतने अति-संवेदनशील हो गए हैं कि अदालतों द्वारा किए गए किसी प्रश्न या टिप्पणी को भी राजनीतिक या व्यक्तिगत रूप से तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है। यह प्रक्रिया न्यायिक प्रणाली की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर प्रतिकूल असर डालती है।
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रोहिंग्या घुसपैठियों पर अदालत की टिप्पणी
पिछले सप्ताह, CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने रोहिंग्या घुसपैठियों के मामले पर सुनवाई करते हुए कहा था, ये रोहिंग्या कौन हैं जिन्हें सरकार ने शरणार्थी घोषित किया है? अवैध रूप से देश में आने वालों का कोई कानूनी दर्जा नहीं होता और भारत उन्हें रखने के लिए बाध्य नहीं है। बेंच ने यह भी कहा कि, “अगर किसी व्यक्ति का कोई कानूनी दर्जा नहीं है, तो वह देश में घुसपैठिया है। भारत में अवैध प्रवासी भोजन, आश्रय और बच्चों की मदद का अधिकार नहीं मांग सकते।
हमारे देश में बहुत गरीब लोग हैं, उनका अधिकार पहले है। अवैध प्रवासियों को हिरासत में यातना नहीं दी जा सकती, लेकिन उनका देश के संसाधनों पर कोई कानूनी दावा नहीं है। इन टिप्पणियों के बाद, कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और वकीलों ने एक खुला पत्र लिखकर अदालत की आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि न्यायिक टिप्पणियों ने रोहिंग्या मुसलमानों के निर्वासन से जुड़े मामलों में भावनात्मक प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं।
CJI सूर्यकांत की नाराजगी उस याचिका के संदर्भ में भी आई जिसमें प्रज्वल रेवन्ना ने अपने खिलाफ बलात्कार के मामले को किसी अन्य सत्र अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी। रेवन्ना ने विशेष अदालत पर पक्षपात का आरोप लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर न्यायिक अधिकारी द्वारा कुछ टिप्पणियां करने मात्र से मामलों को स्थानांतरित किया जाने लगे, तो न्यायिक अधिकारी का मनोबल प्रभावित होगा। बेंच ने स्पष्ट किया कि अदालत केवल मामले के तथ्यों पर ध्यान केंद्रित करेगी और न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगी।








