जलवायु परिवर्तन का असर अब भारतीय हिमालयी क्षेत्रों में भी तेजी से दिखाई देने लगा है। ‘जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस’ में प्रकाशित एक शोध अध्ययन के मुताबिक, मध्य और पूर्वी हिमालय की तुलना में पश्चिमी हिमालय तेजी से गर्म हो रहा है।
Himalayan Glaciers Melting: जलवायु परिवर्तन का असर हिमालयी क्षेत्र में तेजी से दिखाई दे रहा है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि भारतीय हिमालय के पश्चिमी हिस्से में तापमान बढ़ने की रफ्तार मध्य और पूर्वी हिमालय की तुलना में अधिक है। यदि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में पर्याप्त कमी नहीं की गई, तो इस सदी के अंत तक पश्चिमी हिमालय में मौसमी बर्फ का बड़ा हिस्सा खत्म हो सकता है।
यह स्थिति केवल पर्यावरण के लिए ही गंभीर नहीं है, बल्कि भारत और दक्षिण एशिया में जल सुरक्षा, कृषि, ऊर्जा और करोड़ों लोगों की आजीविका पर भी असर डाल सकती है। सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों का जल प्रवाह हिमालयी बर्फ और ग्लेशियरों से मिलने वाले पानी पर निर्भर करता है।
120 वर्षों के तापमान आंकड़ों का विश्लेषण
यह अध्ययन बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (BIT) मेसरा, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटियोरोलॉजी (IITM), पुणे और अशोका यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है। शोध में 1901 से 2020 तक के करीब 120 वर्षों के तापमान संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। वैज्ञानिकों ने भविष्य की स्थिति का अनुमान लगाने के लिए आठ वैश्विक जलवायु मॉडलों का भी इस्तेमाल किया।
अध्ययन के दौरान भारतीय हिमालय को तीन प्रमुख हिस्सों में विभाजित किया गया—पश्चिमी हिमालय, जिसमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं; मध्य हिमालय, जिसमें उत्तराखंड आता है; और पूर्वी हिमालय, जिसमें सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश तथा पूर्वोत्तर के क्षेत्र शामिल हैं। इस क्षेत्रीय विश्लेषण से पता चला कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पूरे हिमालय में एक जैसा नहीं है। पश्चिमी हिमालय में गर्मी बढ़ने की गति विशेष रूप से चिंताजनक है।
रात का तापमान बढ़ना क्यों है खतरनाक?
शोध से सामने आए प्रमुख संकेतों में रात के न्यूनतम तापमान में तेजी से वृद्धि शामिल है। पश्चिमी और मध्य हिमालय में सर्दियों तथा वसंत के दौरान रात का तापमान दिन के अधिकतम तापमान की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। रात में तापमान अधिक रहने से बर्फ को दोबारा जमने और कठोर होने के लिए पर्याप्त ठंड नहीं मिल पाती।
इससे बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इसका प्रभाव केवल हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नदियों में पानी पहुंचने के प्राकृतिक मौसमी चक्र को भी प्रभावित कर सकता है।

उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में 7 डिग्री से ज्यादा गर्मी
अध्ययन के मुताबिक, यदि दुनिया जीवाश्म ईंधन पर मौजूदा स्तर की निर्भरता बनाए रखती है और उत्सर्जन में पर्याप्त कमी नहीं आती, तो 2081-2100 के दौरान पश्चिमी हिमालय में सर्दियों का तापमान 20वीं सदी की शुरुआत के स्तर की तुलना में 7.18 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। उच्च उत्सर्जन वाले परिदृश्य में सदी के अंत तक वसंत ऋतु की बर्फ में भी भारी कमी का अनुमान लगाया गया है।
अध्ययन में बर्फ के नुकसान की मात्रा 95.9 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर तक पहुंचने का अनुमान जताया गया है। कुछ क्षेत्रों में इसका मतलब मौसमी बर्फ का लगभग पूरी तरह खत्म होना हो सकता है।
पूर्वी हिमालय में GLOF का बढ़ता खतरा
पूर्वी हिमालय में तापमान बढ़ने की गति पश्चिमी हिस्से की तुलना में कम हो सकती है, लेकिन वहां जोखिम का स्वरूप अलग है। ग्लेशियरों के पीछे हटने के कारण ग्लेशियल झीलों का विस्तार हो सकता है, जिससे Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF का खतरा बढ़ता है। GLOF तब होता है जब ग्लेशियर के पिघलने से बनी झील की प्राकृतिक या कृत्रिम बाधा अचानक टूट जाती है और बड़ी मात्रा में पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है।
इससे पहाड़ी क्षेत्रों में बस्तियों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को गंभीर नुकसान हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ ऐसे जोखिम आने वाले दशकों में हिमालय के अन्य हिस्सों तक भी फैल सकते हैं।











