कैंब्रिज के पूर्व प्रोफेसर जेसन अर्दे की मौत के बाद लंदन में हजारों लोगों ने श्रद्धांजलि सभा में हिस्सा लिया। समर्थकों ने ब्रिटिश मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की। याचिका पर 90 हजार से ज्यादा हस्ताक्षर हो चुके हैं।
लंदन: ब्रिटेन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर जेसन अर्दे की मौत को लेकर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में हजारों लोगों ने मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाए। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि अर्दे को उनकी मौत से पहले लगातार मीडिया दबाव और आलोचना का सामना करना पड़ा। अब उनकी मौत और मीडिया कवरेज की स्वतंत्र जांच की मांग तेज हो गई है।
जेसन अर्दे की मौत के बाद क्यों उठी जांच की मांग?
41 वर्षीय जेसन अर्दे की पिछले सप्ताह मौत हो गई थी। उनकी मृत्यु से पहले कई सप्ताह तक ब्रिटिश मीडिया में उनके अकादमिक काम, व्यक्तिगत जीवन और करियर से जुड़े दावों को लेकर लगातार रिपोर्टें प्रकाशित हुई थीं। इसी दौरान उनके शोध कार्य पर साहित्यिक चोरी यानी प्लेजरिज्म के आरोप भी सामने आए थे।
अर्दे ने 2023 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर बनकर इतिहास रचा था। वह समाजशास्त्र के प्रोफेसर थे। हालांकि, विवादों और उनके अकादमिक कार्यों की जांच के बीच उन्होंने 5 अगस्त को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
उनकी मृत्यु के बाद उनके समर्थकों और आलोचकों के बीच बहस एक बार फिर तेज हो गई है। समर्थकों का कहना है कि लगातार मीडिया दबाव ने उनकी स्थिति को बेहद कठिन बना दिया था, जबकि अकादमिक ईमानदारी से जुड़े आरोपों की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता को भी कई लोग महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
लंदन की श्रद्धांजलि सभा में हजारों लोग जुटे
जेसन अर्दे की याद में लंदन के ट्राफलगर स्क्वायर में एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। इसका आयोजन अभियान समूह स्टैंड अप टू रेसिज्म की ओर से किया गया था। आयोजकों के मुताबिक, सभा में कई हजार लोग शामिल हुए।
कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने अर्दे के निधन पर गहरा दुख जताया और ब्रिटिश टैब्लॉयड मीडिया के रवैये की आलोचना की। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि मीडिया ने अर्दे को लगातार निशाना बनाया और उनके निजी जीवन तथा पेशेवर उपलब्धियों को लेकर ऐसी रिपोर्टिंग की, जिससे उन पर असाधारण दबाव बना।
सभा में एक सहभागी ने कहा कि अर्दे को लगातार निशाना बनाया गया और इसे उन्होंने एक तरह की मीडिया मुहिम बताया। कुछ अन्य वक्ताओं ने भी इसे बेहद गंभीर और परेशान करने वाला घटनाक्रम करार दिया।
90 हजार से ज्यादा लोगों ने याचिका पर हस्ताक्षर किए
अर्दे की मौत के बाद उनकी मीडिया कवरेज की स्वतंत्र जांच की मांग वाली एक ऑनलाइन याचिका को व्यापक समर्थन मिला है। रिपोर्ट के अनुसार, 90 हजार से अधिक लोग इस याचिका पर हस्ताक्षर कर चुके हैं।
याचिका में दावा किया गया है कि उनकी मौत से पहले उन्हें करीब दो सप्ताह तक लगातार मीडिया दबाव का सामना करना पड़ा। इसमें मीडिया द्वारा उनके जीवन और अकादमिक उपलब्धियों से जुड़े विवादों को जिस तरीके से प्रस्तुत किया गया, उसकी स्वतंत्र समीक्षा की मांग की गई है।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि अर्दे की मौत का सीधा संबंध मीडिया कवरेज से था। उनकी मृत्यु की परिस्थितियों और किसी संभावित कारण को लेकर आधिकारिक निष्कर्षों को ही अंतिम आधार माना जाना चाहिए।
प्लेजरिज्म के आरोपों से शुरू हुआ विवाद
जेसन अर्दे के अकादमिक कार्यों पर प्लेजरिज्म के आरोप सबसे पहले सार्वजनिक रूप से नाथन कोफनास की ओर से लगाए गए थे। कोफनास ने दावा किया था कि प्लेजरिज्म जांच सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से उन्हें अर्दे के शोध कार्यों में कथित समानताएं मिलीं।
