सुप्रीम कोर्ट 17 मार्च से ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा पर नौ जजों की संविधान पीठ में सुनवाई करेगा। 1975 के फैसले और ट्रिपल टेस्ट सिद्धांत की दोबारा समीक्षा होगी, जिससे श्रम कानूनों के दायरे पर बड़ा असर पड़ सकता है।
New Delhi: देश के श्रम कानूनों में इस्तेमाल होने वाले शब्द ‘इंडस्ट्री’ की कानूनी परिभाषा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि इस अहम मुद्दे पर नौ जजों की संविधान पीठ (Constitution Bench) गठित की जाएगी। यह पीठ तय करेगी कि श्रम कानूनों के तहत ‘इंडस्ट्री’ शब्द का दायरा क्या होना चाहिए और वर्तमान कानूनी ढांचे में इसकी व्याख्या किस प्रकार लागू होगी।
यह मामला केवल एक तकनीकी कानूनी प्रश्न नहीं है, बल्कि इसका असर देश की हजारों संस्थाओं, कर्मचारियों और नियोक्ताओं पर पड़ सकता है। इसलिए इस सुनवाई को श्रम कानूनों के भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
17 मार्च से शुरू होगी संविधान पीठ की सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने जानकारी दी कि बड़ी संविधान पीठ 17 मार्च से इस मामले की सुनवाई शुरू करेगी। संभावना है कि बहस अगले दिन तक पूरी कर ली जाएगी।
पीठ में न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi और न्यायमूर्ति Vipul M Pancholi भी शामिल रहे। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि मामले में पहले से पर्याप्त केस मैनेजमेंट किया जा चुका है ताकि सुनवाई समयबद्ध तरीके से पूरी हो सके।
पक्षकारों को 28 फरवरी 2026 तक अपने अतिरिक्त या अपडेटेड लिखित तर्क दाखिल करने की अनुमति दी गई है। दोनों पक्षों के नोडल वकीलों को सभी याचिकाओं, दस्तावेजों और साक्ष्यों का नया संकलन तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
पांच दशक पुराने फैसले की दोबारा समीक्षा
इस मामले में लगभग पचास साल पहले दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले पर पुनर्विचार किया जाएगा। वर्ष 1975 में न्यायमूर्ति V R Krishna Iyer की अध्यक्षता वाली सात जजों की पीठ ने ‘इंडस्ट्री’ शब्द की व्यापक व्याख्या की थी।
उस फैसले में यह तय किया गया था कि किन परिस्थितियों में किसी संस्था को ‘इंडस्ट्री’ माना जाएगा। विशेष रूप से फैसले के पैरा 140 से 144 में निर्धारित सिद्धांतों को अब दोबारा परखा जाएगा। संविधान पीठ यह देखेगी कि क्या वह व्याख्या आज के सामाजिक और कानूनी संदर्भ में उपयुक्त है या उसमें बदलाव की जरूरत है।
‘ट्रिपल टेस्ट’ की वैधता पर उठे सवाल
1975 के फैसले में अदालत ने ‘ट्रिपल टेस्ट’ का सिद्धांत विकसित किया था। इसके अनुसार किसी भी संस्था को ‘इंडस्ट्री’ तभी माना जाएगा जब तीन शर्तें पूरी हों।
- पहली शर्त यह कि वहां नियमित और व्यवस्थित गतिविधियां संचालित हो रही हों।
- दूसरी शर्त यह कि नियोक्ता और कर्मचारी के बीच संगठित सहयोग मौजूद हो।
- तीसरी शर्त यह कि वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन या वितरण इस उद्देश्य से किया जा रहा हो कि मानव की जरूरतों या इच्छाओं की पूर्ति हो सके।
इस व्यापक परिभाषा के चलते क्लब, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान और अन्य सेवा आधारित संस्थाएं भी श्रम कानूनों के दायरे में आ गई थीं। अब संविधान पीठ यह तय करेगी कि क्या यह व्यापक व्याख्या आज भी उचित है या इसे सीमित किया जाना चाहिए।
औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 और नई संहिता 2020 का प्रभाव
यह मामला औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत दी गई परिभाषा से जुड़ा है। साथ ही, संविधान पीठ औद्योगिक संबंध संहिता 2020 के प्रावधानों पर भी विचार करेगी।
इसके अलावा औद्योगिक विवाद संशोधन अधिनियम 1982, जिसे संसद ने पारित तो किया था लेकिन कभी लागू नहीं किया गया, उसका कानूनी प्रभाव भी जांचा जाएगा। अदालत यह स्पष्ट करेगी कि क्या 1982 का संशोधन ‘इंडस्ट्री’ की परिभाषा को प्रभावित करता है या नहीं।
नई संहिता लागू होने के बाद श्रम कानूनों को एकीकृत किया गया है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुरानी न्यायिक व्याख्या और नई विधायी व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
क्या सरकारी योजनाएं भी मानी जाएंगी ‘इंडस्ट्री’
मामले का एक अहम पहलू यह भी है कि क्या सरकार द्वारा संचालित कल्याणकारी योजनाएं या सार्वजनिक संस्थाओं की सामाजिक सेवाएं भी ‘इंडस्ट्री’ की श्रेणी में आएंगी।
यदि इन्हें ‘इंडस्ट्री’ माना जाता है, तो उन पर श्रम कानूनों के प्रावधान लागू होंगे। इससे कर्मचारियों के अधिकारों और संस्थाओं की जिम्मेदारियों पर सीधा असर पड़ेगा।
अदालत यह भी तय करेगी कि राज्य के कौन से कार्य ऐसे हैं जिन्हें औद्योगिक गतिविधि की श्रेणी से बाहर रखा जाना चाहिए। यह फैसला भविष्य में सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करेगा।
समयबद्ध बहस के लिए तय की गई रूपरेखा
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई को सुव्यवस्थित बनाने के लिए स्पष्ट समयसीमा तय की है। याचिकाकर्ताओं को अपनी दलीलें रखने के लिए तीन घंटे का समय दिया गया है। प्रत्युत्तर के लिए एक अतिरिक्त घंटा निर्धारित किया गया है।
अदालत ने वकीलों से कहा है कि वे आपसी समन्वय के साथ तय समय में बहस पूरी करें और रजिस्ट्री की सभी प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं का पालन करें।











