विदेशी निवेशकों की लंबे समय से चली आ रही शिकायत को दूर करने के लिए केंद्र सरकार मॉडल बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी (BIT) में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रही है।
बिजनेस न्यूज़: भारत सरकार विदेशी निवेशकों से जुड़े विवादों के समाधान की प्रक्रिया को आसान और तेज बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रही है। सरकार मॉडल बाइलेटरल इन्वेस्टमेंट ट्रीटी (Model BIT) में संशोधन प्रस्तावित कर रही है। सबसे अहम बदलाव अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता यानी International Arbitration तक पहुंचने की समय सीमा को लेकर हो सकता है।
मौजूदा व्यवस्था में विदेशी निवेशक को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का रास्ता अपनाने से पहले भारत में उपलब्ध कानूनी उपायों को करीब पांच साल तक इस्तेमाल करना पड़ता है। प्रस्तावित बदलाव में इस अवधि को घटाकर एक साल किए जाने की तैयारी है। सरकार के इस कदम को भारत में विदेशी निवेश का माहौल बेहतर करने और निवेशकों का भरोसा बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
Model BIT में बड़े बदलाव की तैयारी
मामले से परिचित अधिकारियों के अनुसार, वित्त मंत्रालय ने करीब एक दशक पुराने मॉडल BIT में बदलाव के लिए कैबिनेट नोट तैयार किया है। सरकार जल्द ही इस प्रस्ताव पर केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी लेने की दिशा में आगे बढ़ सकती है। आर्थिक मामलों की सचिव अनुराधा ठाकुर ने भी हाल में संकेत दिया था कि मॉडल BIT में संशोधन को लेकर सरकार कैबिनेट की मंजूरी लेने की तैयारी कर रही है।
भारत ने विदेशी निवेश से जुड़े नियमों को स्पष्ट करने और निवेशकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए पहली बार 1993 में मॉडल BIT तैयार किया था। इसके बाद बदलते वैश्विक निवेश माहौल और अंतरराष्ट्रीय विवादों के अनुभवों को देखते हुए 2015 में इसमें व्यापक बदलाव किए गए।
5 साल की जगह 1 साल हो सकता है इंतजार
प्रस्तावित सुधारों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव Investor-State Dispute Settlement (ISDS) से जुड़ा है। मौजूदा मॉडल में विदेशी निवेशक को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का विकल्प अपनाने से पहले घरेलू कानूनी उपायों का लंबा इस्तेमाल करना पड़ता है। नई व्यवस्था में इस अवधि को घटाकर एक साल किए जाने का प्रस्ताव है।
इसका मतलब यह होगा कि यदि घरेलू स्तर पर विवाद का समाधान नहीं होता है, तो पात्र विदेशी निवेशक अपेक्षाकृत कम समय में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू कर सकेगा। सरकार का यह कदम विदेशी निवेशकों की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को दूर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

निवेश की परिभाषा में भी बदलाव
सरकार मॉडल BIT में केवल विवाद निपटाने की प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि ‘निवेश’ की परिभाषा में भी बदलाव करने पर विचार कर रही है। प्रस्ताव के मुताबिक, कुछ परिस्थितियों में पांच साल या उससे अधिक अवधि से रखे गए शेयर और इक्विटी निवेश को भी निवेश की परिभाषा के दायरे में लाया जा सकता है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए संधि के तहत सुरक्षा का दायरा बढ़ सकता है। हालांकि, अंतिम नियम कैबिनेट की मंजूरी और संशोधित मॉडल BIT के आधिकारिक स्वरूप के बाद ही स्पष्ट होंगे।
विदेशी निवेशकों को अधिक सुरक्षा देने के साथ सरकार अपने नीतिगत अधिकारों को भी सुरक्षित रखना चाहती है। प्रस्तावित बदलावों में सब्सिडी, स्थानीय सरकारों के फैसले और अनिवार्य लाइसेंसिंग जैसे मामलों को कुछ परिस्थितियों में अपवाद के रूप में रखने पर विचार किया जा रहा है। अनिवार्य लाइसेंसिंग का इस्तेमाल सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी असाधारण परिस्थितियों में किया जा सकता है।
ऐसी स्थिति में सरकार कुछ पेटेंट अधिकारों पर विशेष कदम उठा सकती है। इसका उद्देश्य विदेशी निवेश की सुरक्षा और सरकार के सार्वजनिक हित में नीति बनाने के अधिकार के बीच संतुलन कायम करना है।
भारत ने BIT नीति क्यों बदली?
भारत की BIT नीति में बदलाव के पीछे अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों का अनुभव भी महत्वपूर्ण रहा है। वर्ष 2015 के आसपास भारत को कई Investor-State Dispute Settlement (ISDS) दावों का सामना करना पड़ा। एक मामले में भारत को ऑस्ट्रेलिया की कंपनी से जुड़े विवाद में हार का भी सामना करना पड़ा।इसके बाद भारत ने विदेशी निवेश समझौतों में अपने नीतिगत और कानूनी हितों को अधिक मजबूती से सुरक्षित करने के लिए 2015 में नया मॉडल BIT अपनाया। लेकिन इसका एक दूसरा प्रभाव भी देखने को मिला। विदेशी निवेशकों ने भारत की संधि व्यवस्था को अपेक्षाकृत कठोर बताते हुए इसमें बदलाव की मांग की।
2018 के बाद सीमित देशों से BIT समझौते
संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन यानी UNCTAD के आंकड़ों के अनुसार, 2018 के बाद भारत के साथ नए BIT समझौतों पर सहमति बनाने वाले देशों की संख्या सीमित रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक बेलारूस, किर्गिस्तान, ब्राजील, उज्बेकिस्तान और इजरायल समेत कुछ ही देशों के साथ इस दिशा में प्रगति हुई है।
भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के बीच हालिया समझौते में भी निवेश संबंधी प्रावधानों का अपना अलग ढांचा है। इसमें मुख्य रूप से सरकार-से-सरकार दायित्वों पर जोर दिया गया है और निवेशकों को हर स्थिति में सीधे अंतरराष्ट्रीय अदालत या मध्यस्थता में जाने का अधिकार नहीं दिया गया है।










