हिमाचल में 10 साल में 64 हजार हेक्टेयर घटा कृषि क्षेत्र, सेब उत्पादन में भी बड़ी गिरावट की आशंका

: हिमाचल में एक दशक में कृषि भूमि 64 हजार हेक्टेयर घटी। कम बारिश, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती लागत और पलायन से खेती प्रभावित, सेब उत्पादन घटने का अनुमान है।

हिमाचल प्रदेश में एक दशक में कृषि क्षेत्र करीब 64 हजार हेक्टेयर घट गया है। वर्षा की अनिश्चितता, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती लागत, पलायन और गैर-कृषि गतिविधियों के कारण खेती प्रभावित हुई है। इस साल सेब उत्पादन भी घटने का अनुमान है।

शिमला: हिमाचल प्रदेश में पिछले 10 वर्षों के दौरान कृषि भूमि का क्षेत्रफल करीब 64 हजार हेक्टेयर कम हुआ है। इसके साथ खाद्यान्न उत्पादन में भी गिरावट दर्ज की गई है। प्रदेश में करीब 70 प्रतिशत खेती वर्षा पर निर्भर है और बदलते मौसम का सीधा असर फसलों पर पड़ रहा है। इस साल कम मानसूनी बारिश के कारण सेब उत्पादन में भी बड़ी कमी का अनुमान जताया गया है।

10 साल में 64 हजार हेक्टेयर कम हुई कृषि भूमि

हिमाचल प्रदेश में खेती का रकबा लगातार कम हो रहा है। पिछले एक दशक में कृषि क्षेत्र करीब 64 हजार हेक्टेयर घट गया। इसका असर राज्य के खाद्यान्न उत्पादन पर भी दिखाई दे रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कुल खाद्यान्न उत्पादन 15.85 लाख टन से घटकर 15.49 लाख टन रह गया है।

प्रदेश में कृषि का बड़ा हिस्सा बारिश पर निर्भर है। करीब 70 प्रतिशत खेती वर्षा आधारित होने के कारण मौसम में होने वाला बदलाव सीधे उत्पादन को प्रभावित करता है। इस साल मानसून के दौरान प्रदेश में सामान्य से करीब 11 प्रतिशत कम बारिश हुई, जिसका असर खरीफ फसलों पर भी देखने को मिला।

कृषि भूमि कम होने के पीछे केवल मौसम को जिम्मेदार नहीं माना जा रहा है। गैर-कृषि गतिविधियों के लिए जमीन का इस्तेमाल बढ़ना, ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर लोगों का पलायन और खेती की बढ़ती लागत भी इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

बढ़ती लागत और बेसहारा पशुओं से किसान परेशान

किसानों के सामने खेती की लागत बढ़ने के साथ बंदरों और बेसहारा पशुओं से फसलों को होने वाले नुकसान की समस्या भी बनी हुई है। कई स्थानों पर इन समस्याओं के कारण किसानों ने खेती छोड़ दी है।

वहीं कुछ किसान पारंपरिक गेहूं और मक्का जैसी खाद्यान्न फसलों के बजाय सब्जियों और अन्य नकदी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं। इसका असर फसल क्षेत्र के पैटर्न में भी दिखाई दे रहा है। राज्य में सब्जी उत्पादन का क्षेत्र अब करीब 90 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जबकि वर्ष 2020 में यह लगभग 86 हजार हेक्टेयर था।

सेब उत्पादन पर भी मौसम में बदलाव का असर पड़ा है। वर्ष 2025 में हिमाचल में करीब 3.30 करोड़ पेटी सेब का उत्पादन हुआ था। इस साल उत्पादन करीब 1.50 करोड़ पेटी रहने का अनुमान है। तापमान में बदलाव और मौसम की अनिश्चितता को बागवानी क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।

कृषि विश्वविद्यालय विकसित कर रहे जलवायु अनुकूल बीज

बदलते मौसम के बीच कृषि उत्पादन बनाए रखने के लिए चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर की ओर से जलवायु के अनुकूल तकनीक और बीजों पर काम किया जा रहा है। विश्वविद्यालय ने कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली विभिन्न फसलों की उन्नत किस्में विकसित की हैं।

इनमें गेहूं की तीन, धान की चार, मक्का की एक, जौ की चार, दलहनी फसलों की नौ, तिलहनी फसलों की दो, सब्जियों की तीन और चारे की चार किस्में शामिल हैं। किसानों को इन किस्मों और नई तकनीकों की जानकारी देने के लिए कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से प्रशिक्षण और प्रदर्शनियां आयोजित की जा रही हैं।

बागवानी क्षेत्र में भी नई किस्मों पर काम जारी है। डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी की ओर से सेब की छह नई किस्में विकसित की गई हैं, जिन्हें 22 अक्टूबर को लोकार्पित करने की योजना है।

कृषि एवं बागवानी विभाग के सचिव सी पाल रासु के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और कम बारिश का फसलों पर असर पड़ रहा है। ऐसे में कम पानी वाली और सूखा सहन करने वाली फसलों, जैसे बाजरा, रागी और अन्य मोटे अनाज के साथ सब्जियों और नकदी फसलों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।

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