जमीअत उलमा-ए-हिंद ने ‘वंदे मातरम’ सर्कुलर पर जताई चिंता: कहा- 'वतन से प्यार हमेशा रहेगा, लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की'

वंदे मातरम सर्कुलर को लेकर जमीअत उलमा-ए-हिंद ने जताई चिंता। कहा- वतन से मोहब्बत कायम रहेगी, लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की। जानें पूरा बयान और विवाद की वजह।

जमीअत उलमा-ए-हिंद ने हाल ही में केंद्र सरकार के ‘वंदे मातरम’ सर्कुलर को लेकर गहरी चिंता जताई है। जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि यह कदम संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के विपरीत है।

नई दिल्ली: जमीअत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से ‘वंदे मातरम’ को लेकर जारी किए गए सर्कुलर पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इसे संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत बताते हुए कहा कि यह कदम अनुच्छेद 25 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है। 

मौलाना कासमी ने अपने बयान में कहा कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने, उसका प्रचार करने और अपनी मान्यताओं के अनुसार जीवन यापन करने का अधिकार देता है। ऐसे में किसी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध किसी विशेष कविता या छंद का पाठ करने के लिए बाध्य करना संविधान की भावना के खिलाफ है।

इस्लामी आस्था और ‘वंदे मातरम’

मौलाना कासमी ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ के मूलपाठ, विशेषकर चौथे और पांचवें छंद में मूर्ति वंदना और हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है। इस्लामी आस्था तौहीद (एकेश्वरवाद) पर आधारित है, जिसके अनुसार मुसलमान केवल अल्लाह की इबादत कर सकते हैं। इस कारण से मुसलमान किसी भी पाठ का हिस्सा नहीं बन सकते, जिसमें पूजा या इबादत का तत्व शामिल हो।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जमीअत उलमा-ए-हिंद ‘वंदे मातरम’ के विरोध में नहीं है। यदि बहुसंख्यक धर्म के लोग इसे पढ़ना चाहते हैं, तो यह उनका संवैधानिक अधिकार है और इसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं डाली जाएगी। लेकिन इसे सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य बनाना या स्कूलों में बच्चों को इसे पढ़ने के लिए मजबूर करना धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप माना जाएगा।

बहुलतावादी भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का महत्व

मौलाना कासमी ने कहा कि भारत एक बहुलतावादी देश है, जहां विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोग शांति और सौहार्द के साथ रहते हैं। संविधान की सर्वोच्चता और अनेकता में एकता का सिद्धांत ही राष्ट्रीय एकता की आधारशिला है। किसी भी कदम से इस आधार को कमजोर करना देशहित में नहीं हो सकता।

उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के मुसलमान धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ किसी भी निर्णय को स्वीकार नहीं करेंगे। केंद्र सरकार से उन्होंने अपील की कि वह संवैधानिक प्रावधानों, न्यायिक परंपराओं और सामाजिक विविधता को ध्यान में रखते हुए सर्कुलर की तत्काल समीक्षा करे। इसका उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक गरिमा और सामाजिक सौहार्द को सुनिश्चित करना होना चाहिए।

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