कपड़े मेरी मर्जी के पहनो घंटों केबिन में बैठो CUSB की छात्रा का सुपरवाइजर पर यौन उत्पीड़न का आरोप; न्याय की मांग को लेकर धरने पर बैठीं

गया के CUSB में पीएचडी शोधार्थी ने सुपरवाइजर पर यौन उत्पीड़न और परेशान करने का आरोप लगाया। छात्रा जांच रिपोर्ट और पीएचडी पूरी कराने की मांग पर धरने पर हैं।
कपड़े मेरी मर्जी के पहनो घंटों केबिन में बैठो CUSB की छात्रा का सुपरवाइजर पर यौन उत्पीड़न का आरोप; न्याय की मांग को लेकर धरने पर बैठीं
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बिहार के गया स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार (CUSB) में एक पीएचडी शोधार्थी ने अपने सुपरवाइजर पर यौन उत्पीड़न और लगातार परेशान करने का आरोप लगाते हुए विश्वविद्यालय परिसर में धरना शुरू कर दिया है। छात्रा की मांग है कि उन्हें अपना शोध पूरा करने का अवसर दिया जाए और वर्ष 2023 में दर्ज कराई गई शिकायत की जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए। इस धरने में उनके साथ दो अन्य छात्र भी शामिल हैं। छात्रा का आरोप है कि शिकायत करने के बाद उनकी शैक्षणिक स्थिति प्रभावित हुई और उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में भी शिकायत करने की बात कही है। फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। 

छात्रा के आरोपों के अनुसार, उनके सुपरवाइजर का व्यवहार उनके प्रति अनुचित था। उन्होंने दावा किया कि उन्हें कपड़े पहनने को लेकर निर्देश दिए जाते थे और घंटों तक केबिन में बैठने के लिए कहा जाता था। छात्रा ने इसी तरह की कथित टिप्पणियों और व्यवहार को उत्पीड़न का हिस्सा बताते हुए अपनी शिकायत में सवाल उठाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित सुपरवाइजर का पक्ष भी उपलब्ध रिपोर्ट में सामने नहीं आया है। इसलिए मामले में लगाए गए आरोपों और जांच के बाद स्थापित होने वाले तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है।

छात्रा के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 2023 में अपने सुपरवाइजर के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। उनका दावा है कि शिकायत के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनका दाखिला रद्द कर दिया। इसके बाद उन्होंने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। छात्रा के अनुसार, वर्ष 2026 में उन्हें दोबारा बहाल किया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि शिकायत के बाद उनके सुपरवाइजर को एक महीने के भीतर निलंबित कर दिया गया था। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े न्यायिक आदेशों, निलंबन संबंधी दस्तावेजों और विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्ट में नहीं हो सकी है। 

धरने पर बैठी शोधार्थी की मांग केवल शिकायत की जांच रिपोर्ट प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। वह चाहती हैं कि उनकी पीएचडी पूरी कराने की प्रक्रिया भी जल्द आगे बढ़ाई जाए। उनका कहना है कि उन्होंने शोध पूरा करने के लिए निर्धारित शैक्षणिक आवश्यकताएं पूरी कर ली हैं। छात्रा के अनुसार, शोधपत्रों और सम्मेलनों से संबंधित जरूरी शर्तें पूरी करने के बाद भी उनकी पीएचडी पूरी कराने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ रही है। ऐसे में वह विश्वविद्यालय प्रशासन से स्पष्ट जवाब चाहती हैं कि उनकी शैक्षणिक प्रक्रिया किस स्तर पर लंबित है और उसे पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।

छात्रा का कहना है कि वर्ष 2023 में की गई शिकायत की जांच के लिए समिति गठित की गई थी, लेकिन उन्हें अब तक उसकी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई है। वह जांच के निष्कर्षों और शिकायत पर की गई कार्रवाई की जानकारी चाहती हैं। किसी संस्थान में यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज होने के बाद शिकायतकर्ता के लिए यह जानना महत्वपूर्ण होता है कि मामले की जांच किस स्तर पर है और निर्धारित प्रक्रिया के तहत क्या कार्रवाई की गई है। छात्रा की वर्तमान मांगों में इसी जानकारी को उपलब्ध कराना प्रमुख है। हालांकि, जांच रिपोर्ट की स्थिति और उसे साझा करने से संबंधित नियमों पर विश्वविद्यालय का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से संपर्क किए जाने का मुद्दा भी सामने आया है। छात्रा के अनुसार, उन्होंने दोनों आयोगों में शिकायत दर्ज कराई है, ताकि उनकी शिकायत और शैक्षणिक समस्याओं पर ध्यान दिया जाए। राष्ट्रीय महिला आयोग की आधिकारिक व्यवस्था में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न समेत महिलाओं के अधिकारों से संबंधित शिकायतें स्वीकार की जाती हैं। आयोग शिकायत की प्रकृति के अनुसार संबंधित संस्थान या अधिकारियों से जानकारी मांग सकता है और शिकायत के निपटारे की प्रक्रिया की निगरानी कर सकता है। हालांकि, इस विशेष मामले में आयोगों ने शिकायत पर क्या कार्रवाई की है, इसकी पुष्टि उपलब्ध रिपोर्ट में नहीं हुई है। 

