फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव से छह महीने पहले छात्र शिक्षा व्यवस्था, असमानता और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार ने वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलेंशों की पार्टी पर आंदोलन के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाया है।
पेरिस: फ्रांस में आगामी राष्ट्रपति चुनाव से करीब छह महीने पहले छात्र प्रदर्शन देश की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। स्कूलों में शिक्षा की खराब स्थिति, सामाजिक असमानता, सरकारी सेवाओं में कमी और पुलिस की कार्रवाई को लेकर छात्र सड़कों पर उतर रहे हैं। इस बीच, वामपंथी नेता जीन-ल्यूक मेलेंशों की पार्टी पर इन प्रदर्शनों का राजनीतिक लाभ उठाने के आरोप लगे हैं। सरकार का कहना है कि आंदोलन को चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि प्रदर्शनकारी बेहतर शिक्षा और सामाजिक न्याय की मांग कर रहे हैं।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब फ्रांस की सार्वजनिक वित्तीय स्थिति, बढ़ते सरकारी खर्च और राजनीतिक अस्थिरता को लेकर भी बहस तेज है। ऐसे में छात्र आंदोलन केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की राजनीतिक दिशा और सरकार के प्रति जनता के भरोसे से भी जुड़ता दिखाई दे रहा है।
स्कूलों की स्थिति से नाराज हैं छात्र
पेरिस के तीसरे जिले में प्रदर्शन कर रहे 17 वर्षीय छात्रों मैक्सिम, मैडेलीन और एलोडी ने शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं पर नाराजगी जताई। उनके मुताबिक, स्कूलों की दीवारों में छेद हैं, कक्षाओं में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ रही है और शिक्षकों की कमी बनी हुई है।
छात्रों का कहना है कि फ्रांस में समानता की बात तो की जाती है, लेकिन वास्तविकता में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को नुकसान उठाना पड़ता है, जबकि अमीर तबकों को अधिक अवसर मिलते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राजधानी के आसपास के वंचित इलाकों में शिक्षा की स्थिति और ज्यादा खराब है।
इन छात्रों की उम्र इतनी नहीं है कि वे अगले राष्ट्रपति चुनाव में मतदान कर सकें। इसके बावजूद वे मानते हैं कि अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए बड़े स्तर पर प्रदर्शन करना जरूरी हो गया है।
उनके विचारों से यह स्पष्ट होता है कि युवा वर्ग के एक हिस्से में मौजूदा व्यवस्था को लेकर असंतोष है। हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि सभी छात्र एक ही राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करते हैं या उनके विरोध के पीछे केवल चुनावी राजनीति है।
क्या छात्र आंदोलन का हो रहा राजनीतिक इस्तेमाल?
फ्रांस में छात्र प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकॉर्नू ने आरोप लगाया है कि जीन-ल्यूक मेलेंशों की पार्टी फ्रांस अनबोव्ड (LFI) छात्र आंदोलन का इस्तेमाल अपने चुनावी फायदे के लिए कर रही है।
लेकॉर्नू के मुताबिक, पार्टी के सदस्य प्रदर्शनों को बढ़ावा दे रहे हैं और बाद में हिंसा की घटनाओं की निंदा करने की औपचारिकता निभाते हैं। उन्होंने इस रवैये को देश के लिए नुकसानदायक बताया है।
दूसरी ओर, प्रदर्शनों में शामिल कई युवा मेलेंशों के प्रति समर्थन जताते दिखाई दे रहे हैं। प्रदर्शनकारियों के बीच उनके पक्ष में नारे लगाए जा रहे हैं। कुछ छात्रों ने उनकी संपत्ति पर कर लगाने की नीति, मतदान की न्यूनतम उम्र 16 वर्ष करने की मांग और स्कूलों की स्थिति का जायजा लेने के लिए शैक्षणिक संस्थानों का दौरा करने जैसे कदमों का समर्थन किया है।
हालांकि, किसी नेता के प्रति छात्रों का समर्थन अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि आंदोलन को उसी नेता या पार्टी ने संगठित अथवा नियंत्रित किया है। राजनीतिक आरोपों और छात्रों की वास्तविक शिकायतों के बीच अंतर करना जरूरी है।
पुलिस कार्रवाई के बाद बढ़ा विवाद
छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई भी विवाद का विषय बनी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसी महीने हुए विरोध प्रदर्शनों में सैकड़ों लोग घायल हुए। फ्रांस के लेंस शहर में 15 वर्षीय एक लड़के का हाथ भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया।
पुलिस की कथित सख्ती को लेकर सवाल उठाए गए हैं, जबकि फ्रांस के गृह मंत्रालय ने पुलिस की बर्बरता के आरोपों से इनकार किया है। विवाद बढ़ने के बाद गृह मंत्री ने हाई स्कूलों के आसपास होने वाले प्रदर्शनों में पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले स्टन ग्रेनेड के उपयोग को निलंबित कर दिया।