इसके बाद मीडिया रिपोर्टों में अर्दे के व्यक्तिगत जीवन और अकादमिक पृष्ठभूमि से जुड़े कुछ दावों पर भी सवाल उठाए गए। इनमें उनके बचपन, खेल उपलब्धियों और पुस्तक से जुड़े दावों को लेकर रिपोर्टिंग शामिल थी।
अर्दे ने प्लेजरिज्म के आरोपों से इनकार किया था। हालांकि, उन्होंने अपने अकादमिक कार्यों में कुछ गलतियों को स्वीकार किया और कहा था कि वह उन गलतियों के लिए जवाबदेह हैं, लेकिन खुद को झूठा मानने से इनकार किया।

कैंब्रिज ने भी मीडिया कवरेज पर चिंता जताई
विवाद के बीच कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के चांसलर लॉर्ड क्रिस स्मिथ ने अर्दे के साथ हुए व्यवहार को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अकादमिक ईमानदारी और प्लेजरिज्म के आरोपों की गंभीर जांच जरूरी है, लेकिन इसके साथ किसी व्यक्ति के खिलाफ नस्लीय पूर्वाग्रह से प्रेरित मीडिया अभियान को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों सिद्धांतों को एक साथ माना जा सकता है। किसी भी अकादमिक के खिलाफ प्लेजरिज्म के आरोपों की कठोर और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन जांच के नाम पर किसी व्यक्ति को नस्लीय आधार पर निशाना बनाना उचित नहीं है।
अर्दे ने अपने इस्तीफे के पत्र में भी कहा था कि उनका पद छोड़ना उनके खिलाफ सामने आए तमाम दावों को स्वीकार करना नहीं समझा जाना चाहिए।
निजी जीवन और उपलब्धियों पर भी उठे थे सवाल
मीडिया रिपोर्टों में अर्दे के अकादमिक काम के अलावा उनके व्यक्तिगत जीवन से जुड़े कई दावों की भी चर्चा हुई थी। इनमें उनके बचपन में बोलने में असमर्थ रहने के दावे, खेल उपलब्धियों और पुस्तक सौदे से संबंधित बातें शामिल थीं।
इन दावों पर सार्वजनिक बहस के बीच उनके समर्थकों ने मीडिया की रिपोर्टिंग के तरीके पर सवाल उठाया। उनका आरोप था कि अकादमिक विवाद को लेकर आलोचना धीरे-धीरे अर्दे के पूरे व्यक्तित्व और जीवन की सार्वजनिक जांच में बदल गई।
दूसरी ओर, आलोचकों का कहना रहा कि किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के अकादमिक दावों और शोध की विश्वसनीयता पर सवाल उठने पर उनकी जांच होना जरूरी है। इसी वजह से मामले में अकादमिक स्वतंत्रता, मीडिया की जवाबदेही और नस्लीय पूर्वाग्रह जैसे कई मुद्दे एक साथ चर्चा में आ गए हैं।
अंतिम संस्कार के लिए जुटाए गए 3 लाख डॉलर से ज्यादा
अर्दे के निधन के बाद उनके परिवार की मदद के लिए शुरू किए गए क्राउडफंडिंग अभियान में 3 लाख डॉलर से अधिक राशि जुटाई गई। इस धनराशि का उद्देश्य उनके अंतिम संस्कार के खर्च और उनकी पत्नी तथा दो बच्चों की सहायता करना बताया गया है।
इससे यह भी पता चलता है कि उनके निधन का असर उनके अकादमिक और पेशेवर दायरे से बाहर व्यापक समुदाय पर पड़ा है। श्रद्धांजलि सभा में शामिल लोगों ने उन्हें एक महत्वपूर्ण अश्वेत अकादमिक के रूप में याद किया और उनके योगदान को सम्मान दिया।
सरकार से भी उठी स्वतंत्र जांच की मांग
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने जेसन अर्दे की मौत को हर स्तर पर दुखद घटना बताया है। हालांकि, उन्होंने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि सरकार औपचारिक सार्वजनिक जांच का समर्थन करेगी या नहीं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अर्दे की मौत और उससे पहले हुए मीडिया कवरेज की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी। मामले में समर्थकों की बढ़ती मांग के बीच जांच से यह स्पष्ट हो सकता है कि मीडिया रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारिता के मानकों का पालन हुआ या नहीं।
साथ ही, किसी भी जांच में यह तथ्य महत्वपूर्ण रहेगा कि प्लेजरिज्म और अकादमिक दावों से संबंधित आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष समीक्षा हो। जेसन अर्दे की मौत ने ब्रिटेन में अकादमिक जवाबदेही, मीडिया की सीमाओं और नस्लीय पूर्वाग्रहों को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।