विश्वविद्यालयों में यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों के निपटारे के लिए आंतरिक व्यवस्था का होना महत्वपूर्ण है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार की वेबसाइट पर भी यौन उत्पीड़न की रोकथाम और शिकायतों के निवारण के लिए SPARSH व्यवस्था तथा विश्वविद्यालय शिकायत समिति का उल्लेख है। विश्वविद्यालय की प्रकाशित जानकारी के अनुसार, इस व्यवस्था का उद्देश्य परिसर में लैंगिक भेदभाव और यौन उत्पीड़न को रोकना तथा शिकायतों की जांच करना है। ऐसे मामलों में शिकायत की निष्पक्ष जांच, संबंधित पक्षों को उचित अवसर, गोपनीयता और निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होता है। 

इस घटना ने उच्च शिक्षण संस्थानों में शोधार्थियों और उनके सुपरवाइजर के बीच संबंधों को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। पीएचडी के दौरान सुपरवाइजर की भूमिका शोध की दिशा तय करने, अकादमिक मार्गदर्शन देने और शोधार्थी के काम का मूल्यांकन करने में महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में यदि किसी शोधार्थी को लगता है कि उसके साथ अनुचित व्यवहार हो रहा है, तो शिकायत की निष्पक्ष सुनवाई और अकादमिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए रखना जरूरी है। दूसरी ओर, किसी भी व्यक्ति पर लगाए गए आरोपों की जांच तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जानी चाहिए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।

छात्रा के लिए पीएचडी पूरी करना उनके कई वर्षों के शैक्षणिक प्रयास से जुड़ा सवाल है। शोध कार्य में विषय का अध्ययन, आंकड़े जुटाना, शोधपत्र तैयार करना और निर्धारित अकादमिक शर्तें पूरी करना शामिल होता है। यदि शोध की प्रक्रिया लंबे समय तक अटक जाए, तो इससे शोधार्थी के करियर और भविष्य की योजनाओं पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से छात्रा चाहती हैं कि विश्वविद्यालय उनके शोध की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करे और यदि निर्धारित शर्तें पूरी हो चुकी हैं, तो नियमों के अनुसार आगे की प्रक्रिया शुरू की जाए।

धरने के जरिए छात्रा और उनके साथ आए विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन का ध्यान अपनी मांगों की ओर आकर्षित करने की कोशिश की है। उनकी मांग है कि यौन उत्पीड़न की शिकायत से जुड़ी जांच रिपोर्ट के बारे में स्पष्ट जानकारी दी जाए और पीएचडी पूरी करने की प्रक्रिया को लेकर निर्णय लिया जाए। ऐसे मामलों में प्रशासनिक संवाद महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि शिकायतकर्ता को प्रक्रिया की जानकारी मिलना और संस्थान की ओर से समयबद्ध जवाब दिया जाना विवाद को आगे बढ़ने से रोकने में मदद कर सकता है।

इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष सामने आना भी जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, मीडिया ने विश्वविद्यालय के जनसंपर्क पदाधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। इस कारण छात्रा के आरोपों, शिकायत की मौजूदा स्थिति और पीएचडी से संबंधित प्रक्रिया पर संस्थान की विस्तृत प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है। सुपरवाइजर का पक्ष भी सामने आने पर मामले के विभिन्न पहलुओं को समझने में मदद मिलेगी। फिलहाल छात्रा के आरोपों को जांच के निष्कर्षों से पहले प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।

गया के CUSB परिसर में चल रहा यह धरना अब छात्रा की शैक्षणिक प्रगति, शिकायत की जांच और विश्वविद्यालय की जवाबदेही से जुड़े सवालों पर केंद्रित है। छात्रा चाहती हैं कि उनकी वर्ष 2023 की शिकायत पर हुई जांच की रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाए और पीएचडी पूरी करने की प्रक्रिया आगे बढ़े। उन्होंने राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत करने की बात भी कही है। अब आगे की स्थिति विश्वविद्यालय के आधिकारिक जवाब, शिकायत की जांच से जुड़े दस्तावेजों और संबंधित संस्थाओं की कार्रवाई पर निर्भर करेगी।

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