प्रदर्शनों के दौरान कई अभिभावक भी छात्रों के साथ दिखाई दिए। 37 वर्षीय ग्वेन ने बताया कि कुछ माताएं अपने बच्चों और पुलिस के बीच समन्वय बनाने के लिए बारी-बारी से स्कूलों के बाहर मौजूद रहती हैं।
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ग्वेन का मानना है कि नागरिक अधिकारों और न्याय के लिए आवाज उठाना भी बच्चों की शिक्षा का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि विरोध प्रदर्शनों के कारण स्कूल से कुछ सप्ताह दूर रहना उनके बेटे के लिए नागरिक जिम्मेदारी समझने का अवसर हो सकता है।
इस तरह, आंदोलन को लेकर समाज में अलग-अलग विचार सामने आ रहे हैं। जहां कुछ लोग प्रदर्शन को युवाओं की लोकतांत्रिक भागीदारी मानते हैं, वहीं दूसरे पक्ष के लिए पढ़ाई में व्यवधान और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
1968 के छात्र आंदोलन की यादें फिर ताजा
फ्रांस में छात्र आंदोलनों का ऐतिहासिक महत्व रहा है। मई 1968 में पेरिस में शुरू हुए छात्र विरोध प्रदर्शनों ने व्यापक राजनीतिक और सामाजिक हलचल पैदा की थी। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की मांग से शुरू हुआ आंदोलन बाद में श्रमिकों की भागीदारी के साथ बड़े पैमाने की आम हड़ताल में बदल गया था।
मौजूदा प्रदर्शन में शामिल 17 वर्षीय लोला भी इसी ऐतिहासिक विरासत से प्रेरणा लेने की बात करती हैं। वह अपनी मां सैंड्रिन के साथ प्रदर्शन में शामिल हुईं। सैंड्रिन ने 1968 के छात्र आंदोलन में हिस्सा लिया था।
लोला के मुताबिक, उनकी मां ने अपने दौर में सड़कों पर उतरकर विरोध किया था और अब उनकी पीढ़ी की बारी है। उनका कहना है कि बदलाव के लिए राष्ट्रपति चुनाव का इंतजार नहीं किया जा सकता।
हालांकि, 1968 और मौजूदा आंदोलन की परिस्थितियां अलग हैं। दोनों के बीच समानता मुख्य रूप से युवाओं की भागीदारी, व्यवस्था में बदलाव की मांग और विरोध प्रदर्शन की ऐतिहासिक परंपरा में दिखाई देती है।
फ्रांस की अर्थव्यवस्था और सरकारी खर्च भी चिंता का विषय
छात्र आंदोलन के पीछे शिक्षा से जुड़ी समस्याओं के साथ-साथ फ्रांस की व्यापक आर्थिक चुनौतियां भी चर्चा में हैं। देश की सार्वजनिक वित्तीय स्थिति पर बहस के बीच अर्थशास्त्री ऐन-लॉर डेलाट का कहना है कि फ्रांस की स्थिति को ग्रीस के 2012 के ऋण संकट या अर्जेंटीना के 2001 के संकट के समान नहीं माना जाना चाहिए।
उनके मुताबिक, फ्रांस के पास जरूरत पड़ने पर कर बढ़ाकर राजस्व जुटाने की क्षमता है। उन्होंने ब्रिटेन में 2022 के दौरान लिज ट्रस सरकार के मिनी-बजट से पैदा हुई वित्तीय उथल-पुथल का उदाहरण भी दिया। उस समय ब्रिटिश मुद्रा पर दबाव बढ़ा था और सरकारी बॉन्ड की यील्ड में तेज उछाल आया था।
डेलाट का मानना है कि फ्रांस के लिए वित्तीय संकट से निपटना आसान नहीं होगा, लेकिन देश के पास आर्थिक स्थिति सुधारने के साधन मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यूरोपीय सेंट्रल बैंक व्यापक यूरोपीय अर्थव्यवस्था को खतरा होने की स्थिति में हस्तक्षेप कर सकता है।
फ्रांस में सार्वजनिक खर्च सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 57 प्रतिशत के बराबर बताया गया है। देश में पेंशन और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च काफी अधिक है, जबकि नागरिक भी करों तथा सामाजिक योगदान के रूप में बड़ी राशि देते हैं। ऐसे में जनता बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं की अपेक्षा करती है।
क्या नया राष्ट्रपति संकट दूर कर पाएगा?
अर्थशास्त्री डेलाट का मानना है कि केवल नया राष्ट्रपति चुन लेने से फ्रांस की राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं होगा। उनके अनुसार, देश की संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव और संसद की भूमिका मजबूत करने की जरूरत है।
उनका तर्क है कि फ्रांस की मौजूदा व्यवस्था राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियां देती है, जबकि संसद में राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाना मुश्किल हो सकता है। आगामी संसदीय चुनाव में भी सदन के विभाजित रहने की आशंका जताई गई है।
इस बीच, दक्षिणपंथी राष्ट्रवादी नेता मरीन ले पेन यूरोपीय संघ के बजट में फ्रांस के योगदान में कटौती का समर्थन करती रही हैं। दूसरी ओर, वामपंथी खेमे में सामाजिक खर्च और संपत्ति पर कर लगाने जैसे मुद्दे प्रमुख हैं।